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आपदा प्रबंधन पर नए सिरे से हो विचार: करीब दो अरब लोगों की पानी की सुरक्षा पर संकट, पर्यावरणीय बदलाव कितना घातक

Tue, 15 Sep 2026 09:00 AM IST
Seema Javed सीमा जावेद
Updated Tue, 15 Sep 2026 09:00 AM IST
सार

नेपाल की आपदा ऐसी थी, जिसे पारंपरिक चेतावनी तंत्रों से पकड़ा ही नहीं जा सकता था। वक्त आ गया है कि आपदा प्रबंधन नीति पर पुनर्विचार हो।

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Rethink Disaster Mgmt Water Security of Two Billion People at Risk Nepal like Deadly Environmental Changes
नेपाल बाढ़ त्रासदी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

'एशिया का वाटर टावर' कहा जाने वाला हिमालयी क्षेत्र, देश के करोड़ों लोगों की आस्था और जिंदगी का आधार है। यह जिन नदियों के लिए पानी की आपूर्ति करता है, उस पर भारत समेत नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों के करीब दो अरब लोग निर्भर हैं। इसलिए, हिमालय में होने वाला कोई भी बड़ा पर्यावरणीय बदलाव पूरे दक्षिण एशिया की जल सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

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26 अगस्त, 2026 को नेपाल के रसुवा जिले में हिमनद और चट्टान का एक विशाल टुकड़ा टूटकर गिरने से अचानक भयानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) आ गई। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के अनुसार, तिब्बत-नेपाल सीमा पर आई यह विनाशकारी आपदा एक ग्लेशियर के ध्वस्त होने से हुई। वैज्ञानिक अभी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इसके अचानक टूटने के पीछे कौन-से कारक थे और लंबे समय से हो रहे बदलाव की इस घटना में क्या भूमिका है। हालांकि, नेपाल ने साफ तौर से कार्बन उत्सर्जन करने में अव्वल देशों-जैसे अमेरिका और चीन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए पूरी भरपाई की मांग की है। रसुवा की घटना हिमालय में आपदा पूर्व चेतावनी प्रणालियों की एक बुनियादी सीमा भी सामने लाती है। किसी ग्लेशियर झील में पानी का स्तर बढ़ने जैसी घटनाओं को सेंसर और निगरानी प्रणालियों के जरिये ट्रैक किया जा सकता है। लेकिन, बर्फीली चट्टान का धंसना ऐसी जगहों से शुरू हो सकता है, जो सतह से दिखाई नहीं देतीं। यह किसी अस्थिर चट्टानी ढलान, ग्लेशियर या बर्फ के नीचे छिपे हिस्से से अचानक शुरू हो सकता है।
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इंटरनेशनल सिस्टम फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) के सीनियर क्रायोस्फीयर स्पेशलिस्ट और इंटरवेंशन मैनेजर डॉ. फारूक आजम के मुताबिक, रसुवा की घटना एक अभूतपूर्व और अप्रत्याशित आपदा थी। इसका पता ही नहीं चल पाया और चेतावनी जारी करने का समय भी नहीं मिला। यह ऐसी घटना थी, जिसे पारंपरिक चेतावनी प्रणालियों से नहीं पकड़ा जा सकता था। उन्होंने कहा कि इस तरह के अचानक आने वाले खतरों के लिए पारंपरिक पूर्व चेतावनी तंत्रों की क्षमता सीमित है। इसका मतलब यह भी है कि हिमालय में आपदा प्रबंधन की रणनीति केवल पूर्व चेतावनी पर निर्भर नहीं रह सकती। भूमि उपयोग की बेहतर योजना, अधिक टिकाऊ ढांचा और स्थानीय समुदायों की तैयारी को समान महत्व देना होगा।
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विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते आ रहे हैं कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति बेहद संवेदनशील है। अब इसका रंग बदल रहा है। यह जलवायु परिवर्तन से अस्थिर हो रहा है। ग्लेशियर ढहने की घटना इतनी बड़ी थी कि भूकंप मापने वाले यंत्रों ने इसे 5.2 तीव्रता के भूकंप की घटना के तौर पर दर्ज किया था। आईसीआईएमओडी की हिंदू कुश हिमालय ग्लेशियर आउटलुक 2026 में बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिंदू कुश हिमालय में ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं और 2000 के बाद से इनके द्रव्यमान में कमी की रफ्तार काफी बढ़ गई है। 50 से ज्यादा वर्षों के आंकड़ों से पता चलता है कि रिकॉर्ड किए गए वर्षों में से लगभग 89 फीसदी में ग्लेशियर का मास बैलेंस नकारात्मक रहा है, जो लगातार गिरावट को दर्शाता है। 2000 के बाद ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार भी तेज हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 21वीं सदी में हिंदू कुश हिमालय में तापमान लगभग 0.15 से 0.60 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से बढ़ा है। यह वैश्विक औसत तापमान वृद्धि की दर से अधिक है।


ग्लेशियरों का सिकुड़ना सिर्फ ऊंचे पहाड़ों तक सीमित समस्या नहीं है। इनके पिघलने से कुछ समय के लिए नदियों में पानी बढ़ सकता है, जिसे ‘पीक वाटर’ कहा जाता है। लेकिन, ग्लेशियर लगातार छोटे होते गए, तो यह अतिरिक्त पानी भी घटने लगेगा और लंबे समय में नदियों में पानी की उपलब्धता कम हो सकती है। शोध अध्ययनों के अनुसार, ब्लैक कार्बन उत्सर्जन ने दो दशकों में हिमालय में बर्फ की सतह का तापमान चार डिग्री सेल्सियस तक बढ़ाया है। नासा के 23 साल के सैटेलाइट डाटा (2000-2023) के विश्लेषण से पता चला है कि 2000 से 2019 तक ब्लैक कार्बन की मात्रा में तेजी से इजाफा हुआ, जिससे हिमालय की बर्फ लगातार सिकुड़ती गई। 2019 के बाद इसकी रफ्तार थोड़ी थमी जरूर है, पर काफी नुकसान हो चुका है। पूर्वी हिमालय में ब्लैक कार्बन सबसे अधिक पाया गया है, क्योंकि वह ज्यादा घना बसा है और वहां बायोमास जलाने की घटनाएं आम हैं। जिन क्षेत्रों में ब्लैक कार्बन का जमाव अधिक है, वहां बर्फ की सतह का तापमान अधिक और मोटाई कम है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इससे नदियों के जलस्तर पर असर पड़ेगा और करीब दो अरब लोगों की पानी की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, खासतौर पर भारत, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे देशों में।

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