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EC: 'राजनीतिक दलों के साथ साझा की गई मृत मतदाताओं की सूची', सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद चुनाव आयोग का बयान
Thu, 14 Aug 2025 08:10 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Thu, 14 Aug 2025 08:10 PM IST
सार
EC: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह बिहार में हटाए गए 65 लाख मतदाताओं की जानकारी सार्वजनिक करे। इस बीच, चुनाव आयोग ने कहा कि मृत और एक से अधिक मतदाता पहचान पत्र रखने वाले मतदाताओं की सूची राजनीतिक दलों को पहले से दी जा रही है। आयोग ने यह भी बताया कि विशेष गहन पुनरीक्षण फॉर्म में आधार नंबर मांगा जा रहा है।
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चुनाव आयोग
- फोटो : पीटीआई (फाइल)
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विस्तार
चुनाव आयोग ने गुरुवार को कहा कि वह मृत मतदाताओं और जिन लोगों के पास एक से ज्यादा मतदाता पहचान पत्र हैं, उनकी सूची राजनीतिक दलों के साथ साझा कर रहा है। आयोग ने यह भी बताया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए इस्तेमाल किए जा रहे फॉर्म में पहले से ही पहचान के प्रमाण के रूप में आधार नंबर मांगा जाता है। चुनाव आयोग का यह बयान तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने उसे बिहार की मतदाता सूची से हटाए 65 लाख नामों की जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया।
ये भी पढ़ें: 'नजरअंदाज नहीं कर सकते पहलगाम की घटना..', जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा देने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट
आयोग ने कहा कि मृत मतदाताओं और स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके लोगों की सूची 20 जुलाई से ही राजनीतिक दलों को दी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह बिहार में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत मतदाता सूची से हटाए गए 65 लाख नामों की जानकारी और उन्हें शामिल न करने के कारणों को सार्वजनिक करे, ताकि पारदर्शिता बढ़ाई जा सके।
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चुनाव आयोग ने एसआईआर की प्रक्रिया को सही ठहराया
बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को सही ठहराते हुए चुनाव आयोग ने आज सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह 'तीव्र राजनीतिक टकराव के माहौल' में काम कर रहा है, जहां शायद ही उसके कोई निर्णय बिना विवाद के रहते हैं। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने माना कि चुनाव आयोग को एसआईआर करने का अधिकार है, लेकिन यह प्रक्रिया तर्कसंगत और निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए।
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा, चुनाव आयोग इस समय ऐसे माहौल में काम कर रहा है, जहां उसकी लगभग हर बात को चुनौती दी जाती है। फिर भी उसके पास विशेष गहन पुनरीक्षण करने जैसे फैसले लेने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि आयोग राजनीतिक दलों की खींचतान में फंसा हुआ है, जहां पार्टियां चुनाव हारने पर ईवीएम को खराब और जीतने पर उसे सही बताती हैं। द्विवेदी ने कहा, मैं यह नहीं कह रहा कि चुनाव आयोग जो चाहे वो कर सकता है। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत आयोग के पास पर्याप्त अधिकार हैं।
ये भी पढ़ें: केदारनाथ क्षेत्र में हो रहे हेलीकॉप्टर हादसों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र-DGCA से मांगा जवाब
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग राजनीतिक धारणा की बजाय कानूनी पहलुओं पर ध्यान देता है। चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक पार्टियों की अपनी जरूरतें होती हैं, लेकिन हमारी जिम्मेदारी कानून के प्रति है। द्विवेदी ने यह भी कहा, देखिए हम क्या कह रहे हैं और इसे कैसे गलत तरीके से पेश किया गया। कुछ वकीलों ने बिना हलफनामे के कुछ व्यक्तियों को पेश कर नाटक रचने की कोशिश की, जिन्हें मृत बताया गया, वे जीवित थे। हमें नहीं पता वे कौन थे और कहां से आए।
चुनाव आयोग के वकील ने बताया कि 7.24 करोड़ फॉर्म जमा हुए हैं, जिनमें से पांच करोड़ नामों की जांच की गई है। अगर कोर्ट 24 जून को एसआईआर शुरू करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं को 15 दिन बाद सुने, तो आयोग और बेहतर आंकड़े दे सकता है। बेंच ने चुनाव आयोग से पूछा कि हटाए गए मतदाताओं के नाम और हटाने के कारण सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने से पारदर्शिता बढ़ेगी और मतदाताओं का विश्वास मजबूत होगा, खासकर जब इस मुद्दे को लेकर कई तरह की बातें की जा रही हैं।
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आयोग ने कहा कि मृत मतदाताओं और स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके लोगों की सूची 20 जुलाई से ही राजनीतिक दलों को दी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह बिहार में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत मतदाता सूची से हटाए गए 65 लाख नामों की जानकारी और उन्हें शामिल न करने के कारणों को सार्वजनिक करे, ताकि पारदर्शिता बढ़ाई जा सके।
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चुनाव आयोग ने एसआईआर की प्रक्रिया को सही ठहराया
बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को सही ठहराते हुए चुनाव आयोग ने आज सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह 'तीव्र राजनीतिक टकराव के माहौल' में काम कर रहा है, जहां शायद ही उसके कोई निर्णय बिना विवाद के रहते हैं। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने माना कि चुनाव आयोग को एसआईआर करने का अधिकार है, लेकिन यह प्रक्रिया तर्कसंगत और निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए।
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा, चुनाव आयोग इस समय ऐसे माहौल में काम कर रहा है, जहां उसकी लगभग हर बात को चुनौती दी जाती है। फिर भी उसके पास विशेष गहन पुनरीक्षण करने जैसे फैसले लेने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि आयोग राजनीतिक दलों की खींचतान में फंसा हुआ है, जहां पार्टियां चुनाव हारने पर ईवीएम को खराब और जीतने पर उसे सही बताती हैं। द्विवेदी ने कहा, मैं यह नहीं कह रहा कि चुनाव आयोग जो चाहे वो कर सकता है। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत आयोग के पास पर्याप्त अधिकार हैं।
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उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग राजनीतिक धारणा की बजाय कानूनी पहलुओं पर ध्यान देता है। चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक पार्टियों की अपनी जरूरतें होती हैं, लेकिन हमारी जिम्मेदारी कानून के प्रति है। द्विवेदी ने यह भी कहा, देखिए हम क्या कह रहे हैं और इसे कैसे गलत तरीके से पेश किया गया। कुछ वकीलों ने बिना हलफनामे के कुछ व्यक्तियों को पेश कर नाटक रचने की कोशिश की, जिन्हें मृत बताया गया, वे जीवित थे। हमें नहीं पता वे कौन थे और कहां से आए।
चुनाव आयोग के वकील ने बताया कि 7.24 करोड़ फॉर्म जमा हुए हैं, जिनमें से पांच करोड़ नामों की जांच की गई है। अगर कोर्ट 24 जून को एसआईआर शुरू करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं को 15 दिन बाद सुने, तो आयोग और बेहतर आंकड़े दे सकता है। बेंच ने चुनाव आयोग से पूछा कि हटाए गए मतदाताओं के नाम और हटाने के कारण सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने से पारदर्शिता बढ़ेगी और मतदाताओं का विश्वास मजबूत होगा, खासकर जब इस मुद्दे को लेकर कई तरह की बातें की जा रही हैं।
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