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Khabaron Ke Khiladi: अंग्रेजी भाषा के ज्ञान को किसी की योग्यता से जोड़ना कितना जायज, जानें विशेषज्ञों की राय

Sat, 02 Aug 2025 05:05 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sat, 02 Aug 2025 05:05 PM IST
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Khabaron Ke Khiladi Uttarkhand High Court Bench on ADM Officer English Hindi row Expert explains news
खबरों के खिलाड़ी। - फोटो : अमर उजाला
उत्तराखंड उच्च न्यायालय से जुड़ा एक मामला इस वक्त सुर्खियों में है। दरअसल, यह मामला अंग्रेजी भाषा बोलने में असमर्थता जताने वाले एक अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम) स्तर के प्रशासनिक अधिकारी से जुड़ा है। इस बात से हाईकोर्ट इतना नाराज हो गया कि उसने एक-दूसरे मामले की सुनवाई के दौरान ही अधिकारी को लेकर सवाल उठाए और उत्तराखंड के चुनाव आयुक्त और मुख्य सचिव को नोटिस तक जारी कर दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी। इस हफ्ते 'खबरों के खिलाड़ी' में इसी मुद्दे पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, अवधेश कुमार, विजय त्रिवेदी और वरिष्ठ अधिवक्ता रूद्र विक्रम शामिल रहे।  
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विजय त्रिवेदी: यह मसला उत्तराखंड का है। अगर यह तमिलनाडु या केरल का होता तो समझ में यह बात आती। हिंदुस्तान में यह बात लंबे समय से हो रही है कि जो न्यायिक प्रक्रिया, प्रशासनिक प्रणाली है या न्यायिक प्रणाली है उसमें हिंदी को वरीयता दी जाए। प्रधानमंत्री भी मेडिकल साइंस और तमाम चीजों में हिंदी के इस्तेमाल की बात कर रहे हैं। अंग्रेजी आना या सीखना योग्यता में इजाफा जरूर करता है, लेकिन अंग्रेजी नहीं आना योग्यता का पैमाना नहीं हो सकता। हो सकता है जज साहब ने यह इसलिए कहा होगा, क्योंकि उनके फैसले समझने के लिए अंग्रेजी आना जरूरी हो। लेकिन मूलतः यह सोच की बात है। हम इस विचार से नहीं निकल पाए हैं कि अंग्रेजी वाले जो लोग हैं, वही योग्य हैं। 

विनोद अग्निहोत्री: अंग्रेजी एक अतिरिक्त योग्यता है, लेकिन सिर्फ अंग्रेजी जानना ही योग्यता का पैमाना नहीं है। देश में बहुत सारे विद्वान ऐसे हुए हैं, जो अंग्रेजी नहीं या बेहद कम जानते हैं, लेकिन उन्होंने अद्भुत काम किया है। एक बार तो महात्मा गांधी ने भी एक विदेशी पत्रकार से झल्लाकर कहा था कि जाओ दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेजी भूल गया है। मैं हिंदी को थोपने के पक्ष में नहीं हूं, लेकिन हिंदी का इस तरह अपमान करने की भी जरूरत नहीं है कि अगर आपको अंग्रेजी नहीं आती तो आप काम कैसे करते होंगे। अदालतें तो आम आदमी के लिए होती हैं न। चलिए अंग्रेजों को तो आम लोगों को न्याय से दूर रखना था, इसलिए अंग्रेजी का जोर था। लेकिन अब तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी इतनी लोकप्रिय हो रही है। तो पता नहीं हाईकोर्ट में ऐसा क्यों हुआ।
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रामकृपाल सिंह: हिंदी और हिंदीवालों को लेकर एक मानसिकता है कि यही लोग हैं जो सुन लेंगे और सह लेंगे। जिस तरह की टिप्पणी जज साहब ने की है। आप कल्पना करें की कल को कोई बंगाली या तमिल पर आप यह टिप्पणी कर लें, जहां भाषा पर जोर है। इस तरह की जो मानसिकता है, मैं कहना चाहता हूं कि यह शब्द पढ़े-लिखे के मुंह से निकला हो, वह भी कोई पद पर बैठा हो, उस पर शोभा नहीं देता। उत्तराखंड, जिसे देवभूमि कहते हैं, जिसे शुद्ध रूप से हिंदी बेल्ट कहा जाता है, यहां बैठकर अगर कोई आदमी कहे कि इन्हें ठीक से अंग्रेजी नहीं आती तो इस पर क्या ही कहा जा सकता है। 

अवधेश कुमार: मुख्य न्यायाधीश ने जो कुछ कहा है वह भारत के न्यायालयों के भाषाई और औपनिवेशक ढांचे को प्रस्तुत किया है, जिसकी मान्यता हमारे संविधान ने दी है। कुछ राज्यों ने अदालत की कार्यवाही की भाषा को बदला है। मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश ने बदला है।  यह बड़े संघर्ष का विषय है। 

रूद्र विक्रम: उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जो हुआ, उसके मुताबिक हो सकता है कि जिन जज साहब ने यह कहा वह दक्षिण से हैं, उनका अभ्यास तमिलनाडु और कर्नाटक में रहा है। इसलिए उनकी बात मैं समझ सकता हूं कि उन्हें हिंदी नहीं आती होगी। लेकिन व्यवहारिक तौर पर भी देखा जाए तो अंग्रेजी की स्वीकार्यता पूरे देश में है। ऐसे में उत्तराखंड सरकार को यह गौर करना चाहिए कि जो घटनाक्रम हुआ है, उसके बाद जिस तरह चार राज्यों ने हिंदी भाषा को अपनी न्यायिक प्रणाली में शामिल किया है, उसी तरह वह भी यह करे।
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