Khabron Ke Khiladi: जनगणना को लेकर उठते सवाल, क्या जातीय सर्वेक्षण से टूटेंगे कई भ्रम, कितनी बदलेगी राजनीति?
रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार 2025 में जनगणना करा सकती है। चर्चा है कि जनगणना के साथ ही जातीय जनगणना भी कराई जा सकती है। अगर ऐसा होता है तो इसके क्या असर होंगे? इसी मुद्दे पर जानिए वरिष्ठ पत्रकारों की राय…
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इन दिनों जनगणना को लेकर चर्चा जोरों पर है। जैसे ही यह खबर सामने आई कि सरकार साल 2025 में जनगणना करा सकती है, वैसे ही इस पर सवाल उठने शुरू हो गए कि क्या जनगणना के साथ जातीय जनगणना भी होगी? और क्या इस जनगणना का इस्तेमाल राज्यवार लोकसभा सीटों की संख्या तय करने में भी किया जाएगा? अगर जातीय जनगणना होती है तो उसका देश की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? ‘खबरों के खिलाड़ी’ कार्यक्रम में इस हफ्ते इसी मुद्दे पर चर्चा हुई। इस चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, अवधेश कुमार, राकेश शुक्ल, समीर चौगांवकर और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।
क्या पुरानी रणनीति कांग्रेस को देगी फायदा?
अनुराग वर्मा
1992 में बाबरी विध्वंस के बाद से देश के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव हुआ है। राहुल गांधी को लगता है कि जातीय जनगणना हुई तो इससे उनकी राजनीति को फायदा पहुंचेगा लेकिन हरियाणा में उनका ये दांव उलटा पड़ गया और वे जीती बाजी हार गए, तो अब ये सवाल है कि क्या कांग्रेस अब पुरानी रणनीति से सत्ता में आ पाएगी या नहीं?
समीर चौगांवकर
अभी तक जनगणना को लेकर किसी सरकार पर इतना दबाव नहीं रहा, जितना इस जनगणना को लेकर है। राहुल गांधी जाति को केंद्र में लेकर आए। संघ ने भी जातीय जनगणना कराने का समर्थन किया है कि अगर सरकार करानी चाहती है तो अच्छी बात है। सभी दल देश में जाति की राजनीति करते हैं। 2029 में परिसीमन होना है और महिलाओं का आरक्षण लागू कराना है तो मुझे लगता है कि सरकार जातीय जनगणना की तरफ बढ़ेगी, लेकिन वो तरीका क्या होगा, इस पर सरकार जरूर विचार कर रही होगी।
समय के साथ बदलेगा जनगणना का आधार
रामकृपाल सिंह
जो संविधान के तहत है, उसी के तहत काम होना चाहिए। निजता को छोड़कर जितनी जानकारी लेनी है ले लें। संविधान के अनुसार, आबादी के हिसाब से परिसीमन होगा तो वो ही सरकार करेगी फिर दक्षिण के राज्यों में इसे लेकर मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है? कानून बनाना संसद का काम है और जो बहुमत में है चलेगी उसकी। जनगणना को राजनीति का विषय नहीं बनाना चाहिए, जो संविधान के तहत होता है, वो होना चाहिए। बाकी जो संसद तय करेगी वही होगा।
अवधेश कुमार
1951 के बाद ये पहली जनगणना होगी, जो अगले 20-25 वर्षों को ध्यान में रखकर होगी। इसमें लोगों की आर्थिक, सामाजिक जानकारी ली जाएगी। अधिकतर डिजिटल जनगणना होगी। मोबाइल एप के जरिए जनणगना का काम होगा। जनगणना में 31 सवाल हो सकते हैं, जिनमें परिवार के पास वाहन, आय का साधन, घर के मालिक स्त्री हैं या पुरुष हैं, घर का मालिक अनुसूचित जाति से है या अन्य से, आदि सवाल पूछे जाएंगे। जनगणना के पीछे बहुत सारा चिंतन किया गया है। यह पहली बार होगा कि धर्म, वर्ग के साथ ही संप्रदाय को भी इसमें शामिल किया जाएगा। अनुसूचित जातियों का भी वर्गीकरण उल्लेखित करना होगा। ऐसे ही मुस्लिमों, बौद्ध आदि धर्मों के लोगों के सामुदायिक वर्गीकरण की जानकारी देनी होगी। सब की जनगणना होगी।
राकेश शुक्ल
भारत गांव में बसता है। अभी देश में कई जातियों को अपनी संख्या नहीं पता है, जब ये सब पता चल जाएगा तो इसका विपरीत असर हो सकता है, इसलिए मैं जातीय जनगणना के पक्ष में नहीं हूं। इस जनगणना से पता चलेगा कि मुस्लिम सिर्फ मुस्लिम नहीं है बल्कि उनमें भी वर्गीकरण है, उसी तरह हिंदुओं में भी ऐसा है।
बदलाव जरूरी तो नहीं हो गया है?
विनोद अग्निहोत्री
राजनीति में जनगणना का मुद्दा तो केंद्र में रहेगा ही। पहले ही कई साल की देरी हो चुकी है, लेकिन मैं व्यक्तिगत रूप से इसके पक्ष में हूं कि जातियों, धर्मों के वर्गीकरण की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए। लोगों को उनकी संख्या का पता लगना चाहिए। अब जातीय जनगणना से सही तस्वीर सामने आएगी, कई भ्रम टूटेंगे। मुसलमानों में भी अगर जातियां हैं तो ये क्यों सामने नहीं आना चाहिए? राजनीतिक दल इसका उपयोग, सदुपयोग अपने हिसाब से करेंगे और ये होगा, लेकिन जब लोगों को भागीदारी की बात करते हैं तो आपको पता होना चाहिए कि कौन कितना है, उसी हिसाब से आरक्षण और सुविधाएं तय होंगी। जातीय जनगणना से उन वर्गों को भ्रम टूट जाएगा कि वो सबसे शक्तिशाली हैं। जातीय जनगणना तक ये मामला रुकने वाला नहीं है, वो निजी क्षेत्र में आरक्षण की तरफ बढ़ रहा है और उसको कोई रोक नहीं पाएगा।