कर्नाटक में सत्ता की चाबी जेडीएस, सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के खिलाफ कांग्रेस का बड़ा दांव
कर्नाटक विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। हालांकि भाजपा 104 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी लेकिन वह बहुमत के लिए जरूरी 113 सीटों के जादुई आंकड़े को पार नहीं कर पाई। दूसरी तरफ, कांग्रेस को 78 सीटों पर संतोष करना पड़ा, जबकि जदएस अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराने में कामयाब रही। उधर, नतीजे आने के बाद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस्तीफा दे दिया है।
किसी दल के पास बहुमत का आंकड़ा नहीं होने के कारण गेंद अब राज्यपाल वज्जू भाई बाला के पाले में है। भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा ने केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार के साथ राज्यपाल से भेंट की और सरकार बनाने का दावा पेश किया और उनसे विधानसभा में बहुमत साबित करने का मौका देने का आग्रह किया। येदियुरप्पा ने कहा कि कांग्रेस पिछले दरवाजे से सत्ता हासिल करना चाहती है, जबकि जनादेश कांग्रेस मुक्त कर्नाटक का है।
दूसरी तरफ, तेजी से बदलते घटनाक्रम में कांग्रेस ने गोवा और मणिपुर की गलतियों से सबक लेते हुए जदएस को समर्थन देने की घोषणा कर दी। उसके बाद जदएस नेता एचडी कुमारस्वामी ने राज्यपाल से भेंटकर सरकार बनाने का दावा पेश किया। उन्होंने अपने समर्थन में कांग्रेस द्वारा भेजा गया पत्र भी पेश किया।
ये है परंपरा
स्थापित परंपरा के मुताबिक त्रिशंकु विधानसभा की सूरत में राज्यपाल सबसे बड़े दल या चुनाव पूर्व गठबंधन को सरकार बनाने का न्यौता देते हैं और सदन में बहुमत साबित करने का मौका देते हैं। चूंकि कांग्रेस और जदएस का चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं था, लिहाजा यह राज्यपाल पर है कि वे किसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं। भाजपा के तीन केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, प्रकाश जावडेकर और जेपी नड्डा पार्टी के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए जमे हुए हैं।
बसपा का खाता खुला
राज्यपाल के पास कांग्रेस-जदएस गठबंधन को सरकार बनाने का न्यौता देने के अलावा कोई चारा नहीं है। हमारे पास संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों के अनुसार स्पष्ट बहुमत है।
- रणदीप सिंह सुरजेवाला, कांग्रेस प्रवक्ता
कांग्रेस पिछले दरवाजे से सत्ता हासिल करना चाहती है, जबकि जनादेश कांग्रेस मुक्त कर्नाटक का है।
- बीएस येदियुरप्पा, भाजपा के पूर्व सीएम
ये हैं विकल्प
भाजपा: इस बात की पूरी संभावना है कि राज्यपाल सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को न्यौता देंगे। सदन में बहुमत साबित करने के लिए वह दो निर्दल और बसपा के एक विधायक को अपने पाले में ला सकती है। इसके अलावा कांग्रेस या जदएस के कुछ विधायकों से इस्तीफा दिलवा सकती है। इससे बहुमत का आंकड़ा घट जाएगा, जिसे पार करना उसके लिए आसान हो जाएगा।
कांग्रेस: चुनाव बाद जदएस से गठबंधन करने के कारण कांग्रेस के इस मोर्चे को न्यौता मिलने की उम्मीद कम। अगर भाजपा बहुमत साबित नहीं कर पाती है तो राज्यपाल इस मोर्चे को आमंत्रित कर सकते हैं, लेकिन इसकी संभावना कम है।
मोदी का जादू कायम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्मोहक व्यक्तित्व और उससे पैदा होने वाली प्रलयकारी ताकत के आगे कांग्रेस बेबस है। इस चुनाव में तूफानी दौरा कर मोदी ने अकेले दम पर अपनी पार्टी को दक्षिण में फिर प्रवेश दिलाया।
शाह का तोड़ नहीं
मोदी के अलावा अगर भाजपा में किसी के सिर पर इस जीत का सेहरा बंधना चाहिए तो वे हैं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह। चुनाव प्रबंधन में इस समय उनका कोई सानी नहीं है। उनकी अथाह ऊर्जा और अनथक प्रयास बेमिसाल हैं।
राहुल की राह में रोड़े
गुजरात के बाद कर्नाटक में भी उनका ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ बुरी तरह फेल हुआ। मठों और मंदिरों में मत्था टेकना काम नहीं आया। उदासीन राजनेता की छवि तोड़ी लेकिन मोदी के करिश्मा को तोड़ने के लिए उनके तरकश में कोई तीर नहीं है।
कांग्रेस को फंड का टोटा
देश के तमाम राज्यों से सफाया होने के बाद कांग्रेस के पास कर्नाटक ही एक ऐसा राज्य बचा था, जहां से पार्टी का खर्च पूरा होता था। इस राज्य को खोने का मतलब साफ है कि भविष्य में पार्टी को फंड की भारी कमी होने वाली है।
लिंगायत कार्ड नहीं चला
कांग्रेस द्वारा लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने का दाव उल्टा पड़ा। भाजपा जनता को यह समझाने में सफल रही कि कांग्रेस के पास ‘बांटो और राज करो’ के अलावा चुनाव जीतने की कोई दूसरी रणनीति नहीं है।