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केरल PSC का क्रूर मजाक: 18 साल बाद भेजी सरकारी नौकरी की चिट्ठी, पर तब तक आ चुकी थी रिटायरमेंट की उम्र
Tue, 02 Jun 2026 12:29 AM IST
राकेश कुमार
एएनआई, कालीकावु।
एएनआई, कालीकावु।
Published by: राकेश कुमार
Updated Tue, 02 Jun 2026 12:29 AM IST
सार
केरल में प्रशासनिक सुस्ती के चलते एक अभ्यर्थी को परीक्षा पास करने के 18 साल बाद नियुक्ति पत्र मिला, लेकिन तब तक वह रिटायरमेंट की उम्र 60 वर्ष पार कर चुके थे। अब पीड़ित उम्मीदवार अपनी जन्मतिथि के दस्तावेज में सुधार करवाकर कम से कम एक साल की नौकरी पाने के लिए सरकार से मानवीय गुहार लगा रहे हैं। क्या है मामला? जानिए...
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केरल का मामला
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
सरकारी नौकरी की आस में बैठे हजारों युवाओं के लिए मूचेक्कल अब्दुल मजीद की कहानी एक बड़ा सबक बन गई है। केरल लोक सेवा आयोग (पीएससी) की लापरवाही का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। एक उम्मीदवार ने पीएससी की परीक्षा पास की और रैंक लिस्ट में जगह भी बनाई, लेकिन जब उसके हाथ में नियुक्ति पत्र आया, तब तक उसकी रिटायरमेंट की उम्र भी पार हो चुकी थी।
यह मामला मलप्पुरम जिले के कालिक्वु के अंतर्गत आने वाले पूचप्पयिल, अंजाचावडी के रहने वाले अब्दुल मजीद का है। मजीद ने साल 2005 में पार्ट-टाइम जूनियर लैंग्वेज टीचर (अरबी) के पद के लिए पीएससी परीक्षा दी थी। उनका नाम रैंक लिस्ट में शामिल भी हुआ, लेकिन भर्ती प्रक्रिया साल-दर-साल लटकती चली गई।
तीन साल की लिस्ट और 18 साल का इंतजार
आमतौर पर पीएससी की रैंक लिस्ट तीन साल के लिए वैध होती है, जो 2008 में समाप्त हो गई थी। अमूमन लिस्ट खत्म होने के बाद उम्मीदवारों की उम्मीदें भी टूट जाती हैं। मगर इस मामले में कहानी अलग थी। योग्य उम्मीदवारों की कमी के कारण एक पद पहले खाली छोड़ दिया गया था, जिसे भरने की प्रक्रिया वर्षों बाद अचानक दोबारा शुरू की गई।
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इसका नतीजा यह हुआ कि 26 अप्रैल 2026 को त्रिशूर पीएससी कार्यालय से अब्दुल मजीद को अचानक एक एडवाइस मेमो मिला। इसमें उन्हें नियुक्ति पत्र मिलने के तीन महीने के भीतर नौकरी ज्वाइन करने का निर्देश दिया गया। हालांकि, जब तक यह पत्र मजीद के पास पहुंचा, तब तक सरकारी दस्तावेजों के अनुसार वह 60 साल की उम्र पूरी कर चुके थे।
यह भी पढ़ें: Kerala: 'हर कार्यक्रम पूरा वंदे मातरम का गाना अनिवार्य नहीं, यह अनावश्यक है', कांग्रेस नेता शशि थरूर का बयान
प्रशासनिक लापरवाही और उम्र का फेरबदल
मजीद का आरोप है कि यह नियुक्ति साल 2010 में ही हो जानी चाहिए थी, लेकिन इसे 2026 तक लटका कर रखा गया। स्थानीय निवासियों ने भी इस पूरी घटना को प्रशासनिक लापरवाही का एक बड़ा उदाहरण बताया है । इस मामले में अब एक नया मोड़ भी सामने आया है। अब्दुल मजीद के एसएसएलसी सर्टिफिकेट में उनकी जन्मतिथि 27 मई 1966 दर्ज है, जबकि उनका कहना है कि उनकी वास्तविक जन्मतिथि 27 मई 1967 है।
मजीद को अब उम्मीद है कि अगर इस गलती को सुधार लिया जाए, तो वह कम से कम एक साल के लिए सरकारी सेवा का लाभ उठा सकेंगे। उन्होंने राजस्व मंत्री एपी अनिल कुमार के माध्यम से शिक्षा मंत्री एन शमसुद्दीन को एक आवेदन भेजा है, जिसमें मानवीय आधार पर विचार करने की मांग की गई है।
उम्मीद और मायूसी का अजीब संगम
अब्दुल मजीद इससे पहले वांडूर के एक महिला इस्लामिक कॉलेज में अरबी शिक्षक के रूप में काम कर चुके हैं। उनका नाम पीएससी की एक अन्य रैंक लिस्ट में भी आया था, लेकिन संरक्षित शिक्षकों को प्राथमिकता दिए जाने के कारण तब भी उनकी नियुक्ति नहीं हो सकी थी। जिस सरकारी नौकरी के लिए उन्होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा इंतजार में गुजार दिया, वह नौकरी आखिरकार आई तो सही, लेकिन अपने साथ केवल मायूसी लेकर आई।
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यह मामला मलप्पुरम जिले के कालिक्वु के अंतर्गत आने वाले पूचप्पयिल, अंजाचावडी के रहने वाले अब्दुल मजीद का है। मजीद ने साल 2005 में पार्ट-टाइम जूनियर लैंग्वेज टीचर (अरबी) के पद के लिए पीएससी परीक्षा दी थी। उनका नाम रैंक लिस्ट में शामिल भी हुआ, लेकिन भर्ती प्रक्रिया साल-दर-साल लटकती चली गई।
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तीन साल की लिस्ट और 18 साल का इंतजार
आमतौर पर पीएससी की रैंक लिस्ट तीन साल के लिए वैध होती है, जो 2008 में समाप्त हो गई थी। अमूमन लिस्ट खत्म होने के बाद उम्मीदवारों की उम्मीदें भी टूट जाती हैं। मगर इस मामले में कहानी अलग थी। योग्य उम्मीदवारों की कमी के कारण एक पद पहले खाली छोड़ दिया गया था, जिसे भरने की प्रक्रिया वर्षों बाद अचानक दोबारा शुरू की गई।
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इसका नतीजा यह हुआ कि 26 अप्रैल 2026 को त्रिशूर पीएससी कार्यालय से अब्दुल मजीद को अचानक एक एडवाइस मेमो मिला। इसमें उन्हें नियुक्ति पत्र मिलने के तीन महीने के भीतर नौकरी ज्वाइन करने का निर्देश दिया गया। हालांकि, जब तक यह पत्र मजीद के पास पहुंचा, तब तक सरकारी दस्तावेजों के अनुसार वह 60 साल की उम्र पूरी कर चुके थे।
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प्रशासनिक लापरवाही और उम्र का फेरबदल
मजीद का आरोप है कि यह नियुक्ति साल 2010 में ही हो जानी चाहिए थी, लेकिन इसे 2026 तक लटका कर रखा गया। स्थानीय निवासियों ने भी इस पूरी घटना को प्रशासनिक लापरवाही का एक बड़ा उदाहरण बताया है । इस मामले में अब एक नया मोड़ भी सामने आया है। अब्दुल मजीद के एसएसएलसी सर्टिफिकेट में उनकी जन्मतिथि 27 मई 1966 दर्ज है, जबकि उनका कहना है कि उनकी वास्तविक जन्मतिथि 27 मई 1967 है।
मजीद को अब उम्मीद है कि अगर इस गलती को सुधार लिया जाए, तो वह कम से कम एक साल के लिए सरकारी सेवा का लाभ उठा सकेंगे। उन्होंने राजस्व मंत्री एपी अनिल कुमार के माध्यम से शिक्षा मंत्री एन शमसुद्दीन को एक आवेदन भेजा है, जिसमें मानवीय आधार पर विचार करने की मांग की गई है।
उम्मीद और मायूसी का अजीब संगम
अब्दुल मजीद इससे पहले वांडूर के एक महिला इस्लामिक कॉलेज में अरबी शिक्षक के रूप में काम कर चुके हैं। उनका नाम पीएससी की एक अन्य रैंक लिस्ट में भी आया था, लेकिन संरक्षित शिक्षकों को प्राथमिकता दिए जाने के कारण तब भी उनकी नियुक्ति नहीं हो सकी थी। जिस सरकारी नौकरी के लिए उन्होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा इंतजार में गुजार दिया, वह नौकरी आखिरकार आई तो सही, लेकिन अपने साथ केवल मायूसी लेकर आई।