जाति, सियासत या भ्रष्टाचार..: हरियाणा में दो पुलिसवालों ने क्यों की आत्महत्या? ‘खबरों के खिलाड़ी’ का विश्लेषण
हरियाणा में आईपीएस की आत्महत्या के बाद लगातार सरकार पर, व्यवस्था पर बहुत सारे सवाल उठ रहे हैं। क्या है इस पूरे प्रकरण की कहानी और क्यों लगातार यह चर्चा में है? इसी विषय इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
हरियाणा में एक आईपीएस अधिकारी ने आत्महत्या की। उसके बाद एक एएसआई ने भी आत्महत्या कर ली। यह मामला इस हफ्ते चर्चा में रहा। आईपीएस की आत्महत्या के बाद लगातार सरकार पर, व्यवस्था पर बहुत सारे सवाल उठ रहे हैं। क्या है इस पूरे प्रकरण की कहानी और क्यों लगातार यह चर्चा में है? इसी विषय इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, अवधेश कुमार, राकेश शुक्ल और अभिषेक कुमार मौजूद रहे।
विनोद अग्निहोत्री: हमारे देश में जो प्रशासन है, पुलिस है, उसमें राजनीति और सामाजिक बुराइयां इस हद तक घुसपैठ कर गई हैं कि इस तरह के दुखद प्रकरण से सामने आ रहे हैं। पहले आईपीएस अधिकारी पूरन कुमार जी सुसाइड करते हैं। आठ पेज का एक सुसाइड नोट छोड़ते हैं। इसमें 13 पुलिस अधिकारियों पर इल्जाम लगाते हैं कि उनका उत्पीड़न किया गया। इसके बाद एएसआई संदीप सिंह सुसाइड कर लेते हैं। वो भी पांच पेज का नोट देते हैं। संदीप सिंह है वो जो नोट लिखते हैं उसमें पूरन कुमार पर भयानक भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं और वो कहते हैं कि भ्रष्ट है। हरियाणा की जो ब्यूरोक्रेसी है और जो पुलिस है उसमें जातीय संघर्ष और व्यक्तिगत भ्रष्टाचार और स्वार्थों का मामला इतना ज्यादा गहरे धस गया है कि इस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं।
राकेश शुक्ल: देखिए सबसे पहले तो हमें यह समझना चाहिए कि भारतीय जनमानस के मन में एक आम धारणा बना दी गई कि आईएस और आईपीएस जो है सृष्टि का सबसे बुद्धिमान प्राणी है। और उसी धारणा ने इनके मन में एक ऐसा बहम तैयार किया कि जो आईएएस और आईपीएस के अंदर अहम पैदा कर देता है। तो उस अहम के चलते एक नई तरह की परिस्थितियां तैयार हुई हैं भारत में आईएस और आईपीएस के बीच में। आप देखिए दोनों यूपीएससी से सिलेक्शन है लेकिन दोनों के कैडर अलग हैं और दोनों की लामबंदी अलग है। एक ही जिले में काम करने वाले पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर के बीच में आप कभी भी सामंजस्य नहीं पाएंगे। दोनों के बीच में अधिकारों को लेकर कहीं ना कहीं पेंच फंसा होता है।
अवधेश कुमार: तीन बातें बिल्कुल साफ है कि देखिए आईएएस और आईपीएस अफसर का टाइम बाउंड प्रमोशन होता है और अगर नहीं होता है तो कोर्ट से जाकर करा लेते हैं। मैंने आज तक नहीं देखा है कि कोई आईएएस ऑफिसर का प्रमोशन रुक गया हो और उसको कोर्ट से नहीं मिला हो। तो इसलिए उनका प्रमोशन नहीं हुआ हो और उनको पुलिस ट्रेनिंग में भेज दिया गया हो यह कारण ऐसे नहीं हो सकता इसके पीछे। दूसरा इतना बड़ा अफसर जब चाहता तो गवर्नर से, मुख्यमंत्री से मिल सकता था कि यह परिस्थिति है। उन्होंने मिलने की कोशिश नहीं की। पूरा देखा गया कहीं फोन भी नहीं है कुछ भी नहीं है। सीधे आत्महत्या की है। इस नाते यह संदिग्ध होता है।
अभिषेक कुमार: सवाल ये है कि इतने बड़े पद पर बैठा हुआ यूपीएससी से सिलेक्टेड अधिकारी सुसाइड करने पर मजबूर क्यों हुआ? इसके दो कारण है। जो हमारा सोशल स्ट्रक्चर है वो एक बड़ा कारण है। यह सोशल स्ट्रक्चर की प्रॉब्लम है और इस प्रॉब्लम में इसका बीजारोपण होता है। दूसरी बात जो मैं इसमें जोड़ देना चाहता हूं वो है ग्लोबलाइजेशन का सोशल इंपैक्ट।
राम कृपाल सिंह: जब कोई घटना हो जाती है तब हमको जातिवाद याद आता है। रोज हम पढ़ते हैं और रोज जानते हैं सच्चाई को कि जातिवाद है और पूरी तरह से सच्चाई है। हमारे यहां क्या है कि डाइंग डिक्लेरेशन यानी मरने के पहले जो कुछ भी लिखा जाए वो एडमिसिबल एविडेंस माना जाता है। इन दो डाइंग डिक्लेरेशन ने यह साबित कर दिया है कि इसको एडमिसिबल एविडेंस नहीं मानना चाहिए।