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Khabaron Ke Khiladi: सावन की आहट के साथ फिर शुरू हुआ पहचान का विवाद, विशेषज्ञों ने बताई इसके पीछे की सियासत
Sat, 05 Jul 2025 09:36 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 05 Jul 2025 09:36 PM IST
सार
इस हफ्ते ‘खबरों के खिलाड़ी’ में कांवड़ यात्रा को लेकर हो रहे इसी विवाद पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, विजय त्रिवेदी, राकेश शुक्ल और अवधेश कुमार मौजूद रहे।
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खबरों के खिलाड़ी।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
कांवड़ मार्गों पर स्थित दुकानों पर मालिक के 'नेमप्लेट' लगाने को लेकर एक बार फिर विवाद शुरू हो गया है। मुजफ्फरनगर में एक ढाबे पर काम करने वाले तजमुल के खुद को गोपाल बताने पर जमकर हंगामा हो रहा है। वहीं, इसे लेकर सियासत भी जारी है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। इस हफ्ते ‘खबरों के खिलाड़ी’ में कांवड़ यात्रा को लेकर हो रहे इसी विवाद पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, विजय त्रिवेदी, राकेश शुक्ल और अवधेश कुमार मौजूद रहे।
विजय त्रिवेदी: मेरा कहना है कि सिर्फ सावन में ही क्यों शुचिता की बात हो, पूरे साल भर क्यों नहीं अच्छा खाना खिलाया जाए। पहचान की बात सिर्फ ढाबे पर ही क्यों? क्या आप जब बड़े होटल में जाते हैं तब देखते हैं क्या कि मैनेजर कौन है, कुक कौन है और वहां काम करने वाले कौन हैं। देश चलेगा संविधान से, देश चलेगा कानून से। अगर आप ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो ये सरकार का फेल्योर है।
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विजय त्रिवेदी: मेरा कहना है कि सिर्फ सावन में ही क्यों शुचिता की बात हो, पूरे साल भर क्यों नहीं अच्छा खाना खिलाया जाए। पहचान की बात सिर्फ ढाबे पर ही क्यों? क्या आप जब बड़े होटल में जाते हैं तब देखते हैं क्या कि मैनेजर कौन है, कुक कौन है और वहां काम करने वाले कौन हैं। देश चलेगा संविधान से, देश चलेगा कानून से। अगर आप ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो ये सरकार का फेल्योर है।
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रामकृपाल सिंह: कुछ चीजें जानबूझकर समाज में छोड़ी जाती हैं। जिससे जंग चलती रहे। सवाल इस बात है कि सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग क्या है? ढाबे का नाम कोई भी कुछ भी रख सकता है। लेकिन उसका प्रोपराइटर कौन है ये क्यों नहीं लिखा जाता है? अगर ये लिखा जाएगा तो सारा झगड़ा ही खत्म हो जाएगा। सियासी दल इसमें अपने हिसाब से सियासत करते हैं। सवाल ये है कि रीति रिवाज क्या हैं, आपकी पहचान क्या है?
राकेश शुक्ल: नाम उजागर करने का जो कानून है वो 2006 में कांग्रेस की सरकार में आया था। उस वक्त उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। यह कानून 2011 में लागू किया गया। उस वक्त उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती थीं। इसके एक साल बाद ही अखिलेश यादव राज्य के मुख्यमंत्री बने। उस वक्त ये विवाद क्यों नहीं उठा? मेरा मानना है कि इस समय 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए मुस्लिम वोटों की छीना-झपटी हो रही है। जब कानून को आप राजनीतिक सुविधा के रूप में लगाते हैं तो कानून राजनीतिक रूप ले लेता है। यही इस कानून के साथ हो रहा है।
राकेश शुक्ल: नाम उजागर करने का जो कानून है वो 2006 में कांग्रेस की सरकार में आया था। उस वक्त उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। यह कानून 2011 में लागू किया गया। उस वक्त उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती थीं। इसके एक साल बाद ही अखिलेश यादव राज्य के मुख्यमंत्री बने। उस वक्त ये विवाद क्यों नहीं उठा? मेरा मानना है कि इस समय 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए मुस्लिम वोटों की छीना-झपटी हो रही है। जब कानून को आप राजनीतिक सुविधा के रूप में लगाते हैं तो कानून राजनीतिक रूप ले लेता है। यही इस कानून के साथ हो रहा है।
विनोद अग्निहोत्री: पहलगाम की घटना एक आतंकी घटना थी। उससे इस तरह के विवाद को जोड़ना कहीं से भी ठीक नहीं है। पहचान बताना विवाद का विषय नहीं है, पहचान छुपाने में ऐतराज है। यह मुद्दा सिर्फ पश्चिमी यूपी में क्यों उठता है ये भी गौर करने वाली बात है, जबकि पूरे देश के अलग-अलग इलाको में कांवड़ निकाली जाती हैं। जांच का काम सरकारी एजेंसियों का है, न कि कोई भी व्यक्ति जाए और दुकानदार से उसका नाम और कागज दिखाने को कहे।
अवधेश कुमार: यह इतना सरल नहीं है, ये किसी आम आदमी के भोजन का विषय नहीं है। ये ऐसा है कि अपनी साधना और धर्म की पवित्रता बनाए रखने के लिए अगर कुछ लोग काम कर रहे हैं तो वो गलत हो गया और जो छद्म रूप से ये कर रहे हैं वो दया के पात्र हैं तब तो फिर हो गया? हमारे यहां हर चीज में शुचिता का ध्यान रखा जाता है। उस शुचिता को हमारे यहां कुछ लोग नहीं समझ रहे हैं।
अवधेश कुमार: यह इतना सरल नहीं है, ये किसी आम आदमी के भोजन का विषय नहीं है। ये ऐसा है कि अपनी साधना और धर्म की पवित्रता बनाए रखने के लिए अगर कुछ लोग काम कर रहे हैं तो वो गलत हो गया और जो छद्म रूप से ये कर रहे हैं वो दया के पात्र हैं तब तो फिर हो गया? हमारे यहां हर चीज में शुचिता का ध्यान रखा जाता है। उस शुचिता को हमारे यहां कुछ लोग नहीं समझ रहे हैं।