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Karnataka: दुर्घटना में मां-बाप की मौत के बाद मुआवजे में विवाहित बेटियों का भी हक, हाईकोर्ट ने की टिप्पणी
Thu, 11 Aug 2022 09:47 PM IST
शिव शरण शुक्ला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बेंगलुरु
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बेंगलुरु
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Thu, 11 Aug 2022 09:47 PM IST
सार
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि अगर किसी दुर्घटना में मां-पिता की मौत हो जाती है तो उसके बाद मिलने वाले मुआवजे की राशि में मृतक की विवाहित बेटियों को भी हिस्सेदारी मिलेगी। अदालत ने मामले में निर्भरता की भी व्याख्या की।
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कोर्ट ने सुनाया फैसला
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
कर्नाटक हाईकोर्ट ने गुरुवार को कहा है कि किसी दुर्घटना में अगर माता-पिता की मौत हो जाती है तो इंश्योरेंस कंपनियों से मिलने वाले मुआवजे में विवाहित बेटियों का भी हिस्सा है। अदालत ने कहा कि इसमें किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता। ये फैसला सुनाते समय अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का भी हवाला दिया।
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कर्नाटक हाईकोर्ट की बेंच ने ये टिप्पणी बीमा कंपनी की ओर से दाखिल की गई एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दी। बीमा कंपनी ने ये याचिका साल 2012 में हुई एक दुर्घटना के मामले में दाखिल की थी। गौरतलब है कि 12 अप्रैल 2012 में हुब्बाली स्थित यामानुर के करीब एक गाड़ी हादसे का शिकार हो गई थी। उस हादसे में 57 साल की रेणुका की मौत हो गई थी। जिसके बाद बीमा कंपनी से रेणुका के पति उनकी तीन बेटियों और एक बेटे ने मुआवजे की मांग की थी।
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इस मामले में मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण ने बीमा कंपनी को पीड़ित परिजनों को छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 5,91,600 का मुआवजा देने का आदेश दिया था। इसके बाद बीमा कंपनी ने कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उसने हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल करके कहा था कि विवाहित बेटियां मुआवजे का दावा नहीं कर सकती हैं, और यह भी कि वे मृतक पर आश्रित नहीं हैं, इसलिए 'निर्भरता की हानि' मद के तहत भी मुआवजा देना गलत निर्णय है। बीमाकंपनी ने यह भी कहा था कि केवल संपत्ति के नुकसान के तहत ही मुआवजा दिए जाने का प्रावधान था।
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बीमा कंपनी की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि निर्भरता से आशय केवल आर्थिक रूप से निर्भर होना ही नहीं होता है। निर्भरता में सेवा निर्भरता, शारीरिक निर्भरता और मनोवैज्ञानिक निर्भरता भी शामिल होती है। जिसे रुपयों से तौला नहीं जा सकता। इस टिप्पणी के साथ ही कर्नाटक हाईकोर्ट ने बीमाकंपनी द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया।