दो दिन-दो बड़े एलान, भाजपा की इस रणनीति ने विपक्ष को भी चौंका दिया
2019 महासंग्राम के लिए भाजपा ने अपना अभियान और तेज कर दिया है। दो दिनों में दो बड़े फैसले ने भाजपा को विपक्ष के मुकाबले थोड़ी बढ़त दे दी है। सोमवार को भाजपा ने 30 साल पुराने दोस्त शिवसेना को मना लिया और लोकसभा चुनाव के लिए गठजोड़ को आखिरी शक्ल दे दी। भाजपा ने करीब साल भर से रूठे दोस्त शिवसेना को मना लिया।
मंगलवार को भी भाजपा ने अपनी रणनीति को आगे बढ़ाते हुए दक्षिण भारत में नया दोस्त तलाश लिया। डीएमके और विपक्ष से मुकाबले के लिए भाजपा ने एआईएडीएमके और पीएमके से हाथ मिला लिया। तीनों मिलकर विपक्ष को चुनौती देंगे। हालिया समय में डीएमके ने भाजपा और मोदी सरकार पर मजबूती से हमला बोला है। डीएमके सुप्रीमो स्टालिन तो राहुल गांधी को पीएम उम्मीदवार बता चुके हैं।
2019 में भाजपा के लिए लड़ाई बेहद मुश्किल हो चली है। सालभर में ही तस्वीर बदल गई है। तीन राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा के सत्ता गंवाते ही माहौल में तब्दीली आ गई। नरेंद्र मोदी के जादू पर सवाल उठने लगे। राहुल गांधी अचानक बड़े नेता के तौर पर उभरे और उनके सियासी अंदाज ने कइयों को मुरीद बनाया। वह 2019 में भाजपा और मोदी के लिए बड़ी चुनौती के तौर पर उभरते दिख रहे हैं।
सपा-बसपा गठबंधन
भाजपा के लिए सबसे बड़ी मुश्किल खड़ी की मायावती और अखिलेश यादव ने। दोनों नेताओं ने पुराना मनमुटाव भुलाते हुए उत्तर प्रदेश में गठबंधन का बड़ा फैसला ले लिया। भाजपा ने सहयोगियों के साथ मिलकर 80 में से यहां 73 सीटें हासिल की थीं। इन्ही सीटों ने लोकसभा में भाजपा का आंकड़ा 282 तक पहुंचा दिया। एनडीए को प्रचंड बहुमत मिला।
लेकिन सपा-बसपा के मेल ने भाजपा का खेल बिगाड़ दिया। अब पुराना प्रदर्शन दोहरा पाना असंभव सा जान पड़ता है। तमाम चुनावी पोल में बताया गया है कि भाजपा 20 से 25 सीटों पर ही सिमट सकती है। हालात को भांपते हुए भाजपा ने भी रणनीति की धार तेज कर दी है। दो दिन में दो बड़े एलान हुए हैं। सोमवार को शिवसेना के साथ लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ने का फैसला हुआ। मंगलवार को तमिलनाडु में एआईएडीएमके और पीएमके के साथ गठबंधन बनाया गया।
दो बड़े राज्य, दो बड़े फैसले
भाजपा की रणनीति साफ नजर आती है। यूपी में होने वाले संभावित नुकसान की भरपाई दूसरे बड़े राज्यों से की जाए। नए सहयोगी तलाशें जाएं। सबसे पहले नीतीश कुमार को अपने पाले में कर बिहार में लड़ाई का मैदान मजबूत किया गया। यहां 40 सीटें हैं। महाराष्ट्र में नाराज शिवसेना को भी मनाया गया। 48 सीटों वाले इस राज्य में अकेले लड़कर भाजपा को नुकसान होना तय था। एक और बड़े राज्य तमिलनाडु में भाजपा ने बड़ा दांव खेलते हुए विपक्ष को चौंका दिया। यहां एआईएडीएमके और पीएमके के साथ हाथ मिला लिया। 39 सीटों वाले इस राज्य में भाजपा को बड़ा फायदा हो सकता है।
2014 में एआईएडीएमके ने 37 सीटें जीती थीं। भाजपा ने एक सीट हासिल की थी। वहीं, महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ा था। भाजपा ने 23 और शिवसेना ने 18 सीटों पर कब्जा जमाया था। कांग्रेस को दो सीटें जबकि एनसीपी के खाते में चार सीटें आईं। यानि दोनों ने मिलकर 48 में से 41 सीटों पर जीत हासिल कर विपक्ष को करारी मात दी। दोनों का साथ एक बार फिर यहां भगवा रंग खिला सकता है।
विपक्ष को नेता की तलाश
ऐसे वक्त पर जब विपक्ष में एक कद्दावर नेता की तलाश हो रही है, भाजपा ने मोदी के नेतृत्व में एनडीए को नया आकार देना शुरू कर दिया है। भले ही चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा से नाता तोड़ लिया हो, लेकिन अब एनडीए के कुनबे में नए साथियों का प्रवेश हो रहा है। उधर, विपक्ष अभी भी ऐसे नेता की तलाश में है जो सर्वमान्य हो, कभी ममता बनर्जी का नाम सामने आता है तो कभी राहुल गांधी का। चंद्रबाबू नायडू और शरद पवार भी रेस में नजर आते हैं।