{"_id":"5be54285bdec2253c95873e5","slug":"khow-all-about-real-life-thugs-of-hindustan-of-british-rule-era","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"कौन थे असली 'ठग्स ऑफ हिंदुस्तान' जिनसे अंग्रेज भी डरते थे","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
कौन थे असली 'ठग्स ऑफ हिंदुस्तान' जिनसे अंग्रेज भी डरते थे
बीबीसी हिंदी
Updated Fri, 09 Nov 2018 01:47 PM IST
विज्ञापन
Real Thugs of Hindustan
- फोटो : BBC Hindi
ठग शब्द सुनते ही लोगों के दिमाग में एक चालाक और मक्कार आदमी की तस्वीर उभरती है जो झांसा देकर कुछ कीमती सामान ठग लेता है लेकिन भारत में 19वीं सदी में जिन ठगों से अंग्रेजों का पाला पड़ा था, वे इतने मामूली लोग नहीं थे।
ठगों के बारे में सबसे दिलचस्प और पुख्ता जानकारी 1839 में छपी किताब 'कनफेशंस ऑफ ए ठग' से मिलती है। किताब के लेखक पुलिस सुप्रीटेंडेंट फिलिप मीडो टेलर थे लेकिन किताब की भूमिका में उन्होंने बताया है कि उन्होंने 'इसे सिर्फ कलमबंद किया है।'
दरअसल, साढ़े पांच सौ पन्नों की किताब ठगों के एक सरदार आमिर अली खां का 'कनफेशन' यानी इकबालिया बयान है। फिलिप मीडो टेलर ने आमिर अली से जेल में कई दिनों तक बात की और सब कुछ लिखते गए। टेलर के मुताबिक, "ठगों के सरदार ने जो कुछ बताया, उसे मैं तकरीबन शब्दश: लिखता गया, यहां तक कि उसे टोकने या पूछने की जरूरत भी कम ही पड़ती थी।"
विज्ञापन
आमिर अली का बयान इतना ब्यौरेवार और दिलचस्प है कि वह एक उपन्यास बन गया और छपते ही उसने धूम मचा दी। रूडयार्ड किपलिंग के मशहूर उपन्यास 'किम' (1901) से करीब 60 साल पहले छपी इस किताब एक और खासियत थी कि यह किसी अंग्रेज का नजरिया नहीं बल्कि एक हिंदुस्तानी ठग का 'फर्स्ट पर्सन अकाउंट' है।
टेलर का कहना है कि आमिर अली जैसे सैकड़ों सरगना थे जिनकी देखरेख में ठगी का धंधा चल रहा था। आमिर अली से जब टेलर ने पूछा कि तुमने कितने लोगों को मारा तो उसने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे साहब, वो तो मैं पकड़ा गया, नहीं तो हजार पार कर लेता। आप लोगों ने 719 पर ही रोक दिया।"
ठगी का आलम ये था कि अंग्रेजों को इनसे निबटने के लिए एक अलग डिपार्टमेंट बनाना पड़ा था, वही विभाग आगे चलकर इंटेलिजेंस ब्यूरो या आईबी के नाम से जाना गया।
टेलर ने लिखा है, "अवध से लेकर दक्कन तक ठगों का जाल फैला था, उन्हें पकड़ना इसलिए बहुत मुश्किल था क्योंकि वे बहुत खुफिया तरीके से काम करते थे। उन्हें आम लोगों से अलग करने का कोई तरीका ही समझ नहीं आता था। वे अपना काम योजना बनाकर और बेहद चालाकी से करते थे ताकि किसी को शक न हो।"
ठगों से निबटने के लिए बने डिपार्टमेंट के सुपरिटेंडेंट कैप्टन रेनॉल्ड्स ने 1831 से 1837 के बीच ठगों पर हुई कार्रवाइयों का 1838 में ब्योरा दिया था। इस ब्योरे के मुताबिक, पकड़े गए जिन 1059 लोगों का दोष पूरी तरह साबित नहीं हो सका उन्हें दूर मलेशिया के पास पेनांग टापू पर ले जाकर छोड़ दिया गया ताकि वे दोबारा वारदात न कर सकें। इसके अलावा, 412 को फांसी दी गई और 87 को आजीवन कारावास की सजा हुई।
विज्ञापन
ठगों के बारे में सबसे दिलचस्प और पुख्ता जानकारी 1839 में छपी किताब 'कनफेशंस ऑफ ए ठग' से मिलती है। किताब के लेखक पुलिस सुप्रीटेंडेंट फिलिप मीडो टेलर थे लेकिन किताब की भूमिका में उन्होंने बताया है कि उन्होंने 'इसे सिर्फ कलमबंद किया है।'
विज्ञापन
दरअसल, साढ़े पांच सौ पन्नों की किताब ठगों के एक सरदार आमिर अली खां का 'कनफेशन' यानी इकबालिया बयान है। फिलिप मीडो टेलर ने आमिर अली से जेल में कई दिनों तक बात की और सब कुछ लिखते गए। टेलर के मुताबिक, "ठगों के सरदार ने जो कुछ बताया, उसे मैं तकरीबन शब्दश: लिखता गया, यहां तक कि उसे टोकने या पूछने की जरूरत भी कम ही पड़ती थी।"
विज्ञापन
आमिर अली का बयान इतना ब्यौरेवार और दिलचस्प है कि वह एक उपन्यास बन गया और छपते ही उसने धूम मचा दी। रूडयार्ड किपलिंग के मशहूर उपन्यास 'किम' (1901) से करीब 60 साल पहले छपी इस किताब एक और खासियत थी कि यह किसी अंग्रेज का नजरिया नहीं बल्कि एक हिंदुस्तानी ठग का 'फर्स्ट पर्सन अकाउंट' है।
टेलर का कहना है कि आमिर अली जैसे सैकड़ों सरगना थे जिनकी देखरेख में ठगी का धंधा चल रहा था। आमिर अली से जब टेलर ने पूछा कि तुमने कितने लोगों को मारा तो उसने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे साहब, वो तो मैं पकड़ा गया, नहीं तो हजार पार कर लेता। आप लोगों ने 719 पर ही रोक दिया।"
ठगी का आलम ये था कि अंग्रेजों को इनसे निबटने के लिए एक अलग डिपार्टमेंट बनाना पड़ा था, वही विभाग आगे चलकर इंटेलिजेंस ब्यूरो या आईबी के नाम से जाना गया।
टेलर ने लिखा है, "अवध से लेकर दक्कन तक ठगों का जाल फैला था, उन्हें पकड़ना इसलिए बहुत मुश्किल था क्योंकि वे बहुत खुफिया तरीके से काम करते थे। उन्हें आम लोगों से अलग करने का कोई तरीका ही समझ नहीं आता था। वे अपना काम योजना बनाकर और बेहद चालाकी से करते थे ताकि किसी को शक न हो।"
ठगों से निबटने के लिए बने डिपार्टमेंट के सुपरिटेंडेंट कैप्टन रेनॉल्ड्स ने 1831 से 1837 के बीच ठगों पर हुई कार्रवाइयों का 1838 में ब्योरा दिया था। इस ब्योरे के मुताबिक, पकड़े गए जिन 1059 लोगों का दोष पूरी तरह साबित नहीं हो सका उन्हें दूर मलेशिया के पास पेनांग टापू पर ले जाकर छोड़ दिया गया ताकि वे दोबारा वारदात न कर सकें। इसके अलावा, 412 को फांसी दी गई और 87 को आजीवन कारावास की सजा हुई।
ठगों की खुफिया रहस्यमय जिंदगी
ठगों के लिए अंग्रेजों ने 'सीक्रेटिव कल्ट', 'हाइवे रॉबर्स' और 'मास मर्डरर' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है। 'कल्ट' कहे जाने की वजह ये है कि उनके अपने रीति-रिवाज, विश्वास, मान्यताएं, परंपराएं, उसूल और तौर-तरीके थे जिनका वे बहुत पाबंदी से धर्म की तरह पालन करते थे। उनकी अपनी एक अलग खुफिया भाषा थी जिसमें वे आपस में बात करते थे। इस भाषा को रमासी कहा जाता था।
भारत में ठगों की कमर तोड़ने का श्रेय मेजर जनरल विलियम हेनरी स्लीमन को दिया जाता है जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने 'सर' के खिताब से नवाजा था। स्लीमन ने लिखा है, "ठगों के गिरोह में हिंदू और मुसलमान दोनों हैं। ठगी की शुरुआत कैसे हुई यह बता पाना नामुमकिन है, लेकिन ऊंचे रुतबे वाले शेख से लेकर खानाबदोश मुसलमान और हर जाति के हिंदू इसमें शामिल थे।"
मुहूर्त से होता था हर काम
चाहे हिंदू हों या मुसलमान, ठग शुभ मूहूर्त देखकर, विधि-विधान से पूजा-पाठ करके अपने काम पर निकलते थे, जिसे 'जिताई पर जाना' कहा जाता था। ठगी का मौसम आम तौर पर दुर्गापूजा से लेकर होली के बीच होता था। तेज गर्मी और बारिश में रास्तों पर मुसाफिर भी कम मिलते थे और काम करना मुश्किल होता था। अलग-अलग गिरोह अपनी आस्था के हिसाब से मंदिरों में दर्शन करने जाते थे।
ज्यादातर ठग गिरोह मां काली की पूजा करते थे। इसके अलावा वे हर अगले कदम से पहले शकुन और अपशकुन का विचार करते थे। उल्लू के बोलने, कौव्वे के उड़ने, मोर के चिल्लाने, लोमड़ी के दिखने जैसी हर चीज का वे अपने हिसाब से मतलब निकालते थे।
जिताई पर जाने से सात दिन पहले से 'साता' शुरू जाता था। इस दौरान ठग और उनके परिवार के सदस्य खाने-पीने, सोने-उठने और नहाने-हजामत बनाने वगैरह के मामले में कड़े नियमों का पालन करते थे।
साता के दौरान बाहर के लोगों से मेल-जोल, किसी और को बुलाना या उसके घर जाना नहीं होता था। इस दौरान कोई दान नहीं दिया जाता था, यहां तक कि कुत्ते-बिल्ली जैसे जानवरों को भी खाना नहीं दिया जाता था। जिताई से सफल होकर लौटने के बाद पूजा-पाठ और दान-पुण्य जैसे काम होते थे।
भारत में ठगों की कमर तोड़ने का श्रेय मेजर जनरल विलियम हेनरी स्लीमन को दिया जाता है जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने 'सर' के खिताब से नवाजा था। स्लीमन ने लिखा है, "ठगों के गिरोह में हिंदू और मुसलमान दोनों हैं। ठगी की शुरुआत कैसे हुई यह बता पाना नामुमकिन है, लेकिन ऊंचे रुतबे वाले शेख से लेकर खानाबदोश मुसलमान और हर जाति के हिंदू इसमें शामिल थे।"
मुहूर्त से होता था हर काम
चाहे हिंदू हों या मुसलमान, ठग शुभ मूहूर्त देखकर, विधि-विधान से पूजा-पाठ करके अपने काम पर निकलते थे, जिसे 'जिताई पर जाना' कहा जाता था। ठगी का मौसम आम तौर पर दुर्गापूजा से लेकर होली के बीच होता था। तेज गर्मी और बारिश में रास्तों पर मुसाफिर भी कम मिलते थे और काम करना मुश्किल होता था। अलग-अलग गिरोह अपनी आस्था के हिसाब से मंदिरों में दर्शन करने जाते थे।
ज्यादातर ठग गिरोह मां काली की पूजा करते थे। इसके अलावा वे हर अगले कदम से पहले शकुन और अपशकुन का विचार करते थे। उल्लू के बोलने, कौव्वे के उड़ने, मोर के चिल्लाने, लोमड़ी के दिखने जैसी हर चीज का वे अपने हिसाब से मतलब निकालते थे।
जिताई पर जाने से सात दिन पहले से 'साता' शुरू जाता था। इस दौरान ठग और उनके परिवार के सदस्य खाने-पीने, सोने-उठने और नहाने-हजामत बनाने वगैरह के मामले में कड़े नियमों का पालन करते थे।
साता के दौरान बाहर के लोगों से मेल-जोल, किसी और को बुलाना या उसके घर जाना नहीं होता था। इस दौरान कोई दान नहीं दिया जाता था, यहां तक कि कुत्ते-बिल्ली जैसे जानवरों को भी खाना नहीं दिया जाता था। जिताई से सफल होकर लौटने के बाद पूजा-पाठ और दान-पुण्य जैसे काम होते थे।
इसी तरह 'इटब' के नियमों का पालन होता था। ठगों का मानना था कि काम पर निकलने से पहले पूर्ण रूप से पवित्र होना बहुत जरूरी होता था। गिरोह के किसी ठग के घर में कोई जन्म या मृत्यु होने पर दस दिनों के लिए, पालतू जानवरों की मौत होने पर तीन दिन के लिए, और इसी तरह जन्म होने पर सात दिन के लिए या तो पूरा गिरोह रुक जाता था या वह ठग काम पर नहीं जाता था, जिसके परिवार जन्म या मृत्यु हुई हो।
'कस्सी' का महत्व
मारे जाने वाले लोगों की कब्र जिस कुदाल से खोदी जाती थी, उसे 'कस्सी' कहा जाता था। कस्सी सबसे ज्यादा आदर की चीज थी। गहरे रिसर्च के बाद उर्दू और हिंदी में लिखे बहुचर्चित उपन्यास 'कई चांद थे सरे आसमां' में शम्सुर्रहमान फारूकी ने कस्सी की पूजा का वर्णन कुछ इस तरह किया है।
"एक साफ सुथरी जगह पर थाली में पानी से कुदाली को धो दिया जाता है। फिर पूजा की विधि जानने वाला ठग बीच में बैठता है, बाकी ठग नहा-धोकर उसके चारों तरफ बैठते हैं, कुदाली को पहले गुड़ के शर्बत, फिर दही के शर्बत और अंत में शराब से नहलाया जाता है। फिर तिल, जौ, रोली, पान और फूल से उसकी पूजा की जाती है। कुदाली की नोक पर सिंदूर से सात टीके लगाए जाते हैं। उस कुदाली से एक नारियल फोड़ा जाता है। नारियल फूटने पर सभी ठग, चाहे हिंदू हों या मुसलमान 'जै देवी माई की' बोलते हैं।"
ठगों के बीच ऐसी कहानियां प्रचलित थीं कि उन पर कुदाल देवी का आशीर्वाद रहता है। इसके अलावा एक और खास बात ये थी कि ठग मानते थे कि अगर वे नियमों का पालन करते हुए अपना काम करेंगे तो देवी मां की कृपा उन पर बनी रहेगी।
पहला नियम यह था कि कत्ल में एक बूंद भी खून नहीं बहना चाहिए, दूसरे किसी औरत या बच्चे को किसी हाल में नहीं मारा जाना चाहिए, तीसरे जब तक माल मिलने की उम्मीद न हो, हत्या बिल्कुल नहीं होनी चाहिए।
टेलर ने अपनी किताब में लिखा है कि आमिर अली खान को अपने किए पर जरा भी पछतावा नहीं था। दूसरे सभी ठगों के बारे में भी मेजर जनरल स्लीमन ने लिखा है कि "वे मानते ही नहीं थे कि वे कुछ गलत कर रहे हैं। उनकी नजर में यह अन्य पेशों की तरह की एक पेशा था और उनके मन में जरा भी पछतावा या दुख नहीं था कि किस तरह मासूम लोगों को मारकर वे गायब कर देते हैं।"
'कस्सी' का महत्व
मारे जाने वाले लोगों की कब्र जिस कुदाल से खोदी जाती थी, उसे 'कस्सी' कहा जाता था। कस्सी सबसे ज्यादा आदर की चीज थी। गहरे रिसर्च के बाद उर्दू और हिंदी में लिखे बहुचर्चित उपन्यास 'कई चांद थे सरे आसमां' में शम्सुर्रहमान फारूकी ने कस्सी की पूजा का वर्णन कुछ इस तरह किया है।
"एक साफ सुथरी जगह पर थाली में पानी से कुदाली को धो दिया जाता है। फिर पूजा की विधि जानने वाला ठग बीच में बैठता है, बाकी ठग नहा-धोकर उसके चारों तरफ बैठते हैं, कुदाली को पहले गुड़ के शर्बत, फिर दही के शर्बत और अंत में शराब से नहलाया जाता है। फिर तिल, जौ, रोली, पान और फूल से उसकी पूजा की जाती है। कुदाली की नोक पर सिंदूर से सात टीके लगाए जाते हैं। उस कुदाली से एक नारियल फोड़ा जाता है। नारियल फूटने पर सभी ठग, चाहे हिंदू हों या मुसलमान 'जै देवी माई की' बोलते हैं।"
ठगों के बीच ऐसी कहानियां प्रचलित थीं कि उन पर कुदाल देवी का आशीर्वाद रहता है। इसके अलावा एक और खास बात ये थी कि ठग मानते थे कि अगर वे नियमों का पालन करते हुए अपना काम करेंगे तो देवी मां की कृपा उन पर बनी रहेगी।
पहला नियम यह था कि कत्ल में एक बूंद भी खून नहीं बहना चाहिए, दूसरे किसी औरत या बच्चे को किसी हाल में नहीं मारा जाना चाहिए, तीसरे जब तक माल मिलने की उम्मीद न हो, हत्या बिल्कुल नहीं होनी चाहिए।
टेलर ने अपनी किताब में लिखा है कि आमिर अली खान को अपने किए पर जरा भी पछतावा नहीं था। दूसरे सभी ठगों के बारे में भी मेजर जनरल स्लीमन ने लिखा है कि "वे मानते ही नहीं थे कि वे कुछ गलत कर रहे हैं। उनकी नजर में यह अन्य पेशों की तरह की एक पेशा था और उनके मन में जरा भी पछतावा या दुख नहीं था कि किस तरह मासूम लोगों को मारकर वे गायब कर देते हैं।"
कैसे होती थी रास्तों पर ठगी
जिताई पर निकलने वाले ठगों का गिरोह 20 से 50 तक का होता था। वे आम तौर पर तीन दस्तों में चलते थे, एक पीछे, एक बीच में और एक आगे। इन तीनों दस्तों के बीच तालमेल के लिए हर टोली में एक-दो लोग होते थे जो एक कड़ी का काम करते थे। वे अपनी चाल तेज या धीमी करके अलग होते या साथ आ सकते थे।
ज्यादातर ठग, कई भाषाएं, गाना-बजाना, भजन-कीर्तन-नात-कव्वाली और हिंदू-मुसलमान दोनों धर्मों के तौर-तरीके अच्छी तरह जानते थे। वे जरूरत के हिसाब से तीर्थयात्री, बाराती, मजार के जायरीन या नकली शवयात्रा निकालने वाले बन जाते थे।
एक रास्ते में वे कई बार अपना रूप बदल लेते थे। जाहिर है, वे भेष बदलने में भी खासे माहिर थे। वे बहुत धीरज से काम लेते थे, अपने शिकार को जरा भी भनक नहीं लगने देते थे। कई बार तो लोग ठगों के डर से ही असली ठगों को शरीफ समझकर उनकी गिरफ्त में आ जाते थे।
ठगों के सरदार आम तौर पर पढ़े-लिखे इज्जतदार आदमी की तरह दिखने-बोलने वाले लोग होते थे और बाकी उसके तरह-तरह के कारिंदे। फिलिप मीडो टेलर की किताब 'कनफेशंस ऑफ ए ठग' में आमिर अली ने विस्तार से बताया है कि कैसे वह बड़े सेठों और मालदार लोगों से जरूरत के हिसाब से कभी किसी नवाब के सिपाहसालार की तरह मिलता था, कभी मौलवी की तरह तो कभी तीर्थयात्रियों का नेतृत्व कर रहे पंडित की तरह।
आमिर अली ने बताया कि ठगों के काम बंटे हुए थे। 'सोठा' गिरोह के सदस्य सबसे समझदार, लोगों को बातों में फंसाने वाले लोग थे जो शिकार की ताक में सरायों के आसपास मंडराते थे। वे आने-जाने वालों की टोह लेते थे, फिर उनके माल-असबाब और हैसियत का अंदाजा लगाकर उसे अपने चंगुल में फंसाते थे। आमिर अली के गिरोह का सोठा गोपाल था जो 'बहुत होशियारी से अपना काम करता था।'
शिकार की पहचान करने के बाद कुछ लोग उसके पीछे, कुछ आगे और कुछ सबसे आगे चलते। रास्ते भर धीरे-धीरे करके ठगों की तादाद बढ़ती जाती लेकिन वे ऐसा दिखाते जैसे एक-दूसरे को बिल्कुल भी नहीं जानते। अपने ही लोगों को जत्थे में शामिल होने से रोकने का नाटक करते थे ताकि शक न हो। यह बहुत धीरज का काम था, हड़बड़ी की कोई गुंजाइश नहीं थी।
आमिर अली ने टेलर को बताया था कि कई बार तो हफ्ते-दस दिन तक सही मौके का इंतजार किया जाता था। अगर किसी गड़बड़ी की आशंका हो तो वारदात टाल दी जाती थी।
ज्यादातर ठग, कई भाषाएं, गाना-बजाना, भजन-कीर्तन-नात-कव्वाली और हिंदू-मुसलमान दोनों धर्मों के तौर-तरीके अच्छी तरह जानते थे। वे जरूरत के हिसाब से तीर्थयात्री, बाराती, मजार के जायरीन या नकली शवयात्रा निकालने वाले बन जाते थे।
एक रास्ते में वे कई बार अपना रूप बदल लेते थे। जाहिर है, वे भेष बदलने में भी खासे माहिर थे। वे बहुत धीरज से काम लेते थे, अपने शिकार को जरा भी भनक नहीं लगने देते थे। कई बार तो लोग ठगों के डर से ही असली ठगों को शरीफ समझकर उनकी गिरफ्त में आ जाते थे।
ठगों के सरदार आम तौर पर पढ़े-लिखे इज्जतदार आदमी की तरह दिखने-बोलने वाले लोग होते थे और बाकी उसके तरह-तरह के कारिंदे। फिलिप मीडो टेलर की किताब 'कनफेशंस ऑफ ए ठग' में आमिर अली ने विस्तार से बताया है कि कैसे वह बड़े सेठों और मालदार लोगों से जरूरत के हिसाब से कभी किसी नवाब के सिपाहसालार की तरह मिलता था, कभी मौलवी की तरह तो कभी तीर्थयात्रियों का नेतृत्व कर रहे पंडित की तरह।
आमिर अली ने बताया कि ठगों के काम बंटे हुए थे। 'सोठा' गिरोह के सदस्य सबसे समझदार, लोगों को बातों में फंसाने वाले लोग थे जो शिकार की ताक में सरायों के आसपास मंडराते थे। वे आने-जाने वालों की टोह लेते थे, फिर उनके माल-असबाब और हैसियत का अंदाजा लगाकर उसे अपने चंगुल में फंसाते थे। आमिर अली के गिरोह का सोठा गोपाल था जो 'बहुत होशियारी से अपना काम करता था।'
शिकार की पहचान करने के बाद कुछ लोग उसके पीछे, कुछ आगे और कुछ सबसे आगे चलते। रास्ते भर धीरे-धीरे करके ठगों की तादाद बढ़ती जाती लेकिन वे ऐसा दिखाते जैसे एक-दूसरे को बिल्कुल भी नहीं जानते। अपने ही लोगों को जत्थे में शामिल होने से रोकने का नाटक करते थे ताकि शक न हो। यह बहुत धीरज का काम था, हड़बड़ी की कोई गुंजाइश नहीं थी।
आमिर अली ने टेलर को बताया था कि कई बार तो हफ्ते-दस दिन तक सही मौके का इंतजार किया जाता था। अगर किसी गड़बड़ी की आशंका हो तो वारदात टाल दी जाती थी।
कमाल का सामंजस्य
सबसे आगे चलने वाले दस्ते में 'बेल' यानी कब्र तैयार करने वाले लोग होते थे। उन्हें बीच वाले दस्ते में से कड़ी का काम करने वाला बता देता था कि कितने लोगों के लिए कब्र बनानी है। पीछे वाला दस्ता नजर रखता था कि कोई खतरा उनकी तरफ तो नहीं आ रहा। आखिर में तीनों बहुत पास-पास आ जाते लेकिन इसकी खबर शिकार को नहीं होती थी।
कई दिन गुजर जाने के बाद जब शिकार चौकन्ना नहीं होता था और जगह माकूल होती थी तब गिरोह को कार्रवाई के लिए सतर्क करने के लिए, बातचीत में पहले से तय एक नाम लिया जाता था। आमिर अली ने अपने बयान में बताया कि इसके लिए 'सरमस्त खां', 'लद्दन खां', 'सरबुलंद खां', 'हरिराम' या 'जयगोपाल' जैसे नामों का इस्तेमाल होता था।
यह पहला इशारा था कि अब कार्रवाई होने वाली है। इसके बाद ठगों में सबसे 'इज्जतदार' लोगों की बारी आती थी जिन्हें 'भतौट' या 'भतौटी' कहा जाता था। इनका काम बिना खून बहाए रुमाल में सिक्का बांधकर बनाई गई गांठ से शिकार का गला घोंटना होता था। हर एक शिकार के पीछे एक भतौट होता था, पूरा काम एक-साथ दो-तीन मिनट में होता था। इसके लिए मुस्तैद ठग अपने सरगना की 'झिरनी' का इंतजार करते थे।
झिरनी क्या थी
झिरनी अंतिम इशारा होता था कि अपने आगे खड़े या बैठे शिकार के गले में फंदा डालकर खींचा जाए। आमिर अली ने एक झटके में 12-15 तंदुरुस्त मर्दों का काम तमाम करने का वर्णन बेहद सहजता से किया है। उसने टेलर को बताया, "इशारा या झिरनी आम तौर पर सुरती खा लो, हुक्का पिलाओ या गाना सुनाओ जैसा छोटा वाक्य होता था। फिर पलक झपकते ही भतौट शिकार के गले में फंदा डाल देते थे और दो-तीन मिनट में आदमी तड़पकर ठंडा हो जाता था।"
इसके बाद लाशों से कीमती सामान हटाकर उन्हें पहले से खुदी हुई कब्रों में 'एक के सिर की तरफ दूसरे का पैर' वाली तरकीब से कब्रों में डाल दिया जाता ताकि कम-से-कम जगह में ज्यादा लाशें आ सकें। इसके बाद जगह को समतल करके उसके ऊपर कांटेदार झाड़ियां जो पहले से तैयार रखी होती थीं, लगा दी जाती थीं ताकि जंगली जानवर कब्र को खोदने की कोशिश न करें। इस तरह पूरा का पूरा चलता-फिरता काफिला हमेशा के लिए गायब हो जाता था और ठग भी।
ठग एक अलग तरह का जीव था
आमिर अली ने अपने बयान में बताया है कि आज के उत्तर प्रदेश के जालौन में वह अपनी पत्नी और बेटी के साथ रहता था। ज्यादातर लोग उसे मुसलमान जमींदार या सौदागर समझते थे। साल के सात-आठ महीने वह घर पर एक इज्जतदार मुसलमान की तरह रहता और सही समय पर पूजा-पाठ करके चार महीने के लिए 'जिताई' पर निकल जाता था।
बहुत कम लोग जानते थे कि कौन ठग है, लेकिन एक पूरा नेटवर्क था, यह संगठित अपराध था। आमिर अली के मुताबिक कई छोटे-बड़े जमींदार और नवाब ठगों से नजराना वसूल करते थे और मुसीबत के वक्त उन्हें पनाह भी देते थे लेकिन अंग्रेजों को इसकी भनक नहीं लगने देते थे।
इसी तरह, कई जमींदारों ने ठगों को अपनी बिना खेती वाली जमीन इस्तेमाल करने की छूट दे रखी थी जिनमें वे सामूहिक कब्रें खोदते थे। बदले में उन्हें ठगों से हिस्सा मिलता था। इसी तरह हर जगह ठगों के मुखबिर और उनके मददगार लोग थे जिन्हें वे पैसे देते थे या उनसे दोस्तियां गांठते थे। मदद करने वाले इन लोगों को तो कई बार पता भी नहीं होता था कि वे किसका साथ दे रहे हैं।
कई दिन गुजर जाने के बाद जब शिकार चौकन्ना नहीं होता था और जगह माकूल होती थी तब गिरोह को कार्रवाई के लिए सतर्क करने के लिए, बातचीत में पहले से तय एक नाम लिया जाता था। आमिर अली ने अपने बयान में बताया कि इसके लिए 'सरमस्त खां', 'लद्दन खां', 'सरबुलंद खां', 'हरिराम' या 'जयगोपाल' जैसे नामों का इस्तेमाल होता था।
यह पहला इशारा था कि अब कार्रवाई होने वाली है। इसके बाद ठगों में सबसे 'इज्जतदार' लोगों की बारी आती थी जिन्हें 'भतौट' या 'भतौटी' कहा जाता था। इनका काम बिना खून बहाए रुमाल में सिक्का बांधकर बनाई गई गांठ से शिकार का गला घोंटना होता था। हर एक शिकार के पीछे एक भतौट होता था, पूरा काम एक-साथ दो-तीन मिनट में होता था। इसके लिए मुस्तैद ठग अपने सरगना की 'झिरनी' का इंतजार करते थे।
झिरनी क्या थी
झिरनी अंतिम इशारा होता था कि अपने आगे खड़े या बैठे शिकार के गले में फंदा डालकर खींचा जाए। आमिर अली ने एक झटके में 12-15 तंदुरुस्त मर्दों का काम तमाम करने का वर्णन बेहद सहजता से किया है। उसने टेलर को बताया, "इशारा या झिरनी आम तौर पर सुरती खा लो, हुक्का पिलाओ या गाना सुनाओ जैसा छोटा वाक्य होता था। फिर पलक झपकते ही भतौट शिकार के गले में फंदा डाल देते थे और दो-तीन मिनट में आदमी तड़पकर ठंडा हो जाता था।"
इसके बाद लाशों से कीमती सामान हटाकर उन्हें पहले से खुदी हुई कब्रों में 'एक के सिर की तरफ दूसरे का पैर' वाली तरकीब से कब्रों में डाल दिया जाता ताकि कम-से-कम जगह में ज्यादा लाशें आ सकें। इसके बाद जगह को समतल करके उसके ऊपर कांटेदार झाड़ियां जो पहले से तैयार रखी होती थीं, लगा दी जाती थीं ताकि जंगली जानवर कब्र को खोदने की कोशिश न करें। इस तरह पूरा का पूरा चलता-फिरता काफिला हमेशा के लिए गायब हो जाता था और ठग भी।
ठग एक अलग तरह का जीव था
आमिर अली ने अपने बयान में बताया है कि आज के उत्तर प्रदेश के जालौन में वह अपनी पत्नी और बेटी के साथ रहता था। ज्यादातर लोग उसे मुसलमान जमींदार या सौदागर समझते थे। साल के सात-आठ महीने वह घर पर एक इज्जतदार मुसलमान की तरह रहता और सही समय पर पूजा-पाठ करके चार महीने के लिए 'जिताई' पर निकल जाता था।
बहुत कम लोग जानते थे कि कौन ठग है, लेकिन एक पूरा नेटवर्क था, यह संगठित अपराध था। आमिर अली के मुताबिक कई छोटे-बड़े जमींदार और नवाब ठगों से नजराना वसूल करते थे और मुसीबत के वक्त उन्हें पनाह भी देते थे लेकिन अंग्रेजों को इसकी भनक नहीं लगने देते थे।
इसी तरह, कई जमींदारों ने ठगों को अपनी बिना खेती वाली जमीन इस्तेमाल करने की छूट दे रखी थी जिनमें वे सामूहिक कब्रें खोदते थे। बदले में उन्हें ठगों से हिस्सा मिलता था। इसी तरह हर जगह ठगों के मुखबिर और उनके मददगार लोग थे जिन्हें वे पैसे देते थे या उनसे दोस्तियां गांठते थे। मदद करने वाले इन लोगों को तो कई बार पता भी नहीं होता था कि वे किसका साथ दे रहे हैं।
कौन ठग था और कौन नहीं, अंग्रेज इस पहेली से लगातार जूझ रहे थे। फिलिप मीडो टेलर ने अपनी किताब की भूमिका में 1825-26 के एक दिलचस्प किस्से का जिक्र किया है। वे लिखते हैं, "मेरी तैनाती हिंगोली में थी, वहां हरि सिंह नाम का एक व्यापारी था। हम उससे लेन-देन करते थे। एक दिन उसने बॉम्बे से कुछ कपड़ा लाने का परमिट मांगा, जो उसे दे दिया गया। वह कपड़ा ले आया और उसने मिलिट्री कैंटोनमेंट में कपड़ा बेचा। दरअसल, वह कपड़ा किसी और व्यापारी का था। हरि सिंह ने उसे और उसके कारिंदों को मारकर कपड़ा लूट लिया था। हरि सिंह दरअसल ठग था।"
अंग्रेजों को हरि सिंह के ठग होने का पता कई साल बाद चला जब उसने पकड़े जाने के बाद अंग्रेजों का मजाक उड़ाया और बताया कि कैसे कपड़े का परमिट लेकर उसने 'गोरे साहब को उल्लू बनाया था'।
1835 के बाद के सालों में जब ठग पकड़े जाने लगे और उनकी पोल खुलने लगी तो पता चला कि ठगी कितने बड़े पैमाने पर जारी थी। फिलिप मीडो टेलर ने लिखा है कि 'मैं मंदसौर में सुपरिटेंडेट था। जब हमने एक वादा माफ सरकारी गवाह बने ठग की निशानदेही पर जमीन खोदनी शुरू की तो इतनी सामूहिक कब्रें मिलीं कि हमने परेशान होकर खुदाई करना ही बंद कर दिया।'
अंग्रेजों को हरि सिंह के ठग होने का पता कई साल बाद चला जब उसने पकड़े जाने के बाद अंग्रेजों का मजाक उड़ाया और बताया कि कैसे कपड़े का परमिट लेकर उसने 'गोरे साहब को उल्लू बनाया था'।
1835 के बाद के सालों में जब ठग पकड़े जाने लगे और उनकी पोल खुलने लगी तो पता चला कि ठगी कितने बड़े पैमाने पर जारी थी। फिलिप मीडो टेलर ने लिखा है कि 'मैं मंदसौर में सुपरिटेंडेट था। जब हमने एक वादा माफ सरकारी गवाह बने ठग की निशानदेही पर जमीन खोदनी शुरू की तो इतनी सामूहिक कब्रें मिलीं कि हमने परेशान होकर खुदाई करना ही बंद कर दिया।'
ठगों पर भारी अफ्रीकी गुलाम
गहन ऐतिहासिक शोध के बाद लिखे गए शम्सुर्रहमान फारूकी के चर्चित उपन्यास 'कई चांद थे सरे आसमां' में 1843-44 में रामपुर के नवाब के खास दरबारी मिर्जा तुराब अली के ठगों के हाथों मारे जाने का विस्तृत ब्योरा है। इसमें बताया गया है कि बिहार के सोनपुर के मेले से हाथी-घोड़े खरीदने गए नवाब के सिपहसालार और उनके छह साथियों को ठगों ने मार डाला।
मिर्जा तुराब अली और उनके साथियों की हत्या के बारे में जो ब्योरा मिला, उसके मुताबिक ठगों ने एक मरे हुए मुसलमान राहगीर की जनाजे की नमाज पढ़वाने के बहाने हथियारबंद मिर्जा और उनके साथियों को घोड़ों से नीचे उतारा था। जब वे नमाज पढ़ रहे थे, तभी 'सुरती खिलाओ' की आवाज हुई और सात लोग रुमाल से गला घोंटकर मार डाले गए।
जब तुराब अली रामपुर लौटकर नहीं आए तो नवाब को शक हुआ कि कहीं ठगों के शिकार तो नहीं हो गए। उन्होंने अफ्रीका से गुलाम बनाकर गुजरात के तट पर लाए गए अफ्रीकियों की कहानियां सुन रखी थीं, जिन्हें सीदी कहा जाता है। उन्होंने इस काम के लिए सीदी इकराम और सीदी मुनइम की मदद ली।
सीदियों के बारे में फारूकी लिखते हैं, "नस्ल के लिहाज से सीदी और काम के लिहाज से उन्हें खोजिया कहा जाता था। उनके हुनर की बात दूर-दूर तक फैल चुकी थी। उन्हें गुजरात से अवध तक बुलाया जाने लगा था। पुराने कदमों के निशान, लापता लोगों का पता लगाना और फरार लोगों के सुराग ढूंढने में वे माहिर थे। आपस में वे स्वाहिली में जबकि दूसरे लोगों से हिंदी में बात करते थे।"
रामपुर के नवाब ने अपने वफादार मिर्जा तुराब अली और उनके साथियों का पता लगाने के लिए सीदियों को भेजा। सीदी पूरे रास्ते झंडे लगाते, गिल्लियां गाड़ते, हर चीज की बारीक पड़ताल करते चलते रहे। फारूकी लिखते हैं, "वे एक बड़े चौकोर मैदान में पहुंचे जहां उन्होंने लकड़ी से लकीरें खींचकर बड़े-बड़े चौकोर खाने बनाए। इसके बाद उन्होंने एक-एक करके उन खानों को सूंघना और उनकी मिट्टी को कुरेदना शुरू किया। वे किसी खोजी कुत्ते से भी ज्यादा एकाग्रता से अपना काम कर रहे थे।"
उन्होंने एक जगह पहुंचकर आवाज लगाई, "जमादार जी, वो मारा, यहां खुदाई करवाओ।" जब वहां खोदा गया तो मिर्जा तुराब अली सहित नवाब के सभी कारिंदों की लाशें मिल गईं। सीदी आज भी गुजरात के कुछ इलाकों में बसे हुए हैं लेकिन ठगों का सफाया हो चुका है।
ठग आमिर अली के बारे में बताने लायक एक फिल्मी सी लगने वाली बात ये है कि उसे उस ठग ने बहुत प्यार से अपने बेटे की तरह पाला था, जिसने उसके बाप को एक वारदात के दौरान मार डाला था। आमिर को गोद लेने वाले ठग बाप से ठगी की दीक्षा मिली थी, इसी कारण ठगी को वो एक नेक काम समझता था।
मिर्जा तुराब अली और उनके साथियों की हत्या के बारे में जो ब्योरा मिला, उसके मुताबिक ठगों ने एक मरे हुए मुसलमान राहगीर की जनाजे की नमाज पढ़वाने के बहाने हथियारबंद मिर्जा और उनके साथियों को घोड़ों से नीचे उतारा था। जब वे नमाज पढ़ रहे थे, तभी 'सुरती खिलाओ' की आवाज हुई और सात लोग रुमाल से गला घोंटकर मार डाले गए।
जब तुराब अली रामपुर लौटकर नहीं आए तो नवाब को शक हुआ कि कहीं ठगों के शिकार तो नहीं हो गए। उन्होंने अफ्रीका से गुलाम बनाकर गुजरात के तट पर लाए गए अफ्रीकियों की कहानियां सुन रखी थीं, जिन्हें सीदी कहा जाता है। उन्होंने इस काम के लिए सीदी इकराम और सीदी मुनइम की मदद ली।
सीदियों के बारे में फारूकी लिखते हैं, "नस्ल के लिहाज से सीदी और काम के लिहाज से उन्हें खोजिया कहा जाता था। उनके हुनर की बात दूर-दूर तक फैल चुकी थी। उन्हें गुजरात से अवध तक बुलाया जाने लगा था। पुराने कदमों के निशान, लापता लोगों का पता लगाना और फरार लोगों के सुराग ढूंढने में वे माहिर थे। आपस में वे स्वाहिली में जबकि दूसरे लोगों से हिंदी में बात करते थे।"
रामपुर के नवाब ने अपने वफादार मिर्जा तुराब अली और उनके साथियों का पता लगाने के लिए सीदियों को भेजा। सीदी पूरे रास्ते झंडे लगाते, गिल्लियां गाड़ते, हर चीज की बारीक पड़ताल करते चलते रहे। फारूकी लिखते हैं, "वे एक बड़े चौकोर मैदान में पहुंचे जहां उन्होंने लकड़ी से लकीरें खींचकर बड़े-बड़े चौकोर खाने बनाए। इसके बाद उन्होंने एक-एक करके उन खानों को सूंघना और उनकी मिट्टी को कुरेदना शुरू किया। वे किसी खोजी कुत्ते से भी ज्यादा एकाग्रता से अपना काम कर रहे थे।"
उन्होंने एक जगह पहुंचकर आवाज लगाई, "जमादार जी, वो मारा, यहां खुदाई करवाओ।" जब वहां खोदा गया तो मिर्जा तुराब अली सहित नवाब के सभी कारिंदों की लाशें मिल गईं। सीदी आज भी गुजरात के कुछ इलाकों में बसे हुए हैं लेकिन ठगों का सफाया हो चुका है।
ठग आमिर अली के बारे में बताने लायक एक फिल्मी सी लगने वाली बात ये है कि उसे उस ठग ने बहुत प्यार से अपने बेटे की तरह पाला था, जिसने उसके बाप को एक वारदात के दौरान मार डाला था। आमिर को गोद लेने वाले ठग बाप से ठगी की दीक्षा मिली थी, इसी कारण ठगी को वो एक नेक काम समझता था।