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केरल BDS छात्र मौत मामला: हाईकोर्ट को आरोपी को बचाने की साजिश का शक, पुलिस अधिकारियों से क्यों मांगा जवाब?

Wed, 22 Jul 2026 11:00 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल पीटीआई, कोच्चि
पीटीआई, कोच्चि Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Wed, 22 Jul 2026 11:00 PM IST
सार

Kerala BDS Student Death Case: केरल हाईकोर्ट ने बीडीएस छात्र नितिन राज की कथित आत्महत्या के मामले में गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि पहली नजर में ऐसा संदेह है कि कुछ वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आरोपी को हिरासत से बचाने की कोशिश कर रहे थे। अदालत ने जांच अधिकारी और क्राइम ब्रांच के एसपी को तलब किया है। आखिर कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा? आइए, विस्तार से अब पूरे मामले को जानते हैं...

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Kerala BDS Student Death Case: Why Did the High Court Seek Answers from Senior Police Officers
केरल हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

केरल हाईकोर्ट ने कन्नूर के एक निजी डेंटल कॉलेज के बीडीएस छात्र की कथित आत्महत्या के मामले में पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने बुधवार को कहा कि पहली नजर में ऐसा संदेह है कि कुछ वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आरोपी को हिरासत से बचाने में शामिल हो सकते हैं। अदालत ने इस मामले में जांच अधिकारी (आईओ) और क्राइम ब्रांच के पुलिस अधीक्षक को 24 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर बताते हुए पुलिस से कई दस्तावेज और जवाब भी मांगे हैं।
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यह मामला कन्नूर के अंजराकंडी स्थित एक निजी डेंटल कॉलेज के छात्र नितिन राज की कथित आत्महत्या से जुड़ा है। नितिन राज 10 अप्रैल को कॉलेज परिसर की एक इमारत से गिरने के बाद मृत मिले थे। जांच के अनुसार अनुसूचित जाति से आने वाले छात्र का कॉलेज के विभागाध्यक्ष डॉ. एम. के. राम ने कक्षा में कथित रूप से अपमान किया और डराया-धमकाया था। डॉ. राम इस मामले के मुख्य आरोपी हैं। उनकी अग्रिम जमानत याचिकाएं पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो चुकी थीं। इसके बाद उन्हें कर्नाटक से गिरफ्तार किया गया, जहां वह छिपे हुए थे। सोमवार को उनकी गिरफ्तारी दर्ज की गई, लेकिन उसी दिन विशेष अदालत ने यह कहते हुए उन्हें रिहा करने का आदेश दे दिया कि गिरफ्तारी के आधार (Grounds of Arrest) आरोपी को उपलब्ध नहीं कराए गए थे।
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हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों पर क्या टिप्पणी की?

न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने कहा कि अदालत को पहली नजर में संदेह है कि आरोपी को हिरासत से बचाने में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका हो सकती है। अदालत ने कहा कि यह मानना कठिन है कि उप पुलिस अधीक्षक (डीएसपी) रैंक का जांच अधिकारी यह नहीं जानता होगा कि गिरफ्तारी के बाद आरोपी को अदालत में पेश करते समय गिरफ्तारी के आधार देना कानूनी रूप से जरूरी है। अदालत ने कहा कि यह संदेह इसलिए भी मजबूत होता है क्योंकि राज्य सरकार ने जांच दल में बदलाव कर विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन कर दिया है। सरकार ने अदालत को बताया कि पूरे मामले की जांच कराई जाएगी।
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अदालत ने जांच अधिकारी और पुलिस अधीक्षक को क्या निर्देश दिए?

  • जांच अधिकारी (आईओ) को 24 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से हाईकोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया।
  • आरोपी को निचली अदालत में पेश करते समय जमा किए गए सभी दस्तावेजों की स्पष्ट और पढ़ने योग्य प्रतियां साथ लाने को कहा।
  • गिरफ्तारी से पहले की सभी कानूनी औपचारिकताओं का पालन किया गया या नहीं, इस संबंध में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।
  • जांच की निगरानी करने वाले क्राइम ब्रांच के पुलिस अधीक्षक (एसपी) को भी 24 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होकर जवाब देने का आदेश दिया।
  • अदालत ने दोनों अधिकारियों से मामले में उठे गंभीर सवालों पर अपना स्पष्टीकरण देने को कहा।

विशेष अदालत और दस्तावेजों को लेकर हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि उसे यह जानकारी नहीं है कि विशेष अदालत में क्या कार्यवाही हुई और जांच अधिकारी ने वहां कौन-कौन से दस्तावेज पेश किए। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी की रिहाई से पहले पीड़ित परिवार को सुना नहीं गया था। इसलिए हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के न्यायाधीश को निर्देश दिया कि आरोपी को पेश करते समय जांच अधिकारी द्वारा जमा किए गए सभी दस्तावेजों और रिहाई से संबंधित आदेश की प्रति अदालत को भेजी जाए। अदालत ने संकेत दिया कि पूरे घटनाक्रम की विस्तार से जांच की जाएगी।
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