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Khabaron Ke Khiladi: बंगाल में चढ़ने लगा सियासी पारा, विश्लेषकों ने बताया इस चुनाव में किसके सामने क्या चुनौती

Sat, 03 Jan 2026 05:00 PM IST
संध्या न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: संध्या Updated Sat, 03 Jan 2026 05:00 PM IST
सार

Khabaron Ke Khiladi: बंगाल में चुनावों को लेकर तैयारियों जोरों पर है। सभी पार्टियों का एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। इन सबके बीच कौन सी पार्टी कैसे पैटर्न में चुनावी लड़ेगी ये देखना दिलचस्प रहेगा। 

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Khabron Ke Khiladi: What will the electoral math be like in the Bengal elections this time
खबरों के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पश्चिम बंगाल के लिए ये चुनावी साल है। चुनाव तारीखों के एलान से पहले राज्य में सियासी पारा चढ़ा हुआ है। देश के गृह मंत्री और भाजपा नेता अमित शाह लगातार बंगाल के दौरे कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी दौरे जारी हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी मैदान में उतर चुकी हैं। बंगाल में चल रही इसी सियासी हलचल पर इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, अनुराग वर्मा, अजय सेतिया, बिलाल सब्जवारी, पीयूष पंत और राजनीतिक विश्लेषक संजय राणा मौजूद रहे। 

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अनुराग वर्मा: भाजपा पिछले विधानसभा चुनावों में भी बहुत दमखम से लड़ी थी और तीन सीट से बढ़कर 77 सीटों तक आ गई। अब जो चुनाव का नया पैटर्न आया है कि आप रेवड़ी क्या बांटने जा रहे हो? तो ये एक सबसे बड़ा डिसाइडिंग फैक्टर होगा। दूसरी बड़ी चीज है घुसपैठ और पोलराइजेशन। बीजेपी लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि घुसपैठ देश और पश्चिम बंगाल दोनों के लिए खतरनाक है। मुझे लगता है कि भाजपा की तैयारी सही ट्रैक पर जाते दिख रही है, लेकिन ममता बनर्जी लंबे समय से सरकार में हैं। उनको अपना किला बचाना है। 

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अजय सेतिया: भारतीय जनता पार्टी की रणनीति हमेशा यह होती है कि वे बहुत पहले शुरू होते हैं और अंत तक हमलावर रहते हैं। बंगाल में भी अमित शाह ने माइक्रो मैनेजमेंट शुरू कर दिया है। इस बार ध्रुवीकरण कुछ ज्यादा होता हुआ दिखाई दे रहा है, लेकिन हमें ट्रेंड भी देखना पड़ेगा। लोकसभा चुनाव में ममता ने अपना रुतबा बरकरार ही नहीं रखा बल्कि उसे बढ़ाया भी है। उन्होंने सीटें बढ़ाईं, जबकि भाजपा की सीटें घटी हैं। जिस तरह से ममता बनर्जी खेल रही हैं, वह खुद ध्रुवीकरण की तरफ बढ़ रही हैं। अगर वहां पक्का ध्रुवीकरण हो गया, तो उसका फायदा भाजपा को मिल सकता है। 

पीयूष पंत: आंतरिक मामले ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, वो ममता को चुनौती दे सकते हैं। एंटी इनकंबेंसी फैक्टर है, मतुआ संप्रदाय का असंतोष जिनके नाम वोटर लिस्ट से डिलीट हुए हैं, उसे किस तरह से ठीक किया जाएगा ये देखना होगा। अमित शाह स्ट्रेटजी बनाने में माहिर हैं। हमने पहले भी उन्हें देखा है। वो काफी प्रभावी रहते हैं। दूसरा बंगाल का जो 'भद्र समाज' है वो थॉट लेवल पर अतिवादी नहीं है, लेकिन भाजपा हिंदुत्व कार्ड और नॉन-बंगाली वोटर्स के जरिए प्रभाव बनाने की कोशिश कर रही है। पिछली बार ममता की फाइट काफी टफ थी। इसके बाद भी वो जीतकर सत्ता में लौंटी। इस बार भी मुकाबला बहुत कठिन है।

बिलाल सब्जवारी: मैं पश्चिम बंगाल के चुनाव को बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के उत्पीड़न के कॉन्टेक्स्ट में देखता हूं। अगर वहां घटनाएं घटती रहीं, तो भाजपा इस चुनाव को ममता के लिए मुश्किल बना देगी, क्योंकि घुसपैठियों का मुद्दा सीधे बंगाल से जुड़ता है। ममता बनर्जी भी एक अग्रेसिव लीडर हैं। वो मुद्दों को भावनात्मक स्तर पर ले जाती हैं, ध्रुवीकरण को ध्रुवीकरण से काउंटर करना जानती हैं। वहां माइनॉरिटी फैक्टर ममता के लिए बड़ा एडवांटेज है। चुनाव बहुत टफ होगा। ममता बनर्जी बहुत मुश्किल स्थिति में चुनाव लड़ेंगी।

संजय राणा: देखिए, जो नेत्री 15 साल से शासन कर रही है, उसे यह बोलना पड़ रहा है कि उन्हें बंगाली बोलने वालों से तकलीफ है, तो आप समझ लीजिए कि भाजपा की रणनीति काम कर रही है। अगर कांग्रेस और कम्युनिस्टों का अस्तित्व वापस आता है, तो भाजपा को फायदा होगा। जो डेमोग्राफी की बात हो रही है, उसमें ममता शतक से शुरुआत कर रही हैं, उनके विरोधियों को शून्य से शुरू करना होगा। क्योंकि ममता के पास पहले से ही कुछ सीटें सुरक्षित हैं। अगर राहुल गांधी बंगाल पर फोकस करते हैं तो भाजपा को एज मिलेगा।   

विनोद अग्निहोत्री: चुनौती दोनों के लिए है। भाजपा प्रमुख विपक्षी पार्टी बन चुकी है, लेकिन ममता बनर्जी का भी ग्राफ बढ़ा है। अगर भाजपा बढ़ रही है तो ममता बनर्जी भी बढ़ीं हैं। क्योंकि कांग्रेस और वाम दलों का वोट वहां साफ हो गया। जो सरकार में होता है उसके पास देने के लिए बहुत कुछ होता है। क्या ममता बनर्जी कोई योजना नहीं ला सकती हैं क्या? ला भी सकती हैं। ममता बनर्जी भी 'रेवड़ी' या सरकारी योजनाओं के टूलकिट का इस्तेमाल कर सकती हैं। वो उनके लिए एज हो जाएगा। उनके लिए चुनौती बांग्लादेश की घटनाएं हैं। उन्होंने हिंदुत्व के जवाब में जगन्नाथ मंदिर और महाकाल मंदिर बनाने जैसी घोषणाएं की हैं। ऐसा नहीं है कि वो चुप बैठी हैं। वो हर चीज का जवाब दे रही हैं। अमित शाह ने जो सवाल उठाए उसका उन्होंने तुरंत जवाब भी दिया है। फिर भी चुनौती दोनों के लिए है। भाजपा के लिए सरकार बनाने की चुनौती है तो ममता के सामने सरकार को बरकरार रखने की चुनौती है। कांग्रेस के लिए बंगाल में खोने को कुछ नहीं है। कांग्रेस ममता के साथ एडजस्टमेंट कर सकती है ताकि शून्य से कुछ बेहतर स्थिति में जाए।

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