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हाईकोर्ट की चिंता : हिजाब विवाद को तूल देने के पीछे अदृश्य ताकतें.. मठ के आयोजनों में हिस्सा ले रहे थे मुस्लिम, फिर सब बदल गया

Wed, 16 Mar 2022 06:04 AM IST
योगेश साहू एजेंसी, बेंगलुरु/नई दिल्ली।
एजेंसी, बेंगलुरु/नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Wed, 16 Mar 2022 06:04 AM IST
सार

कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्कूल कॉलेज की तय यूनिफॉर्म का सख्ती से पालन करने और किसी तरह के धार्मिक पहनावे को स्कूल के भीतर मंजूरी नहीं देने वाले राज्य सरकार के आदेश को कायम रखा है। कर्नाटक सरकार ने अपने आदेश के पक्ष में दलील दी थी कि हिजाब इस्लाम के अंदर अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। कोर्ट ने सरकार की दलील को स्वीकार कर लिया।

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karnataka High Court s concern: Invisible forces behind the hijab controversy, Muslims were participating in the events of the monastery, then everything changed
हिजाब विवाद पर कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि हिजाब पहनना इस्लाम धर्म में अनिवार्य प्रथा नहीं है। कोर्ट ने उडुपी प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज की कुछ मुस्लिम छात्राओं की कक्षा के भीतर हिजाब पहनने की मांग वाली याचिकाएं खारिज करते हुए कहा, कक्षा में बैठने की एक आचार संहिता है, विद्यार्थियों को इसका पालन करना चाहिए। स्कूल यूनिफॉर्म तय करना तर्कपूर्ण प्रतिबंध है और सांविधानिक रूप से मान्य भी, इस पर कोई विद्यार्थी आपत्ति नहीं जता सकता।

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स्कूल-कॉलेजों को ड्रेस कोड तय करने का पूरा हक
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस ऋतुराज अवस्थी, जस्टिस कृष्ण एस दीक्षित एवं जस्टिस जेएम काजी की पीठ ने कहा, स्कूल-कॉलेजों को ड्रेस कोड तय करने का पूरा हक है। इसलिए स्कूल प्रबंधन, प्रधानाचार्य और शिक्षक के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच की अर्जी भी खारिज की जाती है। पीठ ने कहा, सरकार के पास स्कूल-कॉलेजों में समानता, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले पहनावे पर रोक लगाने का अधिकार है। ऐसे में शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक पहनावे पर रोक के आदेश को चुनौती देने वाली छात्राओं की याचिकाएं आधारहीन हैं। कोर्ट ने इसे भी खारिज कर दिया। तीन सदस्यीय पीठ ने 10 फरवरी से मामले में रोजाना सुनवाई शुरू की थी और 25 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। 
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तर्क झुठलाया नहीं जा सकता
हाईकोर्ट ने कहा, जिस तरह विवाद ने बड़ा स्वरूप लिया, यह तर्क झुठलाया नहीं जा सकता कि इसके पीछे कुछ अदृश्य ताकतें थीं। ये ताकतें सामाजिक अशांति को भड़का कर आपसी सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश कर रहीं थीं। इनके खिलाफ पुलिस जांच जल्द पूरी हो, दोषियों को उचित सजा मिले। हम निराश हैं कि शैक्षणिक सत्र के बीच अचानक  कैसे यह मुद्दा उठा।
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पीयू कॉलेज की दलीलों को देखें तो 2004 से अब तक सब ठीक था। यहां आस्था मठ संप्रदाय के आयोजनों में मुस्लिम बड़ी श्रद्धा के साथ हिस्सा भी ले रहे थे। फिर अचानक सब बदल गया और हिजाब विवाद ने तूल पकड़ लिया। हम पुलिस जांच पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे, ऐसा न हो कि उस पर कोई प्रभाव पड़े। हमने सीलबंद लिफाफे में पुलिस से मिले दस्तावेज के अध्ययन के
बाद प्रतियां लौटा दीं।

स्वायत्तता या शिक्षा का अधिकार नहीं छीनता यह फैसला
कहने की शायद ही जरूरत है कि यह फैसला महिलाओं से उनकी स्वायत्तता या शिक्षा का अधिकार नहीं छीनता, क्योंकि वे कक्षा के बाहर अपनी पसंद का कोई भी वस्त्र पहन सकती हैं। यूनिफाॅर्म का उद्देश्य ही समानता है, जो याचिका मानने पर पूरा नहीं होगा। -हाईकोर्ट

सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं छात्राएं
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता एक छात्रा सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। उसने याचिका दायर कर इसे खारिज करने की मांग की है। 

  • छात्रा निबा नाज ने याचिका में कहा, हाईकोर्ट यह गौर करने में विफल रहा कि हिजाब का हक अभिव्यक्ति के दायरे में आता है। यह संविधान के अनुच्छेद-19 (1) (ए) के तहत संरक्षित है।
  • हिंदू सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुरजीत सिंह यादव ने भी सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर की है।

बेटियों को रोकने और पीछे घसीटने की कोशिशें नाकाम हों
उम्मीद है, मुस्लिम महिलाओं को घर की चहारदीवारी में धकेलने की कोशिश हारेगी। मुस्लिम बेटियां राष्ट्र निर्माण में अहम भूमिका निभाने की क्षमता रखती हैं। मैं दिल से दुआ करता हूं कि इन बेटियों को रोकने और पीछे घसीटने की कोशिशें नाकाम हों। -आरिफ मोहम्मद खान, राज्यपाल, केरल

पापी नहीं बन जाता हिजाब प्रथा का पालन न करने वाला : हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने आदेश में कहा, ऐसा नहीं है कि हिजाब पहनने की प्रथा का पालन नहीं करने वाला पापी बन जाता है। न ही इस्लाम अपनी महिमा खो देता है और धर्म की हानि भी नहीं होती। पीठ ने कहा, अगर स्कूल की यूनिफॉर्म में ड्रेस के ही रंग के हिजाब को शामिल भी कर लिया जाए, तो लड़कियां दो श्रेणी में बंट जाएंगी। पहला हिजाब पहनने वाली और दूसरा बिना हिजाब वाली। 

जबकि यूनिफार्म का उद्देश्य ही समानता है। जो इस स्थिति में पूरा नहीं होगा। इस तरह दोनों वर्ग में एक सामाजिक अलगाव की भावना आ जाएगी जो वांछित नहीं है। इससे ही बचना है। यूनिफॉर्म की अनिवार्यता का मूल उद्देश्य ही एक ऐसा सुरक्षित स्थान देना है जहां अलगाव या बंटवारे की गुंजाइश न हो।

यूनिफॉर्म मुगल या अंग्रेज नहीं लाए, यह गुरुकुल के दिनों से
यूनिफॉर्म मुगल या अंग्रेज लेकर नहीं आए, बल्कि यह प्राचीन गुरुकुल के दिनों से अस्तित्व में है। कई प्राचीन भारतीय ग्रंथों में समवस्त्र या शुभ्रवेष का जिक्र है, इन संस्कृत शब्दों को अंग्रेजी में यूनिफॉर्म कहते हैं। -पीठ

सीएफआई की भूमिका भी पूछी
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (सीएफआई) की भूमिका पर भी प्रदेश सरकार से जानकारी तलब की। हिजाब विवाद शुरू करने वाली कुछ छात्राएं इस संगठन से जुड़ीं थीं। सीएफआई हिजाब पर सरकार के आदेश के खिलाफ माहौल बना रहा था और प्रदर्शन आयोजित कर रहा था। यही नहीं कुछ शिक्षकों को सीएफआई की तरफ से धमकी भी मिली थी और इसके कार्यकर्ताओं के खिलाफ एक एफआईआर भी दर्ज की गई थी।

बाहर कुछ भी पहनें, कक्षा की एक आचार संहिता होती है : रेखा शर्मा
फैसला स्वागतयोग्य। हिजाब किसी धार्मिक प्रथा का हिस्सा नहीं है। मैं भी महिलाओं के हक की बात करती हूं, वे बाहर जो चाहें पहनें, लेकिन कक्षा या शैक्षणिक संस्था की आचार संहिता जरूरी है। वहां यूनिफार्म का सम्मान और पालन होना चाहिए। विद्यार्थियों को धर्म, जाति और पंथ के आधार पर नहीं बांटा जा सकता। - रेखा शर्मा, अध्यक्ष, महिला आयोग

संविधान और समाज के हिसाब से सही फैसला
हिजाब को लेकर जो हंगामा था वह इसलिए था कि कैसे मुस्लिम लड़कियों को औपचारिक शिक्षा से दूर रखें और तालिबानी सोच के साथ झोंक दें। कोर्ट का निर्णय भारत के संविधान और समाज के हिसाब से बिल्कुल ठीक है। - मुख्तार अब्बास नकवी, केंद्रीय मंत्री

कई जिलों में धारा 144 लागू बेंगलुरु में आयोजनों पर रोक

  • हिजाब पर फैसले के मद्देनजर कर्नाटक में उडुपी, शिवमोगा और कलबुर्गी समेत कई जिलों में धारा 144 लगाई गई है।
  • राजधानी बेंगलुरु में 21 मार्च तक सभी तरह की सार्वजनिक सभाओं, उत्सव और प्रदर्शनों पर रोक लगा दी गई। स्कूल कॉलेज भी मंगलवार को बंद रखे गए।

छात्राएं बोलीं-हिजाब के बिना कॉलेज नहीं जाएंगे, कानूनी लड़ाई जारी रहेगी
उडुपी की मुस्लिम छात्राएं कोर्ट के आदेश के बाद भी अपनी जिद पर अड़ी हैं। मंगलवार को मुस्लिम छात्राओं ने प्रेस काॅन्फ्रेंस कर कहा, बिना हिजाब के वे कॉलेज नहीं जाएंगी। कानूनी लड़ाई तब तक जारी रखेंगी जब तक इंसाफ नहीं होता। देश का संविधान हमें हमारे धर्म को अपनाने की आजादी देता है और जो चाहें उसे पहनने का अधिकार भी।

यूं फैला विवाद

  • हिजाब विवाद ने जनवरी में तब बड़ा रूप लिया जब उडुपी पीयू कॉलेज की छह छात्राओं को हिजाब पहनकर कक्षा में बैठने देने से मना कर दिया गया। छात्राओं ने इसके खिलाफ प्रदर्शन किया।
  • इसके बाद उडुपी के अन्य कॉलेजों में छात्रों ने गले में भगवा मफलर डालकर कॉलेज पहुंचना शुरू कर दिया। देखते देखते यह विवाद पूरे कर्नाटक में फैल गया और जगह जगह प्रदर्शन होने लगे।
  • इसके बाद कर्नाटक सरकार ने कहा, सभी के लिए स्कूल यूनिफार्म का पालन अनिवार्य है और हिजाब, भगवा मफलर व अन्य किसी तरह के धार्मिक पहनावे पर रोक लगा दी।

मुस्लिम लीग और केरल मुस्लिम जमात ने बताया दुर्भाग्यपूर्ण
मुस्लिम लीग और केरल मुस्लिम जमात के नेताओं ने इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। मुस्लिम लीग के प्रदेश महासचिव पीएमए सलाम ने कहा, यह आदेश कानून में विश्वास रखने वालों और इंसाफ के लिए कोर्ट का रुख करने वालों को निराश करेगा।

  • केरल मुस्लिम जमात के महासचिव सैय्यद इब्राहिम खलील अल बुखारी ने कहा, यह कह देना कि हिजाब इस्लाम का अंग नहीं सरासर गलत है। हाईकोर्ट के फैसले की जांच होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी चाहिए।

धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है यह फैसला: ओवैसी
कोर्ट ने अनुच्छेद 15 की अनदेखी की है। इसका मुस्लिम महिलाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यह धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। आधुनिकता अपनी धार्मिक प्रथाओं को खत्म करना नहीं है। अगर कोई हिजाब पहनता है तो इसमें क्या मुश्किल है। - असदुद्दीन ओवैसी, एआईएमआईएम प्रमुख

पहनावा चुनने का अधिकार छीना: महबूबा
एक और महिलाओं को सशक्त बनाने का दावा किया जाता है और वहीं दूसरी ओर एक साधारण सी चीज, पहनावा चुनने का अधिकार छीन लिया जाता है। - महबूबा मुफ्ती, पूर्व सीएम, जम्मू कश्मीर

इस्लाम में हिजाब जरूरी, कोर्ट का फैसला नामंजूर : दारुल उलूम
दारुल उलूम ने फैसले पर नाराजगी जताई है। संस्था के मोहतमिम मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने कहा, पर्दा इस्लाम में जरूरी है। यह फैसला कबूल करने लायक नहीं है।

  • बरेलवी मसलक के उलमा ने फैसले पर निराशा जताई है। दरगाह आला हजरत की ओर से कहा गया है कि पैगंबर के वक्त से हिजाब इस्लाम में अहम पाबंदी रही है। आदेश ने किसी लड़की के पहनावा चुनने का अधिकार खत्म कर दिया है।
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