लॉकडाउन ने बदल दी जिंदगी, बच्चे समझने लगे परिवार का प्यार
- अब तो पति भी काम में बंटाने लगे हैं हाथ
- समझ में आने लगा है परिवार का मतलब
- घरों में मिडवाइफ की संख्या घटनी तय, जान है तो जहान है
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आपदा तकलीफ के साथ-साथ नसीहत भी लेकर आती है। कोविड-19 संक्रमण से बचाव में लॉकडाउन के उपाय ने जहां लोगों में जिंदगी के प्रति डर बैठाया, वहीं आम शहरी भारतीय का जीवन बदलकर रख दिया है।
सुनीता कपूर के पति की बवाना,दिल्ली में फैक्ट्री है, लेकिन घर में जो बना मिल जाता है, खा लेते हैं। कोई नखरा नहीं करते। बच्चों का भी यही हाल है। मिस्टर कपूर ही नहीं, बल्कि बच्चे भी घर के काम में हाथ बंटाने लगे हैं।
मजे की बात यह है कि सब अपने फोन पर व्हाट्सएप, फेसबुक पर व्यस्त नहीं हैं। अब तो सब मिलते, बैठते, बातें करते, साथ खाना खाते हैं। सुनीता का कहना है कि सच कहें तो जिंदगी का मतलब इस 58 साल की उम्र में अब समझ में आया है।
यू-ट्यूब की मदद से बच्चे बनाते हैं लजीज नाश्ता
दिल्ली के नामी स्कूल की टीचर प्रिया रघुवंशी की सुनिए। प्रिया के पति इनकम टैक्स विभाग में अधिकारी हैं। घर में तीन नौकरानियां काम करती थीं। एक ड्राइवर भी था। गमलों की देखभाल के लिए माली था। इनमें से अब कोई नहीं आता।
शुरू के दस दिन बड़ी परेशानी भरे और घर में तनाव वाले रहे, लेकिन अब सब ठीक है। पति खुद गमलों को संभालते हैं, घर के काम में हाथ बंटाते हैं। बेटी यू-ट्यूब से सीखकर लजीज नाश्ता बनाती है।
बेटे ने कभी हाथ से चम्मच भी नहीं धोई थी, लेकिन मां की मदद में वह घर के बर्तन धो देता है। प्रिया खुद बताती हैं कि पिछले 20 साल से काम करने की आदत छूट गई थी। स्कूल जाने के आधा घंटा पहले उठती थी।
अब साढ़े पांच बजे सुबह नींद खुल जाती है। घर में झाड़ू, पोंछा, वॉशिंग मशीन से कपड़े खुद साफ धोती, सुखाती हैं। प्रिया कहती हैं कि सच कहें तो लगता है जैसे जिंदगी लौट आई। बच्चे और पति भी परिवार को समझने लगे हैं। पहले सब अपने में बिजी थे। अब सब एक दूसरे का ख्याल रखने लगे हैं।
बिना दो पैग के आने लगी नींद
सतेंदर सिंह का फुटवियर का कारोबार है। कामकाज से लौटने के बाद डिनर से पहले वह रोज दो पैग के बिना सो नहीं पाते थे। बताते हैं, यह जीवन का हिस्सा बन गया था। लॉकडाऊन के बाद कुछ दिन दो पैग चला, लेकिन अप्रैल के पहले सप्ताह के बाद मिलना बंद हो गया।
एक सप्ताह तक काफी परेशान रहे, लेकिन 16 अप्रैल के बाद से अब तक उन्होंने इसे छुआ तक नहीं। वह कहते हैं कि गुरुवाणी सुनने की आदत पड़ गई। हर रोज आसानी से नींद आ जाती है। सतेन्द्र सिंह बताते हैं कि अब वह इस आदत को ही छोड़ देंगे।
मेड तो बस हाथ मार कर चली जाती थी
केसी शर्मा दिल्ली विश्वविद्यालय से रिटायर प्रोफेसर हैं। एक बेटा सीए और एक जापान की मित्सुबिसी मल्टीनेशनल में बड़े पद पर है। एक बहू स्त्री रोग की डॉक्टर तो दूसरी एचडीएफसी बैंक में है। दो फ्लैट में रहने वाला परिवार कोविड-19 संक्रमण और लॉकडाउन के अगले ही दिन केसी शर्मा के चार बेडरूम वाले फ्लैट में एक साथ रहने लगा है।
केसी की पत्नी सावित्रि केंद्रीय विद्यालय में शिक्षिका रही हैं। बताती हैं कि पिछले 30-35 दिन में जिस तरह से परिवार के लोग परिवार को समझ रहे हैं, यह पिछले 10 साल में उन्हें कभी नहीं दिखा।
सावित्री का कहना है कि बहुएं उन्हें काम नहीं करने देती। दोनों बेटे घर के हर काम में हाथ बंटाते हैं। सावित्री कहती हैं कि पहले झाड़ू पोछा साफ-सफाई मेड करती थी, लेकिन उनका घर अब पहले से ज्यादा साफ सुथरा रह रहा है।
अब मेड की जल्दी नहीं है
मनीषा के पति मल्टीनेशनल कंपनी में डिप्टी जीएम हैं। मनीषा खुद भी स्टेज परफामेंस देती हैं। बच्चे दिल्ली के नामी पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं। लग्जरी लाइफ जीने वाली मनीषा के घर में एक 12 घंटे की मेड, झाडू-पोछा, बर्तन के लिए दूसरी मेड और कपड़े आदि की साफ-सफाई के लिए तीसरी मेड थी।
घर में एक ड्राइवर और एक बच्चों का अटेंडेंट था। लॉकडाउन के बाद से यह सब छुट्टी पर चल रहे हैं। मनीषा बताती हैं कि शुरू में 10-15 दिन तक खूब रोना आता था। घर में थोड़ी तकरार भी हो जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक हो गया। अब बच्चे अपना लगभग सारा काम करते हैं। सब मिल-जुलकर हाथ बंटाते हैं। अब मनीषा को घर में मेड आदि की कोई जल्दी नहीं है।
जान है तो जहान है
सुनीता, प्रिया, सावित्री, मनीषा की जिंदगी खाते-पीते मजे से चल रहे मध्यवर्गीय परिवार की है। हर घर में दो-तीन गाड़ियां, संसाधन सब हैं। लेकिन सभी को लग रहा है कि जान है तो जहान है। कोविड-19 संक्रमण के बाद लगे लॉकडाऊन ने परिवार का मतलब समझा दिया है।
हालांकि सबकी जिंदगी बिना मेड और घरेलू सहायकों के नहीं चलनी है, क्योंकि सबका कामकाज शुरू होते ही, परिवार के लोग दूसरे कामों में व्यस्त हो जाएंगे। लेकिन का कहना है कि समय बदलने पर वह घरेलू नौकरों की संख्या घटाएंगे।
सावित्री कहती हैं कि बच्चों और बहुओं को भी लग रहा है कि वे सुंदर जीवन से कितना दूर हो रहे थे। जिंदगी भागमभाग, मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी सीरियल में खो जाने वाली हो गई थी।