क्या फिर जल उठेगा कश्मीर?
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मुश्किल समय अवसर भी मुहैया करवाते हैं। इसे नरेंद्र मोदी से बेहतर कौन राजनीतिज्ञ जानता होगा। साल 2001 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बनाए गए थे, कुछ ही दिन हुए थे पद संभाले, जब भुज में भूकंप आया तो उन्होंने राहत और पुनर्वास के बेहतरीन काम से एक ऐसे नेता के तौर पर छवि बनाई जो चीजों को करना और करवाना जानता है।
कश्मीर की मौजूदा तनावपूर्ण स्थिति, जिसमें अब तक 30 लोगों की मौत की खबर है, के बाद ऐसा लग रहा है कि कश्मीर की जनता, भारत के खिलाफ उठ खड़ी हुई है, जिसमें कोई व्यवस्था काम नहीं कर रही है। हर कुछ साल बाद कश्मीर में तनाव की स्थिति, अब एक बदरंग सच्चाई बन चुकी है।
इसका स्वरूप कमोबेश एक जैसा ही दिखता है, जिसके चलते पुराने वैचारिक लेख और सोशल मीडिया हैशटैग का आसानी से नए सिरे से इस्तेमाल संभव होता है। नरेंद्र मोदी दावा करते रहे हैं कि वे इच्छाशक्ति और नजरिए वाले नेता हैं।
फर्स्ट शब्द का इस्तेमाल करना भी उन्हें खूब पसंद है। वे जो भी करते हैं, उसके बारे में बताते हैं कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। अगर वे इसी नजरिए से कश्मीर के मौजूदा हाल को देखें तो वे इसे कश्मीर में हिंसा खत्म करने के अवसर के तौर पर देख सकते हैं।
2010 में 112 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी
अटल बिहारी वाजपेयी को अपवाद मान लें तो दिल्ली में राजनीति के अभिजात्य तबके की सोच कश्मीर को सुरक्षा प्रतिष्ठानों के हवाले करने की रही है। चाहे वो 2008 के तनाव की बात हो या फिर 2010 के या फिर 2013 में अफजल गुरु को फांसी देने का उदाहरण हो, ये सब दिखाते हैं कि किस तरह दिल्ली कश्मीर को केवल सुरक्षा के चश्मे से देखती है।
पैरों से कुचलने की नीति की मुश्किल यही है कि आप एक विरोधी को तो दबा सकते हैं लेकिन आप अगली पीढ़ी के विरोधी होने के बीज भी डाल रहे होते हैं। 2010 में 112 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी, इनमें ज्यादातर पत्थर फेंकने वाले लड़के थे, जो किशोरावस्था में थे या फिर 20 साल से कुछ ज्यादा उम्र होगी उनकी। इसकी शुरुआत एक निर्दोष लड़के की हत्या से हुई थी।
तब मैंने ऐसे ही कुछ युवाओं से पूछा था कि उन्हें क्या प्रेरित करता है। उन्होंने मुझे बताया था कि 2008 के तनाव ने उनकी मासूमियत को बिखेर कर रख दिया। उन्होंने कश्मीर के इतिहास के बारे में अपने पिता, दादा-नाना से पूछा, किताबें पढ़ीं और इसे समझने के लिए इंटरनेट को खंगाला।
संघर्ष भरे इतिहास को जानने के बाद ये युवा इस संघर्ष से जुड़ने को अपना दायित्व समझने लगे थे। दिल्ली की सरकार ने सेना के दम पर उस वक्त के तनाव को दबाया, योजना बद्ध तरीक़े से अफजल गुरु की फांसी के बाद की स्थिति पर काबू पाया, कर्फ्यू का सहारा लिया लेकिन इन सब प्रक्रिया में एक और पीढ़ी कट्टरपंथी बन गई।
बुरहान वानी की उम्र 2010 में महज 16 साल थी
सैन्य प्रतिष्ठानों ने अपने नज़रिए से पत्थर फेंकने वालों को चरमपंथी में तब्दील कर दिया। बुरहान वानी की उम्र 2010 में महज 16 साल थी। सैन्य प्रतिष्ठानों के लिए उसे न्यूट्रल बनाना ज्यादा जरूरी थी, क्योंकि उसका व्यक्तित्व और उसके वीडियो कश्मीरी युवाओं को बड़े पैमाने पर प्रभावित करने लगे थे। हालांकि उन्हें अंदाजा नहीं रहा होगा कि उसकी हत्या के बाद इतने लोग उमड़ेंगे।
2010 में जिस पीढ़ी को दबाया गया वह तो आगे बढ़ गई लेकिन एक नई पीढ़ी वापसी करने के लिए तैयार हो गई। कश्मीर में आज 14 साल के बच्चे, कर्फ्यू की स्थिति में अपने बड़ों से कश्मीर के इतिहास के बारे में पूछ रहे हैं, वे बलात्कार और नरसंहार के बारे में सुन रहे हैं, वे शहादत और आत्मनिर्णय के अधिकार के बारे में सुन रहे हैं।
रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के पूर्व प्रमुख एएस दुलत ने इस चक्र को तोड़ने के लिए राजनीतिक दखल की मांग की है। कश्मीर एक राजनीतिक समस्या है जिसे राजनीतिक तौर पर हल किए जाने की जरूरत है।
लेकिन नई दिल्ली में, चाहे वह मोदी का शासन हो या फिर मनमोहन का, ये कश्मीर को सुरक्षा और ज्यादा से ज्यादा आर्थिक समस्या मानते हैं। दुलत ने कश्मीर की समस्या के हल के लिए केवल एक मंत्र दिया है।
वार्ताकार नियुक्त किए जाते हैं,
बातचीत का समय-समय पर, नई दिल्ली में कश्मीरी लोगों तक पहुंचने और उनसे बातचीत की चर्चा सुनाई देती है। वार्ताकार नियुक्त किए जाते हैं, समितियां बनती हैं, लेकिन ये पहलें बस वहीं की वहीं रह जाती हैं।
इस तरह से भारतीय हुकूमते कश्मीरियों के उस आरोप पर मुहर लगाती हैं कि दिल्ली इस समस्या का हल नहीं ढूंढना चाहती। इसके उलट दिल्ली में बैठी सरकारें बताती हैं कि कोई समस्या है ही नहीं।
अगर दिल्ली सरकार उत्तर-पूर्व के विद्रोहियों से बातचीत के लिए तैयार है, तो फिर वह कश्मीर के विद्रोहियों से बातचीत के लिए कोशिश क्यों नहीं करती? अगर हुर्रियत नेता कोई नहीं हैं, तो फिर दिल्ली सरकार को पाकिस्तानी राजनयिकों से बातचीत करने में क्या समस्या है? अगर कश्मीर समस्या केवल यही है कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर को हासिल करना है तो भी दिल्ली सरकार ने उसके लिए क्या किया है?
दिल्ली की सरकार ये कहती है कि माओवादी अगर हथियार डाल दें, तो वह उनसे बातचीत को तैयार है लेकिन कश्मीर में चरमपंथ की कमी के बावजूद सरकार बातचीत के लिए तैयार नहीं है।
आप चाहे इसे जिस तरह देखते हों, दिल्ली की सरकार की दिलचस्पी कश्मीर में यथास्थिति बनाए रखने की है। चाहे वह कांग्रेस की सरकार रही हो या फिर मोदी की। इस दंभ में चूर कि सुरक्षा बल किसी भी स्थिति से निपटने में सक्षम है। सरकार बिलकुल सामने खड़ी समस्या को भी नहीं देख पा रही है।
इसके लिए खुद को कुर्बान करने को तैयार हैं
अगर हजारों लोग, जिन्हें भारत अपना शहरी बताता है, किसी चरमपंथी की हत्या का दुख मनाने के लिए घरों से बाहर निकलें और आज़ादी के नारे लगाएं तो समस्या तो है। और समस्या पाकिस्तान नहीं है, यह स्थानीय विद्रोह है, उन लोगों के जरिये जिनके बच्चे इसके लिए खुद को कुर्बान करने को तैयार हैं।
कश्मीर घाटी में भारत विरोधी भावनाओं कुछ इस शिद्दत पर हैं, कि नई दिल्ली उससे परेशान हो जाती है। लेकिन अगर आप ध्यान से सुनें, तो कश्मीरी एक संघर्ष की समाप्ति चाहते हैं। वे इस समस्या का हल चाहते हैं। एक निर्भीक और साहसी राजनीतिक प्रतिष्ठान को समस्या के हल के लिए पहल करने की जरूरत है, हर किसी से बातचीत करने की जरूरत है, जिसमें हुर्रियत और पाकिस्तान दोनों शामिल हैं।
लोगों को यह संदेश देना होगा कि सरकार ऐसा करने को गंभीर है। उदाहरण के लिए जिन इलाकों में चरमपंथी गतिविधियां नहीं हों, वहां आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट की जरूरत नहीं है। किसी पत्थर फेंकने वाले को पासपोर्ट देने से इनकार करना या सरकारी नौकरी देने से इनकार करने से आप केवल उसे विद्रोही बना रहे हैं।
आप लोगों को गुमराह करके और मनोवैज्ञानिक तौर पर युद्ध लड़कर सैन्य स्थिति को तो संभाल सकते हैं, लेकिन आप महज शक को बढ़ावा दे रहे हैं। मोदी और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, इस मामले में कुछ अलग करेंगे, इसकी संभावना नहीं है।
यह अफसोस की बात होगी। 2001 के बाद से कश्मीर में जिस तरह की कार्रवाई हुई है, उसने पत्थर फेकने वालों को चरमपंथी बना दिया है। कौन इनकार कर सकता है कि मौके का फायदा उठाकर पाकिस्तान सीमा पार से चरमपंथियों को भेजकर 90 के दशक की स्थिति फिर से पैदा नहीं कर देगा?