कश्मीरी पंडित बोले- 31 सालों से कर रहे हैं न्याय का इंतजार, घाटी में फिर से बसाने का रास्ता निकाले सरकार
डाउन टाउन के रहने वाले डॉक्टर मैक्सन टिक्कू ने कहा कि आम कश्मीरी, वह हिंदू हो या मुसलमान, घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी चाहता है। केंद्र सरकार के प्रयासों से लगता है कि वह इसके लिए प्रयत्नशील भी है, लेकिन पाकिस्तान से आए आतंकी और कुछ राजनीतिक दल ऐसा नहीं चाहते हैं...
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केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर के नेताओं के साथ बैठक कर इस राज्य में एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन का संकेत दे रही है, लेकिन जम्मू-कश्मीर के लोग इस बातचीत से बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं हैं। उनका आरोप है कि सरकार आज उन्हीं राजनीतिक दलों से बातचीत कर रही है जो घाटी में कश्मीरी पंडितों के विस्थापन और हत्याओं के लिए जिम्मेदार रहे हैं और पाकिस्तान की आवाज उठाते रहे हैं।
आम लोग कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी चाहते हैं। हिंदू हो या मुसलमान, सभी लोग कश्मीरी पंडितों की वापसी के पक्ष में हैं। लेकिन सामान्य लोगों को लगता है कि पाकिस्तान के भेजे आतंकी और कुछ पाकिस्तान परस्त राजनीतिक दल इस राह में अड़ंगे लगाते रहे हैं। आम लोगों को इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा फिर हासिल हो या केंद्र शासित प्रदेश बना रहे, लोग चाहते हैं कि किसी भी हालत में घाटी की शांति बनी रहे।
कश्मीरी नेता सुशील पंडित ने अमर उजाला से कहा कि जम्मू-कश्मीर पूर्ण राज्य बने या केंद्र शासित प्रदेश रहे, इससे बड़ा फर्क नहीं पड़ता। अब तक की सभी केंद्र सरकारें अपनी छवि सुधार के लिए यह सब करती रही हैं। पहले कांग्रेस यही काम करती थी, आज भाजपा वही काम कर रही है। दुर्भाग्य यह है कि केंद्र सरकार आज भी उन्हीं दलों से बातचीत कर रही है जो कश्मीरी पंडितों को राज्य से बाहर निकालने के लिए जिम्मेदार रहे हैं। सुशील पंडित ने कहा कि कश्मीरी पंडितों के सामूहिक नरसंहार के 31 साल हो गए, आज तक उन्हें न्याय नहीं मिला। उलटे सरकार उन्हीं लोगों से बात कर रही है जो इस नरसंहार को मौन समर्थन दे रहे थे। उनकी मांग है कि सरकार कश्मीरी पंडितों को फिर से बसाए जाने को लेकर कोई सार्थक कदम उठाए।
केंद्र के प्रयासों ने बदली हमारी जिंदगी
जम्मू-कश्मीर की अदालतों में वकालत की प्रैक्टिस कर रहे अधिवक्ता भानू सिंह जसरोटिया ने अमर उजाला से कहा कि केंद्र सरकार के प्रयासों से जम्मू-कश्मीर के उन लोगों की जिंदगी में बड़ा बदलाव आया है, जिसे आज तक राज्य का निवासी माना ही नहीं जाता था। 1962 और 1972 के युद्धों के पाक अधिकृत कश्मीरी विस्थापितों को यहां की सरकारें इंसान के रूप में देखती ही नहीं थीं, उनके कोई अधिकार नहीं थे।
लेकिन अनुच्छेद 370 के विवादित प्रावधानों की समाप्ति के बाद इन शरणार्थियों के परिवार यहां के नागरिक बन गए हैं। इन परिवारों के बच्चे अब सरकारी नौकरियों में आवेदन कर रहे हैं और चयनित भी हो रहे हैं। जम्मू-कश्मीर क्षेत्र के लिए यह बड़ा बदलाव है। जसरोटिया के अनुसार, इसी प्रकार अनुच्छेद 370 और 35ए की समाप्ति के कारण यहां की महिलाओं के अधिकारों में भी बढ़ोतरी हुई है। अब राज्य के बाहर के पुरूषों से विवाह करने के बाद उनके राज्य के अधिकार निरस्त नहीं होते। यह बड़ा बदलाव है और राज्य की महिलाएं इस अधिकार को पाकर काफी खुश हैं।
उन्होंने कहा कि अगर जम्मू और कश्मीर को राज्य का दर्जा दिया जाता है तो यह क्षेत्र के विकास के लिए और अधिक प्रभावी कदम होगा, लेकिन केंद्र को यह ध्यान रखना होगा कि इस कदम के बाद कश्मीर क्षेत्र एक बार फिर अशांति के दौर में न चला जाए।
लाखों लोगों की जिंदगी-मौत का सवाल
मुख्य कश्मीर के हवाकदल, जिसे अब डाउन टाउन भी कहा जाता है, के रहने वाले डॉक्टर मैक्सन टिक्कू ने कहा कि आम कश्मीरी, वह हिंदू हो या मुसलमान, घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी चाहता है। केंद्र सरकार के प्रयासों से लगता है कि वह इसके लिए प्रयत्नशील भी है, लेकिन पाकिस्तान से आए आतंकी और कुछ राजनीतिक दल ऐसा नहीं चाहते हैं। वे अलग-अलग कारणों से इस प्रयास को बाधित कर यहां की शांति को प्रभावित करते रहे हैं।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर के सभी राजनीतिक दलों को मिलजुल कर इसका समाधान निकालना चाहिए क्योंकि यह लाखों लोगों की जिंदगी और मौत का विषय है, यह राजनीतिक मामला नहीं है, राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर राजनीति करने से बाज आना चाहिए।