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एम्स में लाइफ स्पोर्ट सिस्टम पर रहे थे वाजपेयी, जानिये क्या है ये सिस्टम

Sun, 19 Aug 2018 11:15 AM IST
जितेंद्र भारद्वाज,अमर उजाला
जितेंद्र भारद्वाज,अमर उजाला Updated Sun, 19 Aug 2018 11:15 AM IST
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last attempt to save life is through life support system,know what is life support system
लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर अटल जी
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दिल्ली के एम्स में अंतिम सांस ली तो वे 36 घंटे से लाइफ स्पोर्ट सिस्टम पर थे।ये लाइफ स्पोर्ट सिस्टम क्या होता है। अमूमन इस सिस्टम के बारे में आम लोगों को उसी वक्त सुनने को मिलता है, जब कोई बड़ा आदमी अस्पताल में दाखिल होता है। वाजपेयी से पहले जयललिता के बारे में भी कहा गया कि वे भी लाइफ स्पोर्ट सिस्टम पर थी। आखिर कितने दिन तक इस सिस्टम की मदद से मरीज को बचाया जा सकता है। खर्चा कितना आता होगा, मरीज के बचने की उम्मीद कितनी होती है, इन सब सवालों के जवाब के लिए पढ़िए....लाइफ स्पोर्ट सिस्टम 
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मुंबई व दिल्ली के प्रख्यात डॉक्टर बीएस राजपूत (कंसलटेंट स्टेम सेल ट्रांसप्लांट सर्जन) का कहना है कि जब इंसान का शरीर प्राकृतिक तरीके से काम करना छोड़ देता है तो उसे लाइफ स्पोर्ट सिस्टम पर रखा जाता है। इसके जरिए दिल और फेफड़ों के वर्किंग सिस्टम को मदद पहुंचाई जाती है। वाजपेयी जी के मामले में भी ऐसा ही हुआ है। चूंकि उनके शरीर के अंग जैसे दिल, फेफड़े और गुर्दे काम करना बंद कर गए थे। फेफड़े में बार-बार संक्रमण हो रहा था। गुर्दा भी ठीक से काम नहीं कर पा रहा था।
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संक्रमण के कारण इन सब अंगों के टिश्यू कमजोर पड़ गए थे। मेडिकल थ्योरी कहती है कि जब किसी मरीज के दोनों अंग यानी दिल और फेफड़ा काम करना बंद कर देता है तो इस हालत में कार्डियो रेस्पेरटरी फेल्योर हो जाता है। मरीज को बार-बार तकनीकी उपकरणों की मदद से स्पोर्ट देने के बाद भी अगर वह पहले की स्थिति में वापस नहीं आ रहा है तो उसकी हालत अत्यंत गंभीर मानी जाती है।
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इसे यूं भी समझा जा सकता है
डॉ. राजपूत कहते हैं कि हर व्यक्ति की अपनी एक क्षमता होती है। लाइफ स्पोर्ट मिलने के बाद कोई मरीज कुछ दिन में, कुछ माह में तो कोई साल के बाद पहले वाली स्थिति में आ पाता है। इसमें आयु का एक अहम रोल होता है। अगर उम्र ज्यादा है तो मरीज को रिकवर करने में अधिक समय लगता है, क्योंकि आयु ज्यादा होने पर मरीज की रिकवरी करने की क्षमता प्राकृतिक रूप से कम हो जाती है। उदाहण के लिए, आपने कई बार सुना होगा कि सेना या पैरा मिलिटरी का कोई जवान और अफसर कई गोलियां खाने के बाद कोमा में चले जाते हैं, लेकिन कुछ माह या साल बाद वे वापस पहली वाली स्थिति में आ जाते हैं। वजह, उनकी रिकवरी क्षमता बड़ी आयु वाले व्यक्ति की तुलना में कहीं ज्यादा होती है।

 

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लाइफ सपोर्ट सिस्टम
सेल्युलर थेरेपी का भी इस्तेमाल होता है
हालांकि अभी यह नई तकनीक है। जो व्यक्ति पहले से ही लाइफ स्पोर्ट सिस्टम पर है, उसका संक्रमण कंट्रोल करने के लिए सेल्युलर थेरेपी का इस्तेमाल होता है। सामान्य तकनीक में यदि कोई मरीज एक माह बाद पहले वाली अवस्था में आता है, इस तकनीक से वह थोड़ा जल्द रिकवर कर लेता है। मरीज प्राइवेट अस्पताल के आईसीयू में है तो लाइफ स्पोर्ट सिस्टम पर प्रतिदिन 30-40 हजार रुपये खर्च आ जाता है। अगर सरकारी अस्पताल है तो यह खर्च बहुत कम होता है। सेल्युलर थेरेपी, जो कि सात-आठ दिन में एक बार होती है, उस पर करीब एक-डेढ़ लाख रुपये खर्च आता है।

थेरेपी हो या लाइफ स्पोर्ट सिस्टम, मकसद सेल को मजबूत बनाना होता है
लाइफ स्पोर्ट सिस्टम का फायदा इतना होता है कि अगर शरीर में थोड़ी बहुत भी क्षमता बची है तो उसकी मदद से रिकवरी प्रक्रिया दोबारा से चालू हो जाती है। इसमें शरीर के सेल अगर मर चुके हें तो उन्हें दोबारा से जीवित किया जाता है। सेल अगर कमजोर हैं तो उसे ताकतवर बनाया जाता है। एम्स में इस तकनीक पर सफल रिसर्च हो चुकी है। इस पर अभी और काम चल रहा है। सपोर्ट सिस्टम भी तीन तरह का होता है। एक, सीसीयू, जिसे क्रिटिकल केयर यूनिट कहते हैं, इसमें किसी मरीज को सामान्य सर्जरी के बाद रखा जाता है।

अगर हालत ज्यादा खराब है, लेकिन वह रिक्तर करने की स्थिति में है तो भी इस यूनिट की मदद लेते हैं। दूमरा, आईसीयू (इंटेंसिव केयर यूनिट), इसमें मरीज को संक्रमण से बचाने के लिए उसके बॉडी सेल को दोबारा से मजबूत बनाया जाता है। तीसरा, एक्मो, यानी एक्स्ट्रा कोरपोरेल मेंबरेन ऑक्सीजनेशन (ईसीएमओ)। इसमें दिल और फेफड़े  का काम पूरी तरह से मशीन के द्वारा होता है।

इसे बनावटी दिल व फेफड़े मशीन भी कहा जा सकता है। यह लाइफ स्पोर्ट सिस्टम की एडवांस तकनीक है। इस सिस्टम पर कई बार वे नवजात भी रखे जाते हैं, जो तय अवधि से पहले जन्म ले लेते हैं और उनके सभी अंग विकसित नहीं होते हैं। मतलब, एक व्यक्ति के शरीर को चलाने के लिए जरूरी अंग जब तक खुद काम करना शुरू न कर दें, तब तक लाइफ स्पोर्ट सिस्टम की मदद लेनी पड़ती है।
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