Vipassana: ED-केजरीवाल के बीच विपश्यना की चर्चा क्यों? जानें 2500 साल पुरानी इस बौद्ध परंपरा के बारे में सबकुछ
विपश्यना के आधार पर दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने ईडी की पूछताछ से दूरी बना ली है। उन्होंने कहा कि इस अभ्यास के कारण वह प्रवर्तन निदेशालय (ED) के सामने पेश होने में असमर्थ हैं।
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विस्तार
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और प्रवर्तन निदेशालय के बीच चल रहे हालिया घटनाक्रम के बीच विपश्यना की चर्चा जोरों पर हैं। इसकी वजह है- केजरीवाल का ईडी के सामने पेश न होना और इसकी वजह विपश्यना को बताना। उन्होंने 10 दिनों के विपश्यना के आधार पर केंद्र की कानूनी एजेंसी के सामने पेश होने में असमर्थता जताई है।
बौद्ध धर्म के उपदेश और उनकी सीख की व्याख्या के आधार पर विकसित जीवनशैली का अहम अंग विपश्यना को माना जाता है। तनाव से शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए मेडिटेशन करने वाले लोगों विपश्यना को बेहद कारगर विकल्प मानते हैं। क्या केजरीवाल आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं? आखिर क्या होती है विपश्यना जिसके लिए केजरीवाल ने फिलहाल ईडी के सामने पेश होने से इनकार कर दिया? आइए समझें तमाम सवालों के जवाब
कहां से शुरू हुई विपश्यना; बौद्ध धर्म से क्या संबंध?
आसान भाषा में विपश्यना को मेडिटेशन (ध्यान लगाना) का एक प्रकार माना जा सकता है। तमाम तकनीकी बातों से इतर इसका सबसे बुनियादी पहलू मौन रहना है। बौद्ध धर्म से जुड़ी प्रक्रिया- विपश्यना, पाली भाषा का शब्द है। शब्दकोष के आधार पर इस शब्द के मायने समझने का प्रयास करें तो विपश्यना बिना किसी के दिखावे के खुद या किसी चीज को जानने की प्रक्रिया है। ध्यान लगाने की इस प्राचीन तकनीक का स्रोत गौतम बुद्ध की शिक्षाओं को माना जाता है। 45 साल के जीवनकाल में बुद्ध ने जो अभ्यास किया और आम लोगों को जो आध्यात्मिक शिक्षाएं दीं; विपश्यना को उन सीखों का सार माना जाता है।
दिल्ली में विपश्यना 30 साल पहले भी चर्चित हुई
केजरीवाल के बयान के कारण विपश्यना सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग की-वर्ड बन गया, लेकिन कुछ दशकों पहले दिल्ली में ही विपश्यना का अभ्यास बहुचर्चित तिहाड़ जेल में कराया जाता था। भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी होने का गौरव रखने वाली किरण बेदी तिहाड़ में 1993-95 के दौरान जेल महानिरीक्षक के रूप में पदस्थापित थीं। उन्होंने एशिया की सबसे कठिन जेल में एक गिने जाने वाले तिहाड़ का कायापलट कर दिया। रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड जीत चुकीं किरण बेदी ने कैदियों की दिनचर्या में योग, ध्यान और विपश्यना जैसी चीजों को शामिल किया।
बेदी के मुताबिक, तिहाड़ का माहौल विपश्यना का इंतजार कर रहा था। व्यवहार और लतों से छुटकारा पाने में यह विधि बेहद कारगर है। तिहाड़ के अंदर नशीली दवाओं के खतरे, यौन शोषण जैसी नकारात्मक चीजों पर नकेल कसने में विपश्यना काफी मददगार साबित हुआ। बेदी की मानें तो नॉर्वे का कैदी सजा पूरी करने के बाद ओस्लो वापस चला गया। विपश्यना का लाभ बताते हुए उसने तिहाड़ में एक पत्र भी भेजा।
मेडिटेशन की इस तकनीक को अपनाने का मकसद
सरल शब्दों में विपश्यना आत्म-निरीक्षण की प्रक्रिया है। खुद के व्यक्तित्व में बिना किसी बाहरी दबाव के बदलाव का एक प्रभावी तरीका- विपश्यना है। इसके पीछे की आध्यात्मिक सोच 'खुद को और बेहतर तरीके से जानना' है। बौद्धिक या भावनात्मक स्तर के अलावा सच्चाई की अनुभूति से मन की शांति मिलती है। विपश्यना का अभ्यास करने वाले लोगों का अनुभव है कि इसकी मदद से इंसान, खुश और उपयोगी जीवन जीना शुरू कर सकता है।
विपश्यना की शुरुआत कब और कहां?
इतिहासकारों के अनुसार, गौतम बुद्ध ने चार दशक से अधिक समय तक उपदेश दिया। इसमें एक 'सतीपत्तन सुत्त' (Satipatthana Sutta) को भी गिना जाता है। बौद्ध विद्वान बीएच गुणारत्ना के मुताबिक, विपश्यना का जिक्र इस उपदेश में मिलता है। इसे बौद्ध परंपरा में ध्यान की सबसे पुरानी प्रथा माना जाता है। गुणारत्ना के अनुसार, बुद्ध ने लगभग 2500 साल पहले ध्यान की एक पुरानी पद्धति को दोबारा खोजा। इसे बौद्ध धर्म में सबसे पुरानी- थेरवाद (Theravada) परंपरा ने आगे बढ़ाया। थेरवाद परंपरा से जुड़े उपदेशक आज भी विपश्यना की कड़ी को अटूट बनाए रखने में सफल रहे हैं।
2500 साल पुरानी परंपरा; आधुनिक समय में क्या है स्वरूप?
इतिहासकारों का मानना है कि बुद्ध के निर्वाण के लगभग पांच शताब्दी बाद, विपश्यना की परंपरा भारत से गायब हो गई। थेरवाद की लोकप्रियता घटने के कारण भारत से लगभग लुप्त हो चुकी विपश्यना का जड़ें वर्तमान समय में म्यांमार से जुड़ी हैं। माना जाता है कि यहां बौद्ध भिक्षुओं के एक वंश के बीच विपश्यना दो हजार साल से अधिक समय से संरक्षित है। 19वीं शताब्दी में विपश्यना एक बार फिर आम जनता के बीच आई। बेहद प्रभावशाली भिक्षु- लेडी सयाडॉ को इसे दोबारा लोकप्रिय बनाने का श्रेय दिया जाता है। 20वीं सदी में सयाडॉ के शिष्यों ने इसे दुनिया भर में फैलाया।
भारत में विपश्यना की 'वापसी' कैसे?
करीब 54 साल पहले एसएन गोयनका की पहल पर विपश्यना का अभ्यास भारत में एक बार फिर से शुरू हुआ। बर्मा (वर्तमान म्यांमार) में रहने वाले एक भारतीय व्यवसायी परिवार में जन्मे गोयनका माइग्रेन की परेशानी से जूझ रहे थे। 1955 में विपश्यना का अभ्यास शुरू करने वाले गोयनका, सयाजी यू बा खिन के साथ 14 साल तक जुड़े रहे। उन्होंने प्रशिक्षण पूरा करने के बाद गोयनका को विपश्यना का प्रसार करने के लिए अधिकृत किया। जुलाई, 1969 में गोयनका ने बतौर प्रशिक्षक, पहला विपश्यना सेशन आयोजित किया। बाद में उन्होंने राजस्थान के सेंट्रल जेल में विपश्यना पाठ्यक्रम 1975 और 1977 में आयोजित किया। इसे भारतीय जेल में पहला विपश्यना अभ्यास माना गया।
भारत में पहली बार विपश्यना का केंद्र महाराष्ट्र में
लोकप्रियता बढ़ने के बाद गोयनका ने भारत के अलावा पश्चिमी दुनिया के देशों में भी विपश्यना का प्रशिक्षण दिया। भारत में पहली बार विपश्यना का केंद्र महाराष्ट्र के नासिक में साल 1976 में खोला गया। विपश्यना के सकारात्मक प्रभाव और इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि करीब पांच दशक पहले शुरू हुई मुहिम के तहत आज दुनिया में इसके 380 से अधिक केंद्र हैं। 2013 में गोयनका का निधन हो गया, लेकिन विपश्यना की विरासत लगातार आगे बढ़ रही है।
बौद्ध धर्म की परंपरा; क्या विपश्यना सीखने के लिए बौद्ध होना जरूरी ?
भले ही विपश्यना की जड़ें गौतम बुद्ध और बौद्ध परंपरा थेरवाद से जुड़ी हैं, लेकिन यह शुद्ध रूप से मेडिटेशन और ध्यान की प्रक्रिया है। इसके लिए बौद्ध होना जरूरी नहीं। कोई धार्मिक प्रथा का अभ्यास नहीं कराया जाता। जिस तरह 'बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति' हुई, ठीक वैसे ही विपश्यना का अभ्यास खुद की गहराई समझने में मदद करता है। इस पर शोध करने वाली वेबसाइट के अनुसार, विपश्यना में किताब, सिद्धांत या बौद्धिक अभ्यास जैसी चीजें शामिल नहीं होती हैं।
विपश्यना के तीन चरण होते हैं; जानिए प्रशिक्षण का तरीका
विपश्यना की पहली सीढ़ी का नाम है 'सिला' या नैतिकता (sila or morality) का अभ्यास। इस चरण के दौरान चोरी, झूठ बोलना और नशीली दवाओं के इस्तेमाल, हत्या और यौन दुर्व्यवहार जैसी चीजों से परहेज सिखाया जाता है।
दूसरे चरण में अनापान ध्यान (Anapana meditation) होता है। इसमें विपश्यना का अभ्यास करने वाले शख्स को खुद की सांस पर ध्यान केंद्रित करने का अभ्यास कराया जाता है। इस अभ्यास की मदद से चंचल मन को शांत करने और मानसिक व्यग्रता पर नियंत्रण पाया जा सकता है। 10 दिवसीय कोर्स में पहले साढ़े तीन दिनों तक अनापान ध्यान कराया जाता है।
तीसरे और अंतिम पड़ाव पर वास्तविक विपश्यना अभ्यास होता है। इसमें पन्ना (panna alias wisdom, insight) यानी खुद की बुद्धि और अंतर्दृष्टि को साफ तरीके से समझने का प्रयास किया जाता है। अभ्यास करने वाला अपनी संपूर्ण शारीरिक और मानसिक संरचना की अनुभूति का प्रयास करता है।
विपश्यना के दिन की शुरुआत, दिनचर्या कैसी?
मेडिटेशन जैसे इस अभ्यास में एक सामान्य दिन कैसे शुरू होता है? यह सवाल भी स्वाभाविक है। शोध और विपश्यना से जुड़े लोगों के अनुसार, आम तौर पर दिन की शुरुआत आधी रात के चार घंटे बाद हो जाती है। यानी कई जगहों इसे ब्रह्म मुहूर्त के रूप में भी जाना जाता है। तड़के 4 बजे दिन की शुरुआत के बाद रात 9.30 बजे खत्म हो जाती है। 17 घंटे से अधिक की दिनचर्या के दौरान ध्यान के कई राउंड होते हैं। इसके अलावा विपश्यना का अभ्यास करा रहे प्रशिक्षक के सामने अपनी जिज्ञासा शांत करना और प्रशिक्षक का उपदेश भी सुनना होता है। भोजन के लिए ब्रेक भी मिलता हैं। हालांकि, दोपहर के बाद खाने से परहेज करना बेहतर बताया जाता है। प्रशिक्षकों के अनुसार, विपश्यना के अभ्यास के दौरान शाम के समय चाय या फल का सेवन किया जा सकता है।
विपश्यना का कोर्स कितना महंगा ?
अब क्योंकि विपश्यना का पूरा प्रोसेस ध्यान / मेडिटेशन और आध्यात्म से जुड़ा है। इसका कोर्स करने पर किसी तरह का भुगतान नहीं करना होता। पाठ्यक्रम पूरी तरह से दान के आधार पर आयोजित किए जाते हैं। हालांकि, दान के लिए भी शर्तें निर्धारित हैं। कम से कम एक बार कोर्स करने वाले लोग ही विपश्यना के भावी कोर्स के लिए अपनी क्षमता और इच्छा के मुताबिक आर्थिक सहयोग कर सकते हैं।
10-दिवसीय विपश्यना अधिक लोकप्रिय क्यों?
आध्यात्म और मेडिटेशन काफी लंबी प्रक्रिया भी है। हालांकि, सीएम अरविंद केजरीवाल ने विपश्यना के लिए 10 दिनों तक चलने वाला कोर्स चुना है। ऐसे में यह जानना काफी अहम है कि 10 दिवसीय विपश्यना में क्या होता है? यह कोर्स कैसे काम करता है? यह सबसे लोकप्रिय पाठ्यक्रम क्यों माना जाता है?
दरअसल, 10 दिवसीय विपश्यना के दौरान अभ्यास करने वाले लोगों को बाहरी दुनिया से संपर्क खत्म करना होता है। इस अवधि में पढ़ने-लिखने, कामुक मनोरंजन और नशे से भी परहेज का निर्देश दिया जाता है। सामूहिक अभ्यास के बावजूद साथियों के साथ संवाद नहीं करना जरूरी है। 'मौन' और अनुशासन का पालन सख्ती से करना होता है। हालांकि, विपश्यना का अभ्यास करने वाले लोग बताते हैं कि 10 दिनों की अवधि में अगर कोई जिज्ञासा आती है तो अभ्यास करा रहे शिक्षकों से सवाल पूछे जा सकते हैं।