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Cyrus Mistry: हादसे से पहले इस अग्नि मंदिर गए थे सायरस मिस्त्री, जानें इसके बारे में सब कुछ

Tue, 06 Sep 2022 10:44 AM IST
जयदेव सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जयदेव सिंह Updated Tue, 06 Sep 2022 10:44 AM IST
सार

हाल ही में इस मंदिर का जिर्णोद्धार भी सायरस मिस्त्री के परिवार की कंपनी शपूरजी पलोनजी समूह ने किया था। सायरस से पहले उनके पिता भी इस मंदिर के देखरेख का सारा खर्च उठाते थे। आइये इस मंदिर के बारे में जानते हैं…

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Know About Iranshah Atash Behram where Cyrus Mistry visited before Accident
ईरानशाह आतश बेहराम अग्नि मंदिर। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

टाटा संस के पूर्व चेयरमैन सायरस मिस्त्री की रविवार को सड़क हादसे में मौत हो गई। आज मंगलवार को उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। हादसा महाराष्ट्र के पालघर में हुआ। घटना के वक्त सायरस अपने दोस्तों के साथ गुजरात के उदवाड़ा से मुंबई लौट रहे थे। ये सभी उदवाड़ा स्थिति ईरानशाह आतश बेहराम अग्नि मंदिर गए थे।

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यह अग्नि मंदिर दुनियाभर के पारसियों का सबसे पवित्र अग्नि मंदिर है। मंदिर गुजरात के वलसाड जिले में है। हाल ही में इसका जिर्णोद्धार भी सायरस मिस्त्री के परिवार की कंपनी शपूरजी पलोनजी समूह ने कराया था। ईरानशाह अग्नि मंदिर के साथ ही यहां की धर्मशाला का रेनोवेशन भी सायरस और उनके परिवार ने करवाया था। यहां देखरेख का सारा खर्च भी उनका परिवार उठाता है। आइये इस मंदिर के बारे में जानते हैं…

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अग्नि मंदिर - फोटो : अमर उजाला

कहां है मंदिर? 
उदवाड़ा गुजरात के सूरत से करीब 120 किलोमीटर दूर अरब सागर के तट पर बसा है। यह शहर विश्वभर के पारिसियों के लिए श्रद्धा का मुख्य केंद्र है। चाहे नया व्यापार हो या नई कार, नई शादी या बच्चे का जन्म। हर अहम मौके पर पारसी समुदाय के लोग यहां आकर ईरानशाह आतश बेहराम की पूजा करते हैं। पारसी समुदाय के लोगों में इसका महत्व वैसा ही जैसा ईसाइयों में वेटिकन, मुस्लिमों में मक्का-मदीना का है। लोग दूर-दूर से इस अग्नि मंदिर में आते हैं। 

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अग्नि मंदिर - फोटो : अमर उजाला

कैसे होती है पूजा?
पारसी समुदाय में ईश्वर की रचनाओं की पूजा करने की बात कही गई है। पारसियों के लिए अपने ईश्वर का प्रतिबिम्ब अग्नि है। उदवाड़ा में स्थित इस मंदिर में पवित्र अग्नि सदियों से प्रकाशमान है। इस पवित्र अग्नि के दर्शन के लिए पारसी समुदाय के लोग दूर-दूर से यहां आते हैं। इस अखंड ज्योत को ही पारसी ईरानशाह आतश बेहराम के नाम से जानते हैं। दरअसल पारसी धर्म पर्यावरण उन्मुख धर्म है। इस धर्म में ईश्वर की मूर्ति नहीं होती है। न ही मूर्ति पूजा होती है। इस धर्म के लोग ईश्वर की पूजा ईश्वर की रचना के जरिए करते हैं। ईश्वर की सबसे पवित्र रचना अग्नि को माना गया है। आतश का मतलब होता है अग्नि और बेहराम का अर्थ है विजय। यानि, विजय की अग्नि। इस आतश बेहराम को ईरानशाह के नाम से जाना जाता है। 

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अग्नि मंदिर - फोटो : अमर उजाला

इस अग्नि मंदिर का नाम ईरानशाह क्यों है?
ईरानशाह का अर्थ है ईरान के राजा। पारसी लोग ईरान से हिन्दुस्तान आए। जब इस धर्म के लोगों ने ईरान छोड़ा तो उन्हें पता था कि किसी दूसरे देश में उनके राजा नहीं होंगे। उन्हें ये भी पता था कि बदली राजनीतिक परिस्थितियों में वह वापस लौटकर ईरान भी नहीं जा पाएंगे। इसीलिए इस पवित्र अग्नि को ईरानशाह नाम दिया गया। यानी, इस अग्नि को पारसियों ने अपने राजा का दर्जा दिया। इसे वह अपने मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं। यह अग्नि पारसी समुदाय के लोगों की सबसे पवित्र अग्नि मानी जाती है। बेहराम को लेकर भी एक किस्सा है। कहा जाता है कि जब पारसी लोग ईरान से समुद्र के रास्ते हिन्दुस्तान आ रहे थे तब उनका जहाज तूफान में फंस गया। तब इन लोगों ने फरिश्ते बेहराम से मदद के लिए प्रार्थना की। तब पारसी लोगों ने उनसे ये वादा किया था कि जिस भी जगह वो लोग जाएंगे वहां बेहराम के नाम पर आतश की स्थापना करेंगे। 
 

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पारसी समुदाय - फोटो : अमर उजाला

भारत में सबसे पहले कहां पहुंचे पारसी?
उदवाड़ा से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित संजान में 724 ई. में पहली बार पारसी ईरान से भारत में आए थे। संजान में आज भी आतश को दर्शाता एक स्मारक बना है। इसे संजान स्तंभ कहते हैं। संजान में जिस आतश की स्थापना हुई वही नौसारी फिर वांसडा, वहां से सूरत, सूरत से वापस नौसारी से वलसाड़ और आखिर में उदवाड़ा पहुंची। वही आतश सदियों से उदवाड़ा में जल रहा है।  

जिस मंदिर से लौट रहे थे, वहां के पुजारी ने क्या कहा? 
सायरस गुजरात के उदवाड़ा स्थित अग्नि मंदिर से मुंबई लौट रहे थे। उसी दौरान हादसा हुआ। अग्नि मंदिर के पुजारी का बयान आया है। उन्होंने कहा, 'पालोनजी के निधन के बाद सायरस ने हमारे ईरानशाह अग्नि मंदिर और धर्मशाला का रेनोवेशन करवाया था। शपोरजी पलोनजी ग्रुप ने पारसी समाज के विकास के लिए सबसे ज्यादा दान दिया है। यहां देखरेख का सारा खर्च भी वही उठाते हैं। हर कार्यक्रम में सबसे पहले उनके परिवार के लोग यहां पहुंचते थे।'

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