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Lok Sabha Election 2024: पिछड़े ही बढ़ाएंगे आगे, ओबीसी वोट के लिए भाजपा और कांग्रेस में जोर-आजमाइश

Thu, 21 Mar 2024 07:20 AM IST
निर्मल कांत हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली।
हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Thu, 21 Mar 2024 07:20 AM IST
सार

Lok Sabha Election: पिछड़ा वर्ग...भारतीय राजनीति का सबसे अहम किरदार ओबीसी मतदाता...देश की आबादी में करीब 50 फीसदी हिस्सेदारी यानी नतीजों में निर्णायक भूमिका। नब्बे के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद से अब तक यह वर्ग सभी दलों और गठबंधनों के केंद्र में रहा है। इस बार भी इस वर्ग को साधने के लिए सभी दल अपने-अपने तरीके से कोशिश कर रहे हैं।

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Lok Sabha Election 2024: BJP and Congress trying hard for OBC votes
राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

बिहार में जाति गणना के बाद से अन्य पिछड़ा वर्ग को लेकर सियासत तेजी से गरमा गई है। जाति गणना के जरिये इस वर्ग को सियासत के केंद्र में लाने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भले ही सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल हो गए, पर विपक्ष खासकर कांग्रेस इसे लेकर लगातार हमलावर है। हो भी क्यों नहीं। करीब 50 फीसदी की अनुमानित आबादी के कारण यह वोट बैंक जनादेश की दशा और दिशा तय करता आया है। यही वजह है कि दलों-गठबंधनों के लिए यह वोट बैंक सबसे अहम है। भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए और कांग्रेस की अगुवाई वाले विपक्षी गठबंधन में सबसे ज्यादा खींचतान इसी वोट बैंक को लेकर है। विपक्ष इन्हें साधने के लिए परंपरागत सामाजिक न्याय से जुड़े आरक्षण, जाति जनगणना को हथियार बना रहा है, वहीं भाजपा योजनाओं, चेहरों के माध्यम से इस वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है।

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यह चुनाव भाजपा का ओबीसी को जाति के खांचे से निकालने का प्रयोग है। जातिगत आबादी में अनुरूप सरकारी नौकरी और अवसरों में हिस्सेदारी की विपक्ष की मांग के बीच पार्टी ने राजनीति में परंपरागत जाति आधारित सियासत की जगह गरीब, युवा, किसान और महिला के रूप में नए सामाजिक समीकरण तैयार करने की कोशिश की है। हालांकि इस नए प्रयोग के बीच भाजपा ओबीसी के परंपरागत स्वभाव के प्रति न सिर्फ सतर्क है, बल्कि कोई खतरा भी नहीं उठाना चाहती। दूसरी ओर विपक्ष, और खासतौर से कांग्रेस इसी वर्ग को अपने उद्धारकर्ता के रूप में देख रही है। पहली बार कांग्रेस ओबीसी और इससे जुड़े परंपरागत आरक्षण, जाति जनगणना जैसे सवालों को मुद्दों के केंद्र में लाना चाहती है। दरअसल, हिंदुत्व व राष्ट्रवाद के मुद्दे पर अगड़े वर्ग के छिटकने, दलित मतदाताओं के बंटने के बाद कांग्रेस अब सामाजिक न्याय के मुद्दे पर अपनी सियासत को आगे बढ़ाना चाहती है।
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भाजपा की रणनीति
मोदी-शाह के युग में भाजपा ने ब्राह्मण-बनिया की पार्टी की अवधारणा को तोड़ दिया है। इसमें पीएम मोदी का आेबीसी वर्ग से होना मददगार साबित हुआ है। बीते दो चुनाव में इस वर्ग के बड़े हिस्से में पहुंच बना चुकी भाजपा पिछड़ा वर्ग से जुड़े चेहरों को आगे बढ़ा रही है। हाल में नायब सैनी को हरियाणा का सीएम बनाया तो मध्यप्रदेश में सरकार की कमान मोहन यादव को दी गई। पार्टी ने कामगारों के लिए 13 हजार करोड़ रुपये की विश्वकर्मा योजना शुरू की, जिसका लाभ पिछड़ी जातियों को मिल रहा है। जाति की राजनीति का गढ़ माने जाने वाले बिहार में पार्टी ने नीतीश कुमार, उपेंद्र कुशवाहा को साधा है। वहीं, यूपी में अपना दल, निषाद पार्टी, सुभासपा एनडीए के साथ है।
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कद्दावर चेहरे
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, शिवराज सिंह चौहान, नायब सैनी, मोहन यादव, भूपेंद्र यादव, अनुप्रिया पटेल, केशवप्रसाद मौर्य, ओमप्रकाश राजभर, संजय निषाद।

सर्वाधिक लाभ ओबीसी को
आश्चर्य है कि ओबीसी की बात करने वाले पीएम के रूप में सबसे बड़े ओबीसी को नहीं देख रहे हैं। इनका असली सशक्तीकरण हमारी सरकार में हुआ है। केंद्रीय योजनाओं का सर्वाधिक लाभ इसी वर्ग को मिला है। सर्वाधिक सांसद और विधायक भाजपा के हैं।
-नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री


विपक्ष की रणनीति
विपक्षी गठबंधन एनडीए को ओबीसी से जुड़े परंपरागत मुद्दों के जरिए घेरना चाहता है। कांग्रेस के अलावा राजद और समाजवादी पार्टी जैसे कई क्षेत्रीय दल केंद्रीय स्तर पर जाति जनगणना, आबादी के अनुरूप आरक्षण में हिस्सेदारी बढ़ाने के सवाल को जोरशोर से उठा रहे हैं। इनकी कोशिश हिंदी पट्टी क्षेत्र में ओबीसी को साधकर सत्तारूढ़ एनडीए को झटका देने की है। कांग्रेस इस उम्मीद में है कि ओबीसी समुदाय के सहारे उसे पिछड़ी जातियों का समर्थन मिल सकता है और वह फिर राष्ट्रीय राजनीति में मजबूती से उभर सकती है। कांग्रेस ने राज्यसभा के चुनाव में 10 उम्मीदवारों में से चार ओबीसी समुदाय से उतारे थे।

कद्दावर चेहरे 
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया, छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम भूपेश बघेल, राजद नेता तेजस्वी यादव, सपा नेता अखिलेश यादव।

सशक्तीकरण में यह वर्ग पीछे
सबसे बड़ा वर्ग ओबीसी सशक्तीकरण के मामले में सबसे पीछे है। केंद्र सरकार के 90 सचिवों में महज तीन ओबीसी हैं। सत्ता में आने के बाद हम जातिगत जनगणना कराएंगे और आबादी के अनुरूप आरक्षण में हिस्सेदारी देंगे।

- राहुल गांधी, पूर्व अध्यक्ष कांग्रेस

2019 में किस पार्टी को किस वर्ग का अधिक वोट

(स्रोत: इंडिया टुडे-एक्सिस माय इंडिया सर्वे)

बिहार की जाति गणना में क्या स्थिति

लोकनीति-सीडीएस सर्वे के अनुसार 2019 में भाजपा को प्रभावशाली जातियों के 40 फीसदी जबकि ओबीसी के 48 फीसदी वोट मिले।

बिहार से बढ़ी ओबीसी राजनीति : 70 के दशक में बिहार में कर्पूरी ठाकुर ने सीएम रहते मुंगेरीलाल आयोग की सिफारिश लागू कर ओबीसी को 20% आरक्षण दिया। 90 के दशक में मंडल आयोग लागू होने के बाद ओबीसी को 27% आरक्षण मिला। आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी की मांग भी बिहार से ही निकली।
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