1988 से 2019: करतारपुर कॉरिडोर और भारत-पाक रिश्ते, आसान नहीं है श्रद्धालुओं की राह
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जब भी भारत के साथ रिश्तों की बात आती है तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान करतारपुर कॉरिडोर परियोजना का जिक्र करना नहीं भूलते। हाल में बिस्केक में आयोजित एससीओ सम्मेलन के दौरान भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने करतारपुर कॉरिडोर के निर्माण पर प्रतिबद्धता दोहराई। हालांकि, उनकी कथनी और करनी में फर्क को पूरी दुनिया ने देखा है। भले ही इस परियोजना को अपनी बता कितना भी पीठ ठोक लें लेकिन इस कॉरिडोर का प्रस्ताव सबसे पहले भारत ने ही साल 1988 में रखा था।
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जब भी भारत के साथ रिश्तों की बात आती है तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान करतारपुर कॉरिडोर परियोजना का जिक्र करना नहीं भूलते। हाल में बिस्केक में आयोजित एससीओ सम्मेलन के दौरान भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने करतारपुर कॉरिडोर के निर्माण पर प्रतिबद्धता दोहराई। हालांकि, उनकी कथनी और करनी में फर्क को पूरी दुनिया ने देखा है। भले ही इस परियोजना को अपनी बता कितना भी पीठ ठोक लें लेकिन इस कॉरिडोर का प्रस्ताव सबसे पहले भारत ने ही साल 1988 में रखा था।
पाकिस्तान शुरू से ही करतारपुर कॉरिडोर के संचालन पर शर्तों का अड़ंगा लगा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, पड़ोसी देश ने भारतीय श्रद्धालुओं को विशेष परमिट से प्रवेश और फीस वसूलने की शर्त रखी है। साथ ही कॉरिडोर को सालभर खोलने और श्रद्धालुओं की तादाद पर भारत के प्रस्ताव का विरोध किया है।
अधिकारियों के मुताबिक गुरुद्वारा दरबार साहिब पर पाक ने भारत के सभी प्रस्तावों का या तो विरोध किया या फिर शर्तें लगा दी हैं। पाकिस्तान परमिट के एवज में शुल्क वसूलना चाहता है जबकि भारत ने वीजा फ्री-फीस फ्री यात्रा का प्रस्ताव रखा था।
क्या चाहता है भारत
भारत चाहता है कि 5,000 श्रद्धालु रोजाना दर्शन करें लेकिन पाक ने कहा कि 700 से ज्यादा श्रद्धालुओं को अनुमति नहीं दी जाएगी। बैसाखी, गुरुपूर्णिमा जैसे खास दिन पर भारत के 10,000 यात्रियों को प्रवेश देने के प्रस्ताव पर भी उसने अभी तक जवाब नहीं दिया है। सूत्रों ने बताया कि भारत ने सभी भारतीय नागरिक और ओआईसी कार्डधारकों को दर्शन की मांग रखी है, वहीं पाक केवल भारतीय नागरिकों को ही अनुमति देने को तैयार है।
सुरक्षा एजेंसियों की चिंता, बढ़ सकती हैं भारत विरोधी गतिविधियां
इतना ही नहीं, इस मार्ग का उपयोग नशीली दवाओं की तस्करी के लिए भी किया जा सकता है। यह बेहद दुखद लेकिन सच है कि इस महान धर्मस्थल के क्षेत्र को पाकिस्तान में खालिस्तान और आईएसआई का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां कई ब्लैकलिस्टेड खालिस्तानी आतंकियों के अड्डे आज भी सक्रिय हैं।
कॉरिडोर के पीछे छिपे पाक के 'नापाक' मंसूबे
हाल के दिनों में पंजाब में पाकिस्तान प्रायोजित 80 से ज्यादा खालिस्तानी मॉड्यूल को ध्वस्त किया गया है। खालिस्तान के नाम पर नई भर्तियां होना अब मुश्किल हैं, लेकिन इस कदम से लोगों के बीच पाकिस्तान फिर पैठ बना सकता है। चूंकि, जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद धीरे-धीरे घट रहा है, इसलिए पाकिस्तान पंजाब में आतंकवाद को पुनर्जीवित करने के लिए बेताब है।
पाकिस्तान भारत में शांति बर्दाश्त नहीं कर सकता, क्योंकि उसे लगातार कई समूहों से लड़ना पड़ रहा है, जिसमें तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और बलूचिस्तान फ्रीडम मूवमेंट (बीएफएम) शामिल हैं। हाल में ही अमृतसर में हुए धमाके के पीछे पाकिस्तान का हाथ होने संबंधी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का बयान भी इसी तरफ इशारा करता था।
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, पाकिस्तान को आशा है कि कॉरिडोर खोलने से वे खालिस्तान समर्थक समूहों के साथ अंतरराष्ट्रीय सिख समुदाय का भरोसा जीत लेंगे। उनके माध्यम से पाकिस्तान को भारतीय सिख युवाओं का भरोसा जीतने की उम्मीद है, जिन्हें वे आतंकी गुटों में भर्ती करना चाहते हैं। जो गुरुद्वारा जाएंगे, उन्हें खालिस्तान पर पाठ पढ़ाया जाएगा और भारत को चुनौती देने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
28 नवंबर 2018 को रखी गई थी नींव
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस कॉरिडोर के निर्माण की नींव 28 नवंबर 2018 को रखी थी। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने भारत से मजबूत और बेहतर रिश्ते की ख्वाहिश जाहिर की, लेकिन कश्मीर के मुद्दे पर बात करने से बाज नहीं आए। समारोह में भारत के दो केंद्रीय मंत्रियों के साथ पंजाब सरकार में मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू भी मौजूद थे। इस परियोजना का प्रस्ताव भारत ने पहली बार 1988 में पाकिस्तान के समक्ष रखा था।
इसी कार्यक्रम में सिद्धू पाक सेनाध्यक्ष बाजवा के गले मिले थे जिसको लेकर देश में राजनीति गरमा गई थी। इस मुलाकात पर उनके ही मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी नाराजगी जाहिर की थी। पाकिस्तान द्वारा लगातार आतंकियों को पनाह देने के कारण मुख्यमंत्री अमरिंदर इस कार्यक्रम में न तो शरीक हुए न ही उन्होंने सिद्धू को औपचारिक रूप से जाने की अनुमति दी।
उद्धाटन समारोह के दौरान गुरुद्वारे में 'खालिस्तान जनमत 2020' के पोस्टर लगे दिखाई दिए। हाल ही में जब भारतीय तीर्थयात्री पाकिस्तान के गुरुद्वारे में गए, तो इस्लामाबाद स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास के सदस्यों को गुरुद्वारे में प्रवेश करने से रोक दिया गया और उन्हें वापस लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्हें सुरक्षाकर्मियों ने नहीं, बल्कि कुख्यात खालिस्तान समर्थक गोपाल सिंह चावला और उसके सहयोगियों ने रोका था। चावला को हाफिज सईद और आईएसआई का करीबी माना जाता है।
करतारपुर गुरुद्वारा साहिब का क्या है महत्व
पाकिस्तान का करतारपुर साहिब सिखों के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में गिना जाता है। सिख इतिहास के अनुसार, गुरू नानक देव जी अपनी चार प्रसिद्ध यात्राओं को पूरा करने के बाद 1522 में करतारपुर साहिब में रहने के लिए आए। उन्होंने अपने जीवन के आखिरी 17 साल यहीं गुजारे और उसके बाद ज्योति में विलीन हो गए।
गुरू नानकदेव जी के माता-पिता का देहांत भी इसी जगह हुआ था। यहीं पर उन्होंने सिख धर्म की स्थापना भी की। उन्होंने खेती कर 'नाम जपो, किरत करो और वंड छको' (नाम जपें, मेहनत करें और बांटकर खाएं) का उपदेश भी पहली बार यहीं दिया था।
यहीं पर हुई थी लंगर की शुरुआत
कहा जाता है कि लंगर की शुरुआत यहीं हुई थी। इस गुरुद्वारे के अंदर एक ऐतिहासिक कुआं भी है। जिसे लेकर श्रद्धालुओं में काफी मान्यता है। कुछ लोग इसे गुरू नानकदेव जी के समय का बताते हैं। कहा जाता है कि उस समय जो भी यहां आता था वह भूखा वापस नहीं जाता था।
कहते हैं कि जब गुरु नानकदेव जी गुजर गए थे तो उनके पार्थिव शरीर की जगह कुछ फूल मिले थे। जिसमें से आधे फूल सिख ले गए और आधे मुसलमान। सिखों ने हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार, फूलों को जलाकर नानकदेव जी का अंतिम संस्कार कर दिया और मुसलमानों ने फूलों को दफनाकर। इसलिए यहां समाधि और कब्र दोनों है। समाधि गुरुद्वारे के अंदर है और कब्र बाहर है।
कहां है गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर
गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर पाकिस्तान के नारोवाल जिले में है जो लाहौर से करीब 120 किलोमीटर दूर है। ये गुरुद्वारा भारत की सीमा से करीब 3 किलोमीटर दूर है लेकिन पाकिस्तान और भारत के बीच तनाव ने इसे तीर्थयात्रियों के लिए बहुत दूर बना दिया है।
भारत सरकार ने भारतीय सीमा के नजदीक एक बड़ा टेलिस्कोप लगाया है जिसके जरिए तीर्थयात्री करतारपुर गुरुद्वारे के दर्शन करते हैं। पाकिस्तान के प्रसार मंत्री फवाद चौधरी कह चुके हैं कि, "करतारपुर सीमा को खोला जा रहा है। गुरुद्वारे तक आने के लिए अब वीजा की जरूरत नहीं होगी। वहां तक आने के लिए रास्ता बनाया जायेगा।"
"दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु टिकट खरीद कर यहां आ कर माथा टेक सकते हैं। इसी तरह का एक सिस्टम बनाने की कोशिश हो रही है।'' माना जाता है कि करतारपुर में जिस जगह गुरु नानक देव की मौत हुई थी वहां पर गुरुद्वारा बनाया गया था। सिखों और मुसलमानों दोनों धर्मों में इस स्थान की मान्यता है। ये गुरुद्वारा शकरगढ़ तहसील के कोटी पिंड में रावी नदी के पश्चिम में स्थित है।
एक अद्भुत स्थान
कहा जाता है कि गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर कुदरत का बनाया अद्भुत स्थान है। पाकिस्तान में सिखों के और भी धार्मिक स्थान हैं- डेरा साहिब लाहौर, पंजा साहिब और ननकाना साहिब उन गांव में हैं जो भारत-पाक सीमा के करीब है।
रावी नदी में आई बाढ़ के कारण गुरुद्वारे को काफी नुकसान पहुंचा था। उसके बाद 1920-1929 तक महाराजा पटियाला ने इसे फिर से बनवाया था। इस पर 1,35,600 रुपये का खर्चा आया। साल 1995 में पाकिस्तान सरकार ने इसके कुछ हिस्सों का फिर से निर्माण करवाया था। भारत-पाक के बंटवारे में ये गुरुद्वारा पाकिस्तान की तरफ चला गया था।