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Commercial Disputes: निचली अदालत ने ऐसे फैसलों पर विचार किया जो हुए ही नहीं; कर्नाटक हाईकोर्ट ने रोकी कार्रवाई

Thu, 30 Jan 2025 01:54 AM IST
दीपक कुमार शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बंगलूरू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बंगलूरू Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Thu, 30 Jan 2025 01:54 AM IST
सार

कर्नाटक हाईकोर्ट ने 5 फरवरी को अगली सुनवाई तक ट्रायल कोर्ट की आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। आगामी कार्यवाही से एआई-जनरेटेड कानूनी शोध पर न्यायिक निर्भरता और मामले के फैसलों पर इसके प्रभाव की स्पष्टता मिलने की उम्मीद है।
 

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Karnataka High Court reviews trial court’s use of non-existent judgments in commercial dispute case
कर्नाटक उच्च न्यायालय - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

कर्नाटक हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक याचिका पर सुनवाई की, जिसमें एक ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। इस आदेश में कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के ऐसे निर्णयों का हवाला देते हुए वादपत्र की वापसी के लिए आवेदन को खारिज कर दिया गया था, जो असल में मौजूद नहीं हैं या ऐसे फैसले हुए ही नहीं (non-existent judgments)। 

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हाईकोर्ट ने 5 फरवरी को अगली सुनवाई तक ट्रायल कोर्ट की आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। आगामी कार्यवाही से एआई-जनरेटेड कानूनी शोध पर न्यायिक निर्भरता और मामले के फैसलों पर इसके प्रभाव की स्पष्टता मिलने की उम्मीद है।
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सम्मान कैपिटल लिमिटेड द्वारा दायर की गई याचिका
यह याचिका गैर-बैंकिंग वित्त कंपनी सम्मान कैपिटल लिमिटेड द्वारा दायर की गई थी, जिसमें ट्रायल कोर्ट के 25 नवंबर, 2024 के आदेश को चुनौती दी गई थी। यह मामला मंत्री इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े वाणिज्यिक विवाद और कर्ज का कथित भुगतान न करने से संबंधित है।
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सम्मान कैपिटल के वरिष्ठ वकील ने ये दिया तर्क
सम्मान कैपिटल का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ वकील प्रभुलिंग के नवदगी ने न्यायमूर्ति आर देवदास के सामने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने ऐसे निर्णयों का संदर्भ दिया है, जो वास्तविकता में हैं ही नहीं। उन्होंने कहा कि आदेश मनगढ़ंत केस उद्धरणों पर आधारित है। उन्होंने कहा, 'यदि ऐसे गैर-मौजूद निर्णयों पर भरोसा किया जाता है, तो यह बेहद चिंताजनक है। कभी-कभी एआई-जनरेटेड शोध गलत निष्कर्ष देते हैं।'

इन संदर्भों पर आधारित था ट्रायल कोर्ट का आदेश
ट्रायल कोर्ट का विवादास्पद आदेश मेसर्स जालान ट्रेडिंग कंपनी, प्राइवेट लिमिटेड बनाम मिलेनियम टेलीकॉम लिमिटेड, मेसर्स क्वॉलरनर सीमेंटेशन इंडिया लिमिटेड बनाम मेसर्स अचिल बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड, और मेसर्स एसके गोपाल बनाम मेसर्स यूएनआई डेरीटेंड लिमिटेड के संदर्भ पर आधारित था। 

याचिकाकर्ताओं का दावा है कि ये निर्णय मौजूद नहीं हैं और इन्हें सुनवाई के दौरान किसी भी पक्ष द्वारा साक्ष्य के रूप में पेश नहीं किया गया, जिससे ट्रायल कोर्ट की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठते हैं।

मंत्री इंफ्रास्ट्रक्चर द्वारा ऋण का भुगतान न करने से उत्पन्न हुआ मामला
यह मामला मंत्री इंफ्रास्ट्रक्चर द्वारा ऋण का भुगतान न करने के कारण उत्पन्न हुआ। वादी ने पहले एक वाणिज्यिक मुकदमा दायर किया था, लेकिन बाद में बिना अनुमति के इसे वापस ले लिया। इसके बाद, उन्होंने सिविल अधिकार क्षेत्र के तहत एक नया मुकदमा दायर किया, जिसमें SARFAESI और NCLT कार्यवाही के खिलाफ निषेधाज्ञा मांगी गई, और यह घोषणा की गई कि उनके ऋण का भुगतान कर दिया गया है। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने वाद वापस करने की मांग को खारिज कर दिया, और अब इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। 

कानूनी पेशेवरों के बीच एआई जोखिमों के बारे में चर्चा शुरू
इस मामले ने कानूनी पेशेवरों के बीच अदालती कार्यवाही में असत्यापित एआई-जनित शोध के जोखिमों के बारे में चर्चा शुरू कर दी है। सुप्रीम कोर्ट के वकील वामशी पोलसानी ने एआई निर्भरता की आलोचना करते हुए कहा, 'एक वकील का विश्लेषण और तर्क तैयार करना सॉफ्टवेयर को नहीं सौंपा जा सकता।'

वकील विश्वजा राव ने भी इसी तरह की चिंताओं को दोहराया, उन्होंने कहा, 'एआई का उपयोग कानूनी कार्य को बेहतर बनाने के लिए किया जाना चाहिए, न कि सटीकता के लिए शॉर्टकट।' 


तेलंगाना हाईकोर्ट ने एआई की उपयोगिता स्वीकारी
तेलंगाना हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश चल्ला कोडंडा राम ने एआई की उपयोगिता को स्वीकार किया, लेकिन चेतावनी दी 'एआई अक्सर कानूनी सिद्धांतों को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं करता है, लेकिन उद्धरणों को मिला सकता है। यदि सिद्धांत सही है, तो उद्धरण त्रुटि से परिणाम प्रभावित नहीं होना चाहिए।'

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