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जगमोहन: स्मृति शेष कश्मीरी पंडितों के मसीहा बने, जम्मू को दिलाई बराबरी
Wed, 05 May 2021 06:57 AM IST
Jeet Kumar
अमर उजाला रिसर्च टीम
अमर उजाला रिसर्च टीम
Published by: Jeet Kumar
Updated Wed, 05 May 2021 06:57 AM IST
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सार
- आतंकवाद की कमर तोड़ने में अहम योगदान
- 26 जनवरी 1990 को घाटी में ‘आजादी’ की साजिश की नाकाम
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Jammu Kashmir Former Governor Jagmohan Malhotra
- फोटो :
सोशल मीडिया
विस्तार
जगमोहन मल्होत्रा शायद इकलौती ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने नौकरशाही से राजनीति तक अपना तेवर बरकरार रखा। बतौर अधिकारी वह सख्त छवि के लिए जाने गए तो राजनीति में उन्होंने कड़े फैसलों से ख्याति पाई। दिल्ली में डीडीए से लेकर जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल तक का उनका सफर विपरीत हालात में काम करते हुए बीता।
1962 में आईएएस बने जगमोहन सबसे पहले आपातकाल में दिल्ली के सौंदर्यीकरण को लेकर चर्चित हुए थे। फिर दिल्ली के उपराज्यपाल और गोवा, दमन-दीव के राज्यपाल भी बनाए गए। इसके बाद जीवन का सबसे बड़ा इम्तिहान देने बतौर राज्यपाल जम्मू-कश्मीर पहुंचे।
पहली दफा 1984 में जब वहां पहुंचे तो उस दौरान घाटी में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ने लगी थीं और कश्मीर पंडितों के खिलाफ माहौल बनने लगा था। 1990 में जब वह दोबारा श्रीनगर पहुंचे तो माहौल पूरी तरह चरमपंथी हो चुका था और और कश्मीरी पंडितों का पलायन शुरू हो चुका था। तब उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ जो सख्त नीतियां अपनाईं, उससे उस दौर में न सिर्फ कट्टरपंथियों की कमर टूटी बल्कि कश्मीर भारत का हिस्सा बना रहा।
26 जनवरी को आतंकी साजिश की नाकाम
दरअसल, 1990 में जब 19 जनवरी की जिस शाम वह शपथ ले रहे थे, तब हर ओर मस्जिदों से हिंदुओं के खिलाफ ही आवाजें गूंज रही थीं। एक हफ्ते बाद 26 जनवरी को आतंकवादियों का मंसूबा कश्मीर में इस्लाम का झंडा फहराकर आजादी की घोषणा करना था। लेकिन जगमोहन को इस साजिश का पता चल गया था और उन्होंने इसे विफल बनाने की रणनीति तैयार कर 25 जनवरी की दोपहर से ही श्रीनगर में कर्फ्यू लगा दिया।
उन्होंने तय किया कि वह गणतंत्र दिवस की सलामी के लिए शहर छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। सभी सरकारी विभागों से लेकर गली-चौराहों, सड़कों पर बत्तियां जली रहने के आदेश दिए गए। 26 तारीख की पूर्व संध्या पर पूरा श्रीनगर रोशन हो उठा।
इससे आतंकियों का इस्लाम का झंडा लहराकर आजादी के एलान का मंसूबा पूरा नहीं हो सका। उनके सख्त कदमों ने ही जेकेएलएफ की जड़ों को घाटी में कमजोर किया। पूर्व सीएम मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी को आतंकवादियों से रिहा कराने में उनकी बड़ी भूमिका रही।
पंडितों ने माना मसीहा
हालांकि, डर के माहौल में कश्मीरी पंडितों का घाटी छोड़कर जाना जारी रहा। जगमोहन के कार्यकाल में ही पंडितों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। लेकिन पंडित घाटी से सुरक्षित निकल पाने का श्रेय जगमोहन को ही देते हैं और उन्हें आज भी मसीहा मानते हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने तो यहां तक कहा था कि जगमोहन ने ही भारत के लिए कश्मीर को बचाया।
जम्मू को सम्मान लौटाया
घाटी में आतंकवाद पर लगाम लगाने के साथ उन्होंने जम्मू को बराबरी देने की पुरजोर कोशिश की। शहर में फ्लाईओवर बनवाने से लेकर माता वैष्णो देवी स्थापना बोर्ड बनाकर धार्मिक स्थल पर विश्वस्तरीय सुविधाएं खड़ी कीं।
जगमोहन को जम्मूवासियों का उनसे काफी लगाव था। वह इकलौते ऐसे राज्यपाल हैं, जिनके दूसरी बार प्रदेश पहुंचने की खुशी में जम्मूवासियों ने घरों में दीपक जलाकर दिवाली मनाई थी। भाजपा ने जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद संपर्क अभियान शुरू किया था तो गृहमंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा जगमोहन से मिलने उनके घर पहुंचे थे।
पहले इंदिरा और फिर वीपी सिंह ने भेजा
जगमोहन को पहली दफा 1984 में कांग्रेस सरकार ने जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया था। हालांकि उनके निर्णयों को लेकर कांग्रेस से उनके मतभेद भी रहे। दूसरी बार जनवरी 1990 में वीपी सिंह सरकार में वह श्रीनगर पहुंचे और कई पद पर रहे।
मंत्रालय और पुरस्कार
1990 में वह राज्यसभा के लिए चुने गए। फिर 1996, 1998 और 1999 में दिल्ली से भाजपा के सांसद बने। उन्होंने शहरी विकास, पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय संभाला। उन्हें उल्लेखनीय कार्यों के लिए 1977 में पद्म भूषण, 1991 में पद्मश्री और 2016 में पद्म विभूषण सम्मान से नवाजा गया।