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Khabron Ke Khiladi: क्या मजबूत विपक्ष है सदन में तकरार की वजह, इस चुनौती से कैसे निपटेगी सरकार?
Sat, 27 Jul 2024 08:45 PM IST
शिव शुक्ला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिव शुक्ला
Updated Sat, 27 Jul 2024 08:45 PM IST
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बीते हफ्ते संसद का मानसून सत्र शुरू हुआ। सत्र के दूसरे दिन नई सरकार ने बजट पेश कर दिया। सत्र की शुरुआत से ही विपक्ष हमलावर है। लोकसभा चुनाव में विपक्ष के सांसदों की संख्या बढ़ने के बाद यह कहा जा रहा है कि सदन में तकरार की बड़ी वजह मजबूत विपक्ष का होना है। इस हफ्ते के ‘खबरों के खिलाड़ी’ में इसी विषय पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी और राकेश शुक्ल मौजूद रहे।
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पूर्णिमा त्रिपाठी: विपक्ष सरकार को पहले दिन से ही घेरने में लगा है। इसकी उम्मीद भी थी क्योंकि बहुत समय के बाद सदन में विपक्ष की स्थिति इतनी मजबूत हुई है। विपक्ष की संख्या अच्छी होने की वजह से सत्ता पक्ष के लिए इन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल हो रहा है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी पोजिशनिंग कर रहे हैं। यह अभी चलेगा। देखना यह होगा कि सरकार इससे कैसे निपटेगी। अभी तक तो सरकार रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई दे रही है। विपक्ष हावी नजर आ रहा है। अब देखना होगा कि यह सिलसिला पांच साल तक कैसे चल पाता है। विपक्ष के इस आक्रामक रवैये से कई सकारात्मक चीजें हो रही हैं।
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रामकृपाल सिंह: विपक्ष कभी भी सत्तापक्ष के समर्थन में नहीं रहता है। 2014 और 2019 में विपक्ष बहुत ही बुरी स्थिति में था। इस वजह से मनोबल नहीं था। आज की तारीख में भारत की राजनीति में दो समूह हैं। एक है कुर्सी पाओ और दूसरा है कुर्सी बचाओ। कुर्सी दौड़ में क्या होगा, यह देखना होगा। यह व्यावहारिक है कि कुर्सी पाओ वाला थोड़ा आक्रामक होगा और बचाने वाला थोड़ा रक्षात्मक होगा। यह होता रहेगा।
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विनोद अग्निहोत्री: संसद में चर्चा हो रही है, भले ही हंगामा हो रहा है। यह एक अच्छी बात है। थोड़े-बहुत हंगामे तो हमेशा होते रहे हैं। विपक्ष की संख्या बढ़ने से विपक्षी दलों का मनोबल भी बढ़ा है। यह उम्मीद करना कि कल सरकार गिर जाएगी, यह अतिशियोक्ति होगा। जिस तरह से संसद चलनी चाहिए, उस तरह से चल रही है। संसद चले और ढंग से चले, भले ही सरकार किसी भी हो।
राकेश शुक्ल: मुझे तो मोदी जी कार्यप्रणाली में कोई बदलाव नहीं दिख रहा है। चाहे संविधान हत्या दिवस की घोषणा करना हो या आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हटाना। इसे देखते हुए मेरा मानना है कि जैसे पिछले 10 साल सरकार चली, उसी तरह अगले पांच साल चलेगी। यह सच्चाई है कि विपक्ष और सत्ता पक्ष में एक संतुलन कायम हुआ है, लेकिन अभी तक मुझे तो विपक्ष किसी भी मुद्दे पर एकजुट नहीं दिखाई दिया है। चाहे जगन मोहन रेड्डी हों या ममता बनर्जी।
समीर चौगांवकर: सरकार विपक्ष की एकता से लेकर बहुत ज्यादा परेशान नहीं है। सरकार की चिंता है कांग्रेस का एक नए सिरे से जिंदा हो जाना। पिछले दो कार्यकालों से भाजपा कांग्रेस और राहुल गांधी को बहुत गंभीरता से नहीं लेती थी, लेकिन अब दोनों को गंभीरता से लेना होगा। मुझे लगता है कि अब कांग्रेस मुक्त भारत वाला शब्द अब भाजपा के शब्दकोश से हट गया होगा। 10 साल इतना काम करने के बाद भाजपा 240 पर आ सकती है तो 2029 में यह आंकड़ा और कम हो सकता है। राहुल गांधी की छवि में जो बदलाव आया है, वो भी भाजपा के लिए बड़ी चिंता का विषय होगा।