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जब स्कूल में टीचर ने किशोर दा से कहा जिंदगी में काम नहीं आएगा गाना-बजाना, दिया था ये जवाब

Fri, 03 Aug 2018 06:18 PM IST
भाषा, इंदौर
भाषा, इंदौर Updated Fri, 03 Aug 2018 06:18 PM IST
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kishor kumar school education report card
हिन्दुस्तानी फिल्म जगत के हरफनमौला कलाकार किशोर कुमार का मन लड़कपन से ही पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा गीत-संगीत में रमता था। उनकी हाई स्कूल परीक्षा की मार्कशीट इस बात की गवाही देती है जिसमें उन्हें छह विषयों में कुल 800 में से 326 अंक मिले थे और वह तृतीय श्रेणी में पास हुए थे।
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इस मार्कशीट की प्रति को इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर स्वरूप बाजपेई ने किशोर की यादों के साथ करीने से संजोकर रखा है।

उन्होंने किशोर कुमार की 89वीं जयंती की पूर्व संध्या पर आज "पीटीआई-भाषा" को बताया, "किशोर की अंकसूची की यह प्रति हमारे कॉलेज की दशकों पुरानी फाइलों में दबी पड़ी थी जिस पर धूल की मोटी परत चढ़ गयी थी। हमने इसे ढूंढ निकाला, क्योंकि यह दस्तावेज एक महान कलाकार के विद्यार्थी जीवन के अहम पड़ाव से जुड़ा है।" 
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बाजपेई ने बताया कि खंडवा के मूल निवासी किशोर कुमार जब वर्ष 1946 में मैट्रिक पास कर इंटरमीडिएट में पहुंचे, तो उनके पिता कुंजलाल गांगुली ने उनका दाखिला इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में करा दिया था।
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तत्कालीन ब्रितानी राज के मध्य प्रांत एवं बरार के नागपुर स्थित हाई स्कूल शिक्षा बोर्ड की वर्ष 1946 में आयोजित परीक्षा किशोर कुमार ने हिन्दी माध्यम से दी थी और इसमें उनका रोल नम्बर था-"4197" था। 

टेबल को तबले की तरह बजा रहे थे

kishor kumar school education report card

हाई स्कूल शिक्षा बोर्ड की दो जुलाई 1946 को जारी अंकसूची बताती है कि किशोर कुमार को अंग्रेजी और इसके साथ पढ़ाये जाने वाले एक अन्य विषय में 175 में से 69 अंक, सामान्य ज्ञान में 25 में से नौ अंक, रसायन शास्त्र एवं भौतिकी (सैद्धांतिक) में 150 में से 64 अंक, भूगोल एवं प्रारंभिक इतिहास में 150 में से 64 अंक, हिन्दी में 150 में से 67 अंक और ड्राइंग में 150 में से 53 अंक प्राप्त मिले थे। क्रिश्चियन कॉलेज में बरसों से इतिहास पढ़ा रहे बाजपेई के पास अपने संस्थान के इस पूर्व छात्र के दिलचस्प किस्सों की लम्बी फेहरिस्त है, जो बाद में भारतीय फिल्म जगत का बड़ा सितारा बना।

वह बताते हैं कि कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही किशोर ने तय कर लिया था कि उन्हें जीवन में क्या करना है। साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी महाविद्यालयीन संस्था "बज्म-ए-अदब" की कार्यकारिणी में भी किशोर शामिल थे। 

उन्होंने बताया, "एक बार नागरिक शास्त्र के पीरियड में किशोर अपनी कक्षा में टेबल को तबले की तरह बजा रहे थे। प्रोफेसर ने उन्हें फटकार लगाते हुए हिदायत दी कि वह पढ़ाई पर ध्यान दें, क्योंकि गाना-बजाना उन्हें जिंदगी में बिल्कुल काम नहीं आयेगा। इस पर किशोर ने अपने अध्यापक को मुस्कुराते हुए जवाब दिया था कि इसी गाने-बजाने से उनके जीवन का गुजारा होगा।" 

इमली का पेड़ नौजवान किशोर की अल्हड़ सुर लहरियों का गवाह

kishor kumar school education report card

क्रिश्चियन कॉलेज परिसर के खेल के मैदान में आज भी मौजूद इमली का पेड़ नौजवान किशोर की अल्हड़ सुर लहरियों का गवाह है। किशोर लेक्चर से भाग कर इस पेड़ के नीचे यार-दोस्तों की मंडली जमाने के लिए प्रोफेसरों के बीच "कुख्यात" थे।

बाजपेई ने बताया कि किशोर कुमार इमली के पेड़ के नीचे 'यॉडलिंग' (गायन की एक विदेशी शैली) का अभ्यास भी करते थे। उन्होंने खासकर पुरानी हिंदी फिल्मों के गीतों में इस शैली का कई बार खूबसूरती से इस्तेमाल किया और श्रोताओं को गायकी की अपनी इस खास अदा का दीवाना बनाया।

किशोर कुमार अपने छोटे भाई अनूप कुमार के साथ क्रिश्चियन कॉलेज के पुराने हॉस्टल की पहली मंजिल के एक कमरे में रहते थे। मौसम की मार सहने और संरक्षण के अभाव में करीब 100 साल पुराना होस्टल अब खण्डहर में बदल गया है। ऐसा कहा जाता है कि हॉस्टल के उनके कमरे में किताबें कम और तबला, हारमोनियम तथा ढोलक जैसे वाद्य यंत्र ज्यादा रहते थे।

बाजपेई ने बताया कि किशोर कुमार वर्ष 1948 में पढ़ाई अधूरी छोड़कर इंदौर से मुंबई चले गये थे। लेकिन क्रिश्चियन कॉलेज के कैंटीन वाले के उन पर पांच रुपये और 12 आने (उस समय प्रचलित मुद्रा) उधार रह गए थे।

माना जाता है कि यह बात किशोर कुमार को याद रह गयी थी और उधारी की इसी रकम से 'प्रेरित' होकर फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' (1958) के मशहूर गीत "पांच रुपैया बारह आना..." का मुखड़ा लिखा गया था। इस गीत को खुद किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने आवाज दी थी।

चार अगस्त 1929 को मध्यप्रदेश (तब मध्य प्रांत एवं बरार) के खंडवा में पैदा हुए किशोर का वास्तविक नाम आभास कुमार गांगुली था। उनका निधन 13 अक्तूबर 1987 को मुंबई में हुआ था।

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