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मंथन: जलवायु परिवर्तन पर कानून से जिम्मेदारी बढ़ेगी, सभी की जवाबदेही तय होगी
Mon, 16 Dec 2019 03:14 AM IST
आसिम खान
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: आसिम खान
Updated Mon, 16 Dec 2019 03:14 AM IST
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दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन को लेकर शोर मचा हुआ है। भारत समेत दुनिया के सभी देशों ने वादा किया है कि वे जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए कार्बन उत्सर्जन में कटौती करेंगे। वहीं पर्यावरणविदों का मानना है कि लक्ष्य इस वादे से हासिल नहीं होगा। इसके लिए भारत सरकार को कठोर कानून बनाना होगा। वहीं केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने हाल ही संसद में कहा था कि वे ऐसा कोई कानून नहीं लाने जा रहे हैं।
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पेरिस समझौते के तहत भारत इस बात पर राजी हुआ था कि वे कार्बन उत्सर्जन की रफ्तार 2030 तक 33 से 35 फीसदी कम करेगा। इसके साथ तीन बिलियन टन कार्बनडाईऑक्साइड क्षेत्र को जंगल और पौधों से भरेगा। कानून न लाने की बात पर पर्यावरणविदों का मानना है कि अगर सरकार जलवायु परिवर्तन को लेकर कानून बनाती तो इसके सार्थक परिणाम देखने को मिलते।
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इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के रिसर्च डायरेक्टर और इंटरगर्वमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज रिपोर्ट के प्रमुख लेकर अंजल प्रकाश कहते हैं कि ‘जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कानून समय की जरूरत है’। हाल ही मैड्रिड में आयोजित कॉप25 सम्मेलन में भारत ने विकसित देशों से अपील की थी कि वे क्लाइमेंट फाइनेंस मुहैया कराएं जिसका वादा किया था। इसके साथ ही संयुक्त रूप से शोध कार्य को भी आगे बढ़ाया जाए।
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बिना नीति इससे लड़ना संभव नहीं
जलवायु परिर्वतन को लेकर देश में अभी जो नीति हैं उससे लड़ाई संभव नहीं है। कानून बनता है तो पर्यावरण से जुड़ी कई समस्याओं का समाधान हो जाएगा। खासतौर पर गरीब या हाशिए पर मौजूद लोगों को फायदा होगा। अंजल का मानना है कि कानून से जिम्मेदारी बढ़ेगी, हर किसी जवाबदेही तय होगी जो अभी नहीं है। इसी लापरवाही का नतीजा है कि समय के साथ हालात खराब होते जा रहे हैं।
पांच देशों में जलवायु परिवर्तन पर कानून
आईआईटी भुवनेश्वर के प्रो. वी विनोज कहते हैं कि कार्बन उत्सर्जन को काम करने के लिए कानून ही एक अंतरिम उपाय है। वे कहते हैं, हम वैज्ञानिक हैं, कानून बनाना सरकार का अपना फैसला है, पर अगर कोई मुझसे पूछे तो कहूंगा कि इसकी जरूरत है। उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन को लेकर कानून बनाने वाले देशों में न्यूजीलैंड, ब्रिटेन, फ्रांस, स्वीडन और स्कॉटलैंड शामिल हैं। इसके अलावा चार अन्य देशों में इसके लिए कानून तैयार किया है। वहीं सूरीनाम, दक्षिण अमेरिका और भूटान वर्ल्ड इकोनॉकिमक फोरम के अनुसार कार्बन निगेटिव राष्ट्र हैं।
क्लाइमेट इमरजेंसी घोषित हो
ग्रीनपीस इंडिया के अविनाश चंचल कहते हैं कि जवाबदेही तय करने के साथ जलवायु आपातकाल घोषित करने का समय आ गया है। वे कहते हैं कि अभी जो भी नियम कानून हैं उसके साथ क्लाइमेट इमरजेंसी घोषित की जाए। इसके तहत कोयले का इस्तेमाल खत्म करने के साथ जीवाश्म ईंधन के प्रयोग रोकना होगा तभी कार्बन उत्सर्जन को समय रहते शून्य पर लाया जा सकता है।
न्यूजीलैंड 2050 तक कार्बन उत्सर्जन मुक्त
न्यूजीलैंड ने जलवायु परिवर्तन कानून के तहत तय किया है कि 2050 तक वो कार्बन उत्सर्जन के शून्य के लक्ष्य को हासिल कर लेगा। इसके साथ हीर मिथेन के उत्सर्जन को भी इसी अवधि में 24 से 27 फीसदी कम करे लेगा। स्वीडन ने भी 2045 तक इसी तरह का लक्ष्य तय किया है। इसी तरह स्कॉटलैंड ने द क्लाइमेंट चेंज एक्ट के तहत वर्ष 1990 के आधार वर्ष के अनुसार 2050 तक कार्बन उत्सर्जन में 80 फीसदी भी कटौती करने की बात कही है।