खबरों के खिलाड़ी: कर्नाटक कांग्रेस में गहलोत-पायलट जैसी रस्साकशी? कैसे बदले हालात, विश्लेषकों से जानिए
Karnataka Congress Leadership Crisis: कर्नाटक में क्या सियासी तस्वीर बदल रही है...। यह सवाल पिछले कई दिनों से प्रासंगिक है। इसकी वजह है- राज्य में सत्ता में बैठी कांग्रेस के दो शीर्ष नेताओं के बीच टकराव की स्थिति। आइए जानते हैं इसके मायने क्या हैं...
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कर्नाटक कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच पहले बयानबाजी हुई। फिर आलाकमान के निर्देश पर दोनों नेताओं ने रुख में नरमी दिखाई और एकजुटता का संदेश देने का प्रयास किया। हालांकि, पिछले दिनों राज्य के हालात ठीक उस स्थिति में पहुंचते दिखे, जैसी स्थिति कभी राजस्थान कांग्रेस में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच नजर आई थी। अब सवाल यह है कि क्या टकराव खत्म हो गया है या इस पर अभी सिर्फ अल्पविराम लगा है? इसी मुद्दे पर चर्चा करने के लिए खबरों के खिलाड़ी में इस बार बतौर विश्लेषक मौजूद थे वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद कुमार, अवधेश कुमार, समीर चौगांवकर और राकेश शुक्ल।
समीर चौगांवकर: दोनों नेताओं के बीच नाश्ते पर बातचीत हुई है। फिलहाल लग रहा है कि इस टकराव का पटापेक्ष हो गया है। दोनों नेताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि जो भी फैसला आलाकमान लेगा, वह दोनों को मान्य होगा। इसमें कोई दोराय नहीं है कि दोनों नेताओं के बीच ढाई-ढाई साल नेतृत्व करने की सहमति बनी थी, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा। भाजपा 'रायता' खा नहीं सकी, लेकिन 'रायता' फैलता देखने में कामयाब रही। कांग्रेस की छीछालेदर होती रही। कांग्रेस अपने इतिहास से सीखी नहीं। सारे समीकरण देखने के बाद डीके शिवकुमार ने अपना रुख बदला है। सोनिया गांधी की विदेश से वापसी के बाद दिसंबर में उनकी मौजूदगी में दोनों नेताओं के बीच बैठक होने के आसार हैं।
अवधेश कुमार: असल में सत्ता के संघर्ष की वजह से सत्ता में साझेदारी का फॉर्मूला निकलता है। भारत की सामूहिक सोच में जो बदलाव आया है, कांग्रेस उससे काफी दूर नजर आती है। कांग्रेस में गांधी परिवार की चुनाव जिताने की क्षमता समाप्त हो चुकी है। जब नेतृत्व के पास महिमा हो, तो पावर शेयरिंग की बात ही नहीं आती। ऐसे में पावर शेयरिंग की बात तय कर उसे लागू करने में अक्षम हो जाना बता रहा है कि कांग्रेस कहां पहुंच चुकी है। अंकगणित के हिसाब से वहां दूसरी सरकार बनने की संभावना नहीं है।
राकेश शुक्ल: राजनीति में पूर्ण विराम नहीं होता। अल्पविराम पर राजनीति चलती है। यूपीए की सरकार के समय वाम दल ताकतवर स्थिति में थे। तब केरल में अच्युतानंदन और पिनराई विजयन के बीच मतभेद गहरा गए। तब वाम दलों की केंद्रीय समिति की बैठक के दौरान तत्कालीन महासचिव प्रकाश करात ने दोनों खेमों के बीच सुलह कराई। उन्हें एक ही गाड़ी में बैठने को कहा गया। दोनों ने केरल भवन में जाकर साथ में भोजन किया। फिर भी 2009 में अच्युतानंदन को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। इसलिए कर्नाटक में अभी जो हुआ, वह पटापेक्ष नहीं कहा जा सकता। भारत जोड़ो यात्रा का पूरा प्रबंधन डीके शिवकुमार ने देखा था। तब उन्होंने पार्टी के लिए 'पुश अप' लगाए थे, अब वे पार्टी से कसरत करवा रहे हैं। वहां टकराव सरकार और संगठन के बीच का है।
रामकृपाल सिंह: जो कर्नाटक कांग्रेस में हुआ, वह सभी दलों में होता है। कांग्रेस-भाजपा में फर्क है। कांग्रेस में बिहार की हार पर समीक्षा हुई। इसके बाद भी कांग्रेस अपनी कमी नहीं देख रही। कांग्रेस खुद अपने आप को खत्म करने पर आमादा है। बिहार के नतीजों ने दो चीजें बताईं। पहला- जमीन पर जो काम करेगा, वही सत्ता विरोधी लहर को मात दे सकता है। दूसरा- एसआईआर जैसे मुद्दों को उठाकर चुनाव नहीं जीते जा सकते। नेगेटिव नैरेटिव के सहारे आप चुनाव नहीं जीत सके।
विनोद अग्निहोत्री: 2004 और 2014 के बीच जब भाजपा कमजोर हो रही थी, तब वहां भी यही हुआ। जब वहां केंद्रीय नेतृत्व मजबूत हुआ तो तस्वीर बदल गई। कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इस समय कमजोर नजर आ रहा है। अगर आप वोट हासिल कर सकते हैं, तो सब आपकी बात मानेंगे। 2024 में भाजपा की स्थिति कमजोर हुई, लेकिन हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार में जीत मिलने से भाजपा फिर मजबूत हुई। उधर 2018 में तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस जीत गई, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद उसकी स्थिति बदल गई। भाजपा में प्रधानमंत्री मोदी हर जगह मौजूद नहीं रहते, लेकिन पार्टी के पास अमित शाह जैसे रणनीतिकार हैं। इसी तरह एक जमाने में सोनिया गांधी के लिए अहमद पटेल रणनीतिकार होते थे। अभी कांग्रेस के पास रणनीतिकारों की कमी नजर आती है।
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