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Khabron Ke Khiladi: इस बार क्यों सड़क पर आए किसान, आंदोलन के पीछे क्या कोई राजनीति हुई?

Sat, 17 Feb 2024 08:44 PM IST
गुलाम अहमद न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गुलाम अहमद Updated Sat, 17 Feb 2024 08:44 PM IST
सार

किसान आंदोलन लगातार सुर्खियों में है। किसान संगठनों और सरकार के बीच अब तक हुई बातचीत सफल नहीं रही है। रविवार को एक बार फिर सरकार और किसान संगठनों के बीच बैठक होनी है। इन सबके बीच इस मामले में राजनीति भी जारी है। 

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Khabron Ke Khiladi farmers protest kisan andolan MPS and politics
खबरों के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

किसानों को क्यों सड़क पर आना पड़ा? इस आंदोलन के क्या मायने हैं? 2024 के लोकसभा चुनाव पर क्या असर होगा? आंदोलन के पीछे की क्या राजनीति है? इस हफ्ते के 'खबरों के खिलाड़ी' में इन सभी सवालों के जवाब जानने की कोशिश हुई? चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार, प्रेम कुमार और राकेश शुक्ला मौजूद रहे। 

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अवधेश कुमार
लोकतंत्र में किसी को भी कानून की सीमा में रहते हुए आंदोलन करने का अधिकार है, लेकिन इस आंदोलन को जिस तरह की तैयारी के साथ किया जा रहा है वो कई सवाल खड़े करता है। जिस ट्रेनिंग के साथ लोग आए हैं वो कहां से हुई है? ट्रैक्टरों को जिस तरह से मॉडिफाई किया गया है वो कैसे हुआ, क्या ये बाद में खेती में काम आ भी पाएंगे? इस आंदोलन की भाषा देखिए, इस आंदोलन के मुख्य वार्ताकार किस भाषा में बोल रहे हैं? आदोलन का तरीका, इसकी पृष्ठभूमि और इसके नेताओं के बयान से पता चल रहा है कि इस आंदोलन की कोई निश्चित दिशा नहीं है। इस प्रकार के काम करने वाले किसी भी तरह से आंदोलनकारी नहीं हो सकते हैं।
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प्रेम कुमार
आंदोलन जो भी होता है उसमें एक शक्ति होती है। वो शक्ति जनता की ताकत होती है। इस ताकत पर सरकार को सचेत रहना होता है कि इस आंदोलन के कारण लोगों को परेशानी का सामना नहीं करना पड़े। डॉक्टर जब आंदोलन पर जाता है तो मरीज की मौत की आशंका रहती है। इसका मतलब यह नहीं है कि डॉक्टर अपनी मांगों के लिए आंदोलन पर नहीं जाएंगे। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ऐसे इंतजाम करे कि लोगों की मौत नहीं हो। 

जिस तरह से सरकार ने सड़क पर सीमेंटेड बैरिकेड लगाए, उसका सरकार को किसने हक दिया। यह कोर्ट ने भी कहा है। उससे निपटने के लिए किसानों को अपने ट्रैक्टरों में इस तरह की तैयारी करनी पड़ी। सरकार जब बुलडोजर न्याय को न्याय बताएगी तो जनता क्या करेगी? यह आंदोलन हो क्यों रहा है? कौन सी नई मांग आ गई? कोई नई मांग नहीं आई है। ये तो वादा पूरा करो आंदोलन है। एक तरफ वार्ता चल रही है दूसरी तरफ आप आंसू बम गिराए जा रहे हैं। यह अलोकतांत्रिक है। 

राकेश शुक्ला
जो 2020 का आंदोलन था, उसमें कहा गया कि यह राजनीतिक आंदोलन नहीं है। जो लोग राजनीतिक रूप से सक्रिय हुए वो इस बार आंदोलन का हिस्सा नहीं है। यह आंदोलन एमएसपी के लिए नहीं है, यह मोदी का ग्राफ गिराने के लिए आंदोलन है। भारतीय इतिहास में यह पहला आंदोलन है जो इतने हाइटेक तरीके से हो रहा है। रही बात मोदी के विरोध की, जो छोटा किसान है, उसके लिए केंद्र सरकार की ओर से मिलने वाली सम्मान निधि का बहुत महत्व है।  

रामकृपाल सिंह
इस देश में दो एकड़ से ज्यादा लैंड होल्डिंग वाली आबादी आठ प्रतिशत है। 92 फीसदी किसान ऐसे हैं, जिनके पास लैंड होल्डिंग दो एकड़ से कम है। 1980 दशक में जो आंदोलन चला था, उस वक्त आनंदपुरसाहिब प्रस्ताव आया था। उसमें क्लॉज था कि पंजाब में लैंड सीलिंग 14 एकड़ की जाए। उस वक्त वहां ऐसे किसान केवल पांच फीसदी थे, जिसने पास पांच एकड़ से ज्यादा खेती थी। दूसरी चीज जो एमएसपी का डेटा है, उसे निकाला जाए और यह देखा जाए कि सरकार ने कितनी राशि दी है और किस राज्य में यह सबसे ज्यादा गई है, तब दिखेगा कि इसमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी पंजाब की है। खेती लाभकारी कैसे हो, यह बात इसके जड़ में है, लेकिन छोटी-छोटी लैंड होल्डिंग लाभकारी नहीं हो सकती। जब तक 95 फीसदी किसान एमएसपी से दूर हैं तो फिर यह मांग किसके लिए हो रही है। आंदोलन और अराजकता में फर्क है। इस आंदोलन में छोटे किसान कितने हैं? 


समीर चौगांवकर
किसानों का पिछला आंदोलन लंबा चला था। उस वक्त सरकार से एक बड़ी गलती ये हुई कि सरकार ने एक साल तक उन कानूनों पर कोई निर्णय नहीं किया। बाद में जब आंदोलन खत्म हुआ तो उस वक्त सरकार ने कुछ आश्वासन दिए थे कि आपकी मांगों पर विचार होगा। उन मांगों पर अब तक क्या हुआ, किसी को नहीं पता। कोई आंदोलन लंबा चलता है तो यह बिना किसी राजनीतिक और आर्थिक मदद के नहीं चल सकता। आंदोलन का राजनीतिक लाभ हर दल लेता है। मुझे लगता है कि उस वक्त सरकार ने जो आश्वासन दिया था, उस पर कदम उठाना चाहिए था। मुझे लगता है कि इस मामले में सरकार ने थोड़ी लापरवाही बरती। जिन चार-पांच मांगों को पूरा किया जा सकता था, अगर उसे सरकार ने कर दिया होता तो ये नौबत नहीं आती। 

विनोद अग्निहोत्री
पिछले आंदोलन में पंजाब के किसान दिल्ली आने से पहले चालीस दिन तक ट्रेन रोके हुए थे। क्या उसकी चर्चा हुई थी। प्रकाश जारंगे आंदोलन करते हैं तो क्या उसकी चर्चा होती है, लेकिन दिल्ली आने पर यह चर्चा होती है। इसलिए दिल्ली आना अहम हो जाता है। किसान राजनीति और किसान आंदोलन दोनों अलग-अलग हैं। इस देश के सबसे बडे़ किसान नेता चौधरी चरण सिंह थे, लेकिन उन्होंने एक भी आंदोलन नहीं किया। किसान एक अलग धारा है और किसान नेता एक अलग धारा हैं। कभी भी पूरे देश के किसान एक साथ आंदोलन में नहीं आए। यह किसान आंदोलनों का चरित्र रहा है। जब से किसान आंदोलन इस देश में शुरू हुए तब से आज तक उनकी कमोबेश मांगें एक सी हैं। लोग खेती क्यों छोड़ रहे हैं। यह अलाभकारी क्यों हो रही है। हम गर्व से कहते हैं कि भारत किसानों का देश है। हमें यह देखना चाहिए कि हमारी जड़ कहां है।

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