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Khabaron Ke Khiladi: कॉकरोच जनता पार्टी बस व्यंग्य या सियासी दलों के लिए खतरे की घंटी, जानें विश्लेषकों की राय

Sat, 23 May 2026 05:01 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sat, 23 May 2026 05:01 PM IST
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Khabaron Ke Khiladi Cockroach Janta Party Satire Platform Political Party Gen Z Analysis by Experts news
कॉकरोच जनता पार्टी पर खबरों के खिलाड़ी में चर्चा। - फोटो : अमर उजाला
सोशल मीडिया पर बीते एक हफ्ते से कॉकरोच जनता पार्टी चर्चा में है। देश के मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी के बाद शुरू हुआ बवाल भी पूरे हफ्ते चर्चा में रहा। सोशल मीडिया पर इसे लेकर बात इतनी बढ़ी की सियासी दल भी इसमें शामिल हो गए। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल, अनुराग वर्मा और संजय राणा मौजूद रहे। 
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अनुराग वर्मा: हमारा देश 140 करोड़ से ज्यादा लोगों का देश है। ये एक ऐसी घटना है जो बस हो गई तो हम आप एनालाइज कर रहे हैं कि ये कैसे हो गई। हिंदुस्तान में हर चीज में राजनीति होती है। इस मामले में पक्ष-विपक्ष के अलावा के बहुत बड़ा वर्ग है जो दोनों से नाराज है। उसे एक आवाज सी मिल गई। हालांकि, इसके साजिश वाले एंगल से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। 
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राकेश शुक्ल: दुनिया में सोशल मीडिया ने अपनी ताकत का एहसास पहले भी कराया है। तीन देश ऐसे हैं जहां इसकी वजह से सत्ता तक बदल गई। कॉकरोच जनता पार्टी की बात जहां तक है तो जो चेहरा इसके पीछे है वो पहले से ही सियासत के पोस्टर पर चिपका रहा है। इसके ताकतवर रूप से खड़े होने के पीछे ये सबसे बड़ी दिक्कत है। मुझे लगता है देश में कॉकरोच जनता पार्टी का भविष्य वही होगा जो वामपंथी और समाजवादी विचारधारा का रहा है। 

पूर्णिमा त्रिपाठी: पांच दिन के अंदर ये राजनीतिक व्यंग्य के सोशल मीडिया पेज के फॉलोअर्स की संख्या भाजपा और कांग्रेस से आगे निकल गई। अगर ये आधारहीन होता तो इसमें हजार-दो हजार या पांच हजार फॉलोअर होते और ये कहीं खो जाता। अगर इतने फॉलोअर हैं तो कुछ तो होगा। अचानक ये युवाओं के लिए एक आउटलेट सा बन गया है। सरकार की तरफ से इसके हैंडल बैन करना क्या दिखाता है?

संजय राणा: मेंटली एक्टिव आदमी कभी बेरोजगार नहीं हो सकता है। नेपाल में भ्रष्टाचार और परिवारवाद के लिए बदलाव था। इसी तरह बांग्लादेश में जो बदलाव था वो इस्लामिस्ट बदलाव था। इस तरह की कोई चीज भारत में नहीं है। भारत में ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है। 

रामकृपाल सिंह: हमारे गांव में नौटंकी होती थी। उस नौटंकी में पर्दा गिरता था। कलाकार कम होते थे तो वो अलग-अलग रोल करते  थे। जब तक वो बदलाव होता था तब तक जोकर आता था। राजनीति में कभी-कभी इस तरह का पर्दा पड़ता है और ऐसी चीजें आती रहती हैं। इस तरह की चीजें होती रहती हैं, मैं इसको इससे ज्यादा नहीं मानता हूं।
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