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कुरुक्षेत्र: चुनाव नतीजे अगर बिखरे तो बिहार में खिलेंगे सियासत के नए गुल
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बिहार चुनाव
बिहार विधानसभा चुनाव देश का शायद पहला चुनाव है जिसमें सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए और विपक्षी मोर्चा महागठबंधन के दोनों प्रमुख दलों के बीच भीतर ही भीतर रार ठनी है। एनडीए में भाजपा और जद(यू) एक दूसरे को पछाड़ने में जुटे हैं तो महागठबंधन में कांग्रेस की कोशिश है कि राजद के मुकाबले आधी सीटें लड़ने के बावजूद उसका स्ट्राइक रेट राजद से ज्यादा बेहतर हो, जिससे वह सत्ता की साझेदारी के अपने सारे विकल्पों को खुला रखे। बिहार के चुनाव नतीजे अगर किसी एक पक्ष में एकतरफा आए तो जैसा दिख रहा है वैसा ही बना रहेगा, लेकिन अगर नतीजे बिखरे तो बिहारी सियासत के बगीचे में नए गुल खिल सकते हैं और कौन कहां किसके साथ जाएगा कहना मुश्किल है।
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भाजपा की पूरी रणनीति और कोशिश है कि किसी भी तरह चुनाव नतीजों में वह सहयोगी जनता दल(यू) से कम से कम 25 से 30 सीटों की बढ़त लेकर मुख्यमंत्री पद पर अपना दावा ठोंके और अगर जनता दल यूनाइटेड इसके लिए तैयार न हो तो जोड़तोड़ करके अपने दम पर अपनी सरकार बनाए। प्रकट तौर पर भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत सारे भाजपा नेता नीतीश कुमार को फिर से मुख्यमंत्री बनाने के लिए वोट मांग रहे हैं, लेकिन नीतीश को पछाड़ने के लिए भाजपा के रणनीतिकारों ने सारी बिसातें बिछा दी हैं।
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भाजपा ने इसके लिए चिराग पासवान के लोजपा कार्ड का जबर्दस्त इस्तेमाल तो किया ही है रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा का गठबंधन भी नीतीश की राह में कांटे बिछाने का काम कर रहा है। चिराग की लोक जनशक्ति पार्टी के चुनाव निशान पर भाजपा से निकलकर उसके कई कद्दावर नेता चुनाव लड़ रहे हैं, जो खुद जीतें या न जीतें जद(यू) को हराने का पूरा इंतजाम कर सकते हैं। और जो जीतेंगे वो आगे बढ़कर भाजपा के साथ खड़े हो जाएंगे क्योंकि खुद चिराग भी कह रहे हैं कि वह नरेंद्र मोदी के हनुमान हैं और उनके सीने में मोदी उसी तरह विराजमान हैं जैसे भगवान राम हनुमान के ह्रदय में रहते हैं।
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उधर विपक्षी महागठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के बीच भी एक अघोषित मुकाबला है। हालांकि राजद की 144 सीटों के मुकाबले कांग्रेस महज 70 सीटें लड़ रही है, लेकिन कांग्रेस की कोशिश है कि इनमें वह कम से कम 40 से ज्यादा सीटें जीत ले, ताकि अगर राजद कांग्रेस और वाम दलों को बहुमत मिले तो महागठबंधन में उसका दबदबा बरकरार रहे और अगर महागठबंधन का आंकड़ा बहुमत से दूर हो और जद(यू) की सीटें भाजपा से कम होने पर नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने में अड़चन आ रही हो तो कांग्रेस-जद(यू) और अन्य के साथ मिलकर सरकार बना ले। बिहार से जुड़े एक प्रमुख कांग्रेसी नेता ने कहा कि ऐसा होने पर हम राजद को भी साथ लेने की पूरी कोशिश करेंगे, लेकिन अगर तेजस्वी नहीं माने तो कांग्रेस अपने विकल्पों पर भी काम करेगी।
भाजपा-जदयू का मुकाबला एक-दूसरे से
जद(यू) की भाजपा की इस रणनीति को समझते हुए इस कोशिश में है कि हर हालत में उसकी सीटें भाजपा के मुकाबले ज्यादा आनी चाहिए जिससे नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने में कोई बाधा भाजपा की तरफ से खड़ी न की जा सके। इसलिए एनडीए के ये दोनों घटक राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के महागठबंधन को लेकर उतने चिंतित नहीं हैं जितने कि एक दूसरे को लेकर। बिहार की कुल 243 विधानसभा सीटों में इस बार हर सीट पर बेहद दिलचस्प समीकरण और मुकाबला है और हर सीट पर स्थानीय समीकरण तय करेंगे कि नतीजों का ऊंट किस करवट बैठेगा।
बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में जद(यू) भाजपा गठबंधन की पहली स्थाई सरकार 2005 में बनी और नीतीश कुमार ने अपने कुशल प्रशासन और राजनीतिक प्रबंधन से बिहार की सूरत बदलने की शुरुआत की। राज्य की कानून व्यवस्था, खस्ताहाल सड़कें, बदहाल बिजली आपूर्ति, पंगु पड़ी चिकित्सा स्वास्थ्य सेवाएं और राजनीतिक अपराधीकरण जैसी तमाम चुनौतियों से नीतीश कुमार को जूझना पड़ा। लालू यादव के राजद के 15 साल में पहले पांच साल तो सामाजिक न्याय के सियासी नारों और पिछड़ों दलितों के सशक्तीकरण में निकल गए थे। 1995 में लालू प्रसाद यादव सबसे ज्यादा ताकतवर होकर उभरे थे, लेकिन इसी दौर में उन पर चारा घोटाले के आरोप लगे और लंबी अदालती कार्रवाई, सीबीआई जांच के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
लालू प्रसाद यादव को अपने दल में अपनी पत्नी राबड़ी देवी से ज्यादा योग्य कोई दूसरा नेता नहीं मिला जिसे वह अपना उत्तराधिकारी बनाते। राबड़ी मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन पर्दे के पीछे सारे फैसले लालू यादव ही करते रहे। राजद के 15 साल के शासन के दौरान बिहार की बदहाली और सियासी गंदगी साफ करने के तमाम वादों इरादों के साथ नीतीश कुमार ने 2005 में बतौर मुख्यमंत्री काम करना शुरू किया और उन्हें खासी कामयाबी भी मिली। नतीजा यह हुआ कि 2010 के विधानसभा चुनाव में जद(यू) भाजपा गठबंधन को विधानसभा मे एतिहासिक बहुमत मिला और विपक्षी राजद महज 24 सीटों पर आकर सिमट गया।
2005 से लेकर 2015 के विधानसभा चुनावों तक के नतीजों का अगर विश्लेषण करें तो नीतीश कुमार की निजी और जद(यू) भाजपा गठबंधन की सर्वाधिक लोकप्रियता 2010 के विधानसभा चुनावों में थी, जब नीतीश सरकार के पांच साल के कामकाज और भविष्य के वादों पर यकीन करके बिहार की जनता ने उन्हें ऐतिहासिक बहुमत दिया था। तब नीतीश कुमार के नेतृत्व में जद(यू) ने 143 और भाजपा ने सौ सीटों पर चुनाव लड़ा था। इसमें जद(यू) ने 113 और भाजपा ने 90 सीटें जीती थीं। इस लिहाज से नीतीश कुमार का स्ट्राइक रेट 70 फीसदी और भाजपा का 90 फीसदी था।
2013 में नीतीश भाजपा से अलग हुए और जद(यू) ने 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ा, लेकिन बुरी तरह हार के बाद नीतीश कुमार ने 2015 का चुनाव लालू प्रसाद यादव से दोस्ती करके राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा। तब राजद जद(यू) कांग्रेस महागठबंधन ने नीतीश कुमार के चेहरे और कामकाज को मुद्दा बनाकर भाजपा का मुकाबला किया और 178 सीटें जीतीं। इस चुनाव में राजद और जद(यू) ने सौ सौ और कांग्रेस ने 43 सीटों पर चुनाव लड़ा। इसमें राजद ने 81, जद(यू) ने 70 और कांग्रेस ने 27 सीटें जीती थीं। इस चुनाव में भी नीतीश कुमार की जीत का स्ट्राइक रेट 70 फीसदी, लालू प्रसाद यादव का 81 फीसदी और कांग्रेस का 65 फीसदी से ज्यादा रहा था।
बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में जद(यू) भाजपा गठबंधन की पहली स्थाई सरकार 2005 में बनी और नीतीश कुमार ने अपने कुशल प्रशासन और राजनीतिक प्रबंधन से बिहार की सूरत बदलने की शुरुआत की। राज्य की कानून व्यवस्था, खस्ताहाल सड़कें, बदहाल बिजली आपूर्ति, पंगु पड़ी चिकित्सा स्वास्थ्य सेवाएं और राजनीतिक अपराधीकरण जैसी तमाम चुनौतियों से नीतीश कुमार को जूझना पड़ा। लालू यादव के राजद के 15 साल में पहले पांच साल तो सामाजिक न्याय के सियासी नारों और पिछड़ों दलितों के सशक्तीकरण में निकल गए थे। 1995 में लालू प्रसाद यादव सबसे ज्यादा ताकतवर होकर उभरे थे, लेकिन इसी दौर में उन पर चारा घोटाले के आरोप लगे और लंबी अदालती कार्रवाई, सीबीआई जांच के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
लालू प्रसाद यादव को अपने दल में अपनी पत्नी राबड़ी देवी से ज्यादा योग्य कोई दूसरा नेता नहीं मिला जिसे वह अपना उत्तराधिकारी बनाते। राबड़ी मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन पर्दे के पीछे सारे फैसले लालू यादव ही करते रहे। राजद के 15 साल के शासन के दौरान बिहार की बदहाली और सियासी गंदगी साफ करने के तमाम वादों इरादों के साथ नीतीश कुमार ने 2005 में बतौर मुख्यमंत्री काम करना शुरू किया और उन्हें खासी कामयाबी भी मिली। नतीजा यह हुआ कि 2010 के विधानसभा चुनाव में जद(यू) भाजपा गठबंधन को विधानसभा मे एतिहासिक बहुमत मिला और विपक्षी राजद महज 24 सीटों पर आकर सिमट गया।
2005 से लेकर 2015 के विधानसभा चुनावों तक के नतीजों का अगर विश्लेषण करें तो नीतीश कुमार की निजी और जद(यू) भाजपा गठबंधन की सर्वाधिक लोकप्रियता 2010 के विधानसभा चुनावों में थी, जब नीतीश सरकार के पांच साल के कामकाज और भविष्य के वादों पर यकीन करके बिहार की जनता ने उन्हें ऐतिहासिक बहुमत दिया था। तब नीतीश कुमार के नेतृत्व में जद(यू) ने 143 और भाजपा ने सौ सीटों पर चुनाव लड़ा था। इसमें जद(यू) ने 113 और भाजपा ने 90 सीटें जीती थीं। इस लिहाज से नीतीश कुमार का स्ट्राइक रेट 70 फीसदी और भाजपा का 90 फीसदी था।
2013 में नीतीश भाजपा से अलग हुए और जद(यू) ने 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ा, लेकिन बुरी तरह हार के बाद नीतीश कुमार ने 2015 का चुनाव लालू प्रसाद यादव से दोस्ती करके राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा। तब राजद जद(यू) कांग्रेस महागठबंधन ने नीतीश कुमार के चेहरे और कामकाज को मुद्दा बनाकर भाजपा का मुकाबला किया और 178 सीटें जीतीं। इस चुनाव में राजद और जद(यू) ने सौ सौ और कांग्रेस ने 43 सीटों पर चुनाव लड़ा। इसमें राजद ने 81, जद(यू) ने 70 और कांग्रेस ने 27 सीटें जीती थीं। इस चुनाव में भी नीतीश कुमार की जीत का स्ट्राइक रेट 70 फीसदी, लालू प्रसाद यादव का 81 फीसदी और कांग्रेस का 65 फीसदी से ज्यादा रहा था।
कोरोना संकट पर नीतीश से नाराजगी
चुनावी विश्लेषकों का कहना है कि इस लिहाज से इस बार चुनाव में जिस तरह से नीतीश कुमार के बार-बार पाला बदलने और कोरोना संकट से निबटने में जिस तरह की विफलता मिली है, उससे लोगों में बहुत नाराजगी है।
प्रवासी मजदूरों के संकट ने इसे और बढ़ाया है। हालांकि अभी भी तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन को नीतीश के नेतृत्व वाले एनडीए के मुकाबले विकल्प के रूप में जनता स्वीकार नहीं कर पा रही है। इसलिए एनडीए की चुनाव जीतने की संभावना ज्यादा है और इसमें इस बार जद(यू) के मुकाबले भाजपा की सीटों के ज्यादा होने का आकलन भी किया जा रहा है। जद(यू) उम्मीदवारों के खिलाफ चिराग पासवान की लोजपा के उम्मीदवारों की मौजूदगी भी नीतीश कुमार के पलड़े को कमजोर कर सकती है। और अगर भाजपा जद(यू) से कम से कम 25 सीटों से ज्यादा आगे निकल जाती है तो नीतीश को केंद्र में लाने और भाजपा का मुख्यमंत्री बनाने का दबाव जद(यू) पर बढ़ जाएगा। अभी भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत सभी भाजपा नेता चुनाव बाद नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री बनाने की बात कर रहे हैं, लेकिन सब कुछ चुनाव बाद नतीजों पर निर्भर करेगा। भाजपा पिछले 15 साल से नीतीश कुमार और जद(यू) को अपने कंधों पर सवारी करा रही है। ऐसे में भाजपा सीटें ज्यादा आने पर अब अपना मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाना चाहेगी?
ऐसे में नीतीश कुमार क्या पटना का अपना सिंहासन छोड़ कर दिल्ली में नरेंद्र मोदी के दरबारी बनना पसंद करेंगे। यह एक यक्ष प्रश्न है जिसे लेकर सियासी गलियारों में अलग-अलग कयास हैं। नीतीश कुमार के पाला बदलने के इतिहास को देखते हुए भाजपा भी बेहद सतर्क है और कांग्रेस यह उम्मीद बांध रही है कि नीतीश किसी भी सूरत में पटना से दिल्ली नहीं जाएंगे। वह अपनी सरकार बनाने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे। इसलिए कांग्रेस महाराष्ट्र जैसा घटनाक्रम बिहार में दोहराए जाने की संभावना से इनकार नहीं कर रही है।
बिहार से जुड़े कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि बहुमत तो महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन को भी मिला था, लेकिन सरकार शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी की महाअघाड़ी की चल रही है। इस कांग्रेसी नेता के मुताबिक अगर जद(यू) की सीटें भाजपा से कम रह गईं और भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री बनाने का दांव चलने की कोशिश की, तो नीतीश कुमार एनडीए छोड़कर कांग्रेस राजद एवं अन्य के साथ मिलकर सरकार बना सकते हैं। लेकिन यह तब मुमकिन होगा जब राजद उन्हें फिर मुख्यमंत्री स्वीकार कर ले और कांग्रेस राजद मिलकर इतनी सीटें जीत लें कि वह जद(यू) के साथ मिलकर बहुमत का आंकड़ा पा सकें।
हालांकि सब कुछ चुनाव बाद के नतीजों पर निर्भर करेगा, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी घेरेबंदी शुरू कर दी है। कांग्रेस ने बिहार को लेकर अपनी जो समन्वय समिति बनाई है, उसका संयोजक वरिष्ठ नेता एवं पूर्व महासचिव मोहन प्रकाश को बनाया है। मोहन प्रकाश न सिर्फ कांग्रेस के प्रवक्ता हैं बल्कि समाजवादी आंदोलन की पृष्ठभूमि वाले मोहनप्रकाश की कर्मभूमि बनारस से हैं और उनका बिहार से खासा सियासी रिश्ता रहा है। उनके और नीतीश कुमार के बीच एक समय काफी बेहतर रिश्ते रहे हैं और 2015 में नीतीश को कांग्रेस के नजदीक लाने में उनकी खासी भूमिका थी।
ऐसे में अगर चुनाव के बाद भाजपा विहीन किसी सरकार की संभावना बनती है तो नीतीश कुमार से संवाद शुरू करने के लिए कांग्रेस उनका इस्तेमाल कर सकती है। इसके साथ ही राजद नेता शिवानंद तिवारी जिन्हें पटना विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में लालू और नीतीश दोनों का गुरु माना जाता रहा है, और जिनके इन दोनों से बराबर के रिश्ते रहे हैं, चुनाव बाद नीतीश कुमार और राजद के बीच संवाद समन्वय बनाने में ये भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।
प्रवासी मजदूरों के संकट ने इसे और बढ़ाया है। हालांकि अभी भी तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन को नीतीश के नेतृत्व वाले एनडीए के मुकाबले विकल्प के रूप में जनता स्वीकार नहीं कर पा रही है। इसलिए एनडीए की चुनाव जीतने की संभावना ज्यादा है और इसमें इस बार जद(यू) के मुकाबले भाजपा की सीटों के ज्यादा होने का आकलन भी किया जा रहा है। जद(यू) उम्मीदवारों के खिलाफ चिराग पासवान की लोजपा के उम्मीदवारों की मौजूदगी भी नीतीश कुमार के पलड़े को कमजोर कर सकती है। और अगर भाजपा जद(यू) से कम से कम 25 सीटों से ज्यादा आगे निकल जाती है तो नीतीश को केंद्र में लाने और भाजपा का मुख्यमंत्री बनाने का दबाव जद(यू) पर बढ़ जाएगा। अभी भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत सभी भाजपा नेता चुनाव बाद नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री बनाने की बात कर रहे हैं, लेकिन सब कुछ चुनाव बाद नतीजों पर निर्भर करेगा। भाजपा पिछले 15 साल से नीतीश कुमार और जद(यू) को अपने कंधों पर सवारी करा रही है। ऐसे में भाजपा सीटें ज्यादा आने पर अब अपना मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाना चाहेगी?
ऐसे में नीतीश कुमार क्या पटना का अपना सिंहासन छोड़ कर दिल्ली में नरेंद्र मोदी के दरबारी बनना पसंद करेंगे। यह एक यक्ष प्रश्न है जिसे लेकर सियासी गलियारों में अलग-अलग कयास हैं। नीतीश कुमार के पाला बदलने के इतिहास को देखते हुए भाजपा भी बेहद सतर्क है और कांग्रेस यह उम्मीद बांध रही है कि नीतीश किसी भी सूरत में पटना से दिल्ली नहीं जाएंगे। वह अपनी सरकार बनाने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे। इसलिए कांग्रेस महाराष्ट्र जैसा घटनाक्रम बिहार में दोहराए जाने की संभावना से इनकार नहीं कर रही है।
बिहार से जुड़े कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि बहुमत तो महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन को भी मिला था, लेकिन सरकार शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी की महाअघाड़ी की चल रही है। इस कांग्रेसी नेता के मुताबिक अगर जद(यू) की सीटें भाजपा से कम रह गईं और भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री बनाने का दांव चलने की कोशिश की, तो नीतीश कुमार एनडीए छोड़कर कांग्रेस राजद एवं अन्य के साथ मिलकर सरकार बना सकते हैं। लेकिन यह तब मुमकिन होगा जब राजद उन्हें फिर मुख्यमंत्री स्वीकार कर ले और कांग्रेस राजद मिलकर इतनी सीटें जीत लें कि वह जद(यू) के साथ मिलकर बहुमत का आंकड़ा पा सकें।
हालांकि सब कुछ चुनाव बाद के नतीजों पर निर्भर करेगा, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी घेरेबंदी शुरू कर दी है। कांग्रेस ने बिहार को लेकर अपनी जो समन्वय समिति बनाई है, उसका संयोजक वरिष्ठ नेता एवं पूर्व महासचिव मोहन प्रकाश को बनाया है। मोहन प्रकाश न सिर्फ कांग्रेस के प्रवक्ता हैं बल्कि समाजवादी आंदोलन की पृष्ठभूमि वाले मोहनप्रकाश की कर्मभूमि बनारस से हैं और उनका बिहार से खासा सियासी रिश्ता रहा है। उनके और नीतीश कुमार के बीच एक समय काफी बेहतर रिश्ते रहे हैं और 2015 में नीतीश को कांग्रेस के नजदीक लाने में उनकी खासी भूमिका थी।
ऐसे में अगर चुनाव के बाद भाजपा विहीन किसी सरकार की संभावना बनती है तो नीतीश कुमार से संवाद शुरू करने के लिए कांग्रेस उनका इस्तेमाल कर सकती है। इसके साथ ही राजद नेता शिवानंद तिवारी जिन्हें पटना विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में लालू और नीतीश दोनों का गुरु माना जाता रहा है, और जिनके इन दोनों से बराबर के रिश्ते रहे हैं, चुनाव बाद नीतीश कुमार और राजद के बीच संवाद समन्वय बनाने में ये भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।