हरियाणा का रण: भाजपा के सामने दोहरी चुनौती, क्या पार लगाएगा मोदी का राष्ट्रवाद?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लोकसभा चुनाव 2019 के महासंग्राम में हरियाणा की 10 सीटें बेहद महत्वपूर्ण हो गई हैं। खासतौर पर भाजपा के लिए ये 10 सीटें बेहद अहम हैं। 2014 में भाजपा ने सात सीटों पर कब्जा जमाया था। भाजपा भी समझती है कि पुराना प्रदर्शन दोहराना उसके लिए कितना जरूरी है। लेकिन इस बार उसके लिए मुश्किलें भी कम नहीं हैं। न सिर्फ वह सत्ता विरोधी रुझान से जूझ रही है बल्कि जातीय समीकरण भी उसके लिए चुनौती बना हुआ है।
इस चुनाव में भाजपा के लिए हरियाणा में चुनौतियां कई हैं। भाजपा को हरियाणा में दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। एक ओर देश में हाे रहा आम चुनाव है, तो दूसरी ओर मनोहर लाल खट्टर का कार्यकाल भी साल के अंत तक समाप्त हो रहा है। जाहिर है मतदाता मोदी को वोट देते समय खट्टर के कामों की समीक्षा भी करेगा। उसपर जाट आंदोलन की तपिश भी उसे झेलनी है।
भाजपा ने 2014 में सात सीटें जीतीं
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य की 10 लोकसभा सीटों में से सात सीटों पर कब्जा जमाया था। इंडियन नेशनल लोकदल ने दो सीटें हासिल की थीं, जबकि कांग्रेस के हाथ केवल एक ही सीट आई थी। हरियाणा की कुल आबादी का 27 फीसदी हिस्सा जाट है। राज्य की सियासत में जाट बेहद ही प्रभावशाली स्थिति में रहे हैं। लेकिन भाजपा ने मनोहर लाल खट्टर को राज्य का सीएम बनाकर जाटलैंड में नया समीकरण रचा था। इसी के साथ 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बहुत ही चतुराई से जाट नेताओं के सामने गैर जाट पंजाबी उम्मीदवारों को टिकट दिया था। इसका उसे जबरदस्त फायदा भी मिला।
हरियाणा की चुनावी राजनीति में कांग्रेस और आईएनएलडी के बीच जाट वोटों के लिए पुरानी लड़ाई रही है। लेकिन साल 2014 में भाजपा ने राज्य में सोशल इंजिनियरिंग का फॉर्मूला अपनाया और गैर जाट मतदाताओं को अपने पाले में कर राज्य की 10 में से सात सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की थी। इस बार भी भाजपा उसी पुरानी रणनीति पर चल रही है।
जाट कोटा शीर्ष मुद्दा बना हुआ है
जाट आरक्षण प्रमुख मुद्दा
हरियाणा के चुनाव में इस बार जाट आरक्षण प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। चुनावों में जातिगत समीकरण के तहत इसी ने निर्णायक भूमिका निभाई है। जाट नेताओं का आरोप है कि भाजपा सरकार ने उनके समुदाय को नौकरियों में 10 प्रतिशत कोटे का बचाव सुप्रीम कोर्ट में पर्याप्त रूप से नहीं किया।
हालांकि, भाजपा को जींद विधानसभा उपचुनाव जीतने के बाद हरियाणा में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद है। यहां से कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला मैदान में थे। तब भाजपा ने इनेलो के विधायक हरि चंद मिड्ढा के पुत्र कृष्ण मिड्ढा को उतारा था और सुरजेवाला को हराया था।
हरियाणा में आबादी के लिहाज से जाटों की संख्या सबसे अधिक है। ऐसे में राजनीतिक दल भी जाटों को लुभाने में लगे हुए हैं। इस फेहरिस्त में अब जननायक जनता पार्टी भी जुड़ गई है। ये पार्टी चौटाला परिवार में पड़ी दरार के बाद आईएनएलडी से टूटकर बनी है। जेजेपी के दुष्यंत चौटाला ने आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन किया है। चूंकि जजपा भी जाटों का ही प्रतिनिधित्व करती है, तो जाहिर है ये पार्टी आईएनएलडी के वोट बैंक में सेंध लगाएगाी।
जाट वोटर भाजपा से नाराज बताए जा रहे हैं। गैर जाट मतदाता जाट आंदोलन के वक्त हुई हिंसा में काफी प्रभावित हुए थे। उनकी नाराजगी खट्टर को लेकर बरकरार बताई जाती है। आंदोलन के वक्त उनकी करोड़ों की संपत्ति खाक हो गई थी। खट्टर सरकार और भाजपा को इसे लेकर खूब आलोचना का सामना भी करना पड़ा था। उनके गुस्से का असर इस चुनाव में दिख सकता है। यानी भाजपा के एक तरफ खाई है तो दूसरी तरफ कुंआ और पार्टी को इसी चुनौती से पार पाना है।
बहरहाल, इस चुनाव में एक तरफ मोदी का राष्ट्रवाद है, तो दूसरी तरफ राहुल गांधी का 72 हजार का न्याय है। सैनिकों से भरी हरियाणा की जमीन को मोदी का राष्ट्रवाद तो भा रहा है लेकिन हरियाणा का वोटर इसबार मोदी के साथ खट्टर सरकार को भी चुनावी कसौटी में तौल सकता है। यही भाजपा के लिए मुसीबत का सबब है।