कर्नाटक में सांप्रदायिकता फैलाने का लोगों ने लगाया आरोप, कांग्रेस-भाजपा से अलग तीसरे विकल्प की तलाश
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कर्नाटक चुनाव में बस कुछ दिन ही बाकी है। ऐसे में कई स्थानीय मुद्दों पर लोगों की अलग-अलग राय सामने आ रही है। मंगलूरू में लोगों के लिए पानी एक बड़ी समस्या है, जिस पर लोग इस बार वोट देने जा रहे हैं। फजल नाम के एक स्थानीय का कहना है कि सिद्धारमैया सरकार इस समस्या पर पूरी तरह से नाकाम हुई है। सिद्धारमैया ने यहां लोगों को सांप्रदायिक तौर पर बांटने का काम किया है।
वहीं कुछ लोगों का यहां तक कहना है कि सभी पार्टियां हिंदू-मस्लिम भावनाएं भड़काने की कोशिश में लगी हैं। हम नहीं चाहते कि यहां लोगों के बीच कोई भी पार्टी अपना हित साधे और लोगों के बीच किसी तरह की कड़ुआहट पैदा हो। भाजपा से अलग लोगों को तीसरे विकल्प की तलाश है।
Neither BJP nor Congress can do good for Muslims here, we want change, we want a third option. Everything is good between Hindus and Muslims here and we don't want a party that negatively affects this to come to power: Local from Mangalore #KarnatakaElection2018 pic.twitter.com/lp4zLE7qdG
— ANI (@ANI) April 28, 2018
वहीं मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का लिंगायत को अल्पसंख्यक का दर्जा देने का फैसला कर्नाटक चुनाव का नतीजा प्रभावित कर सकता है। कर्नाटक में 17 फीसदी आबादी वाले लिंगायत राज्य का सबसे बड़ा वोट बैंक है। कर्नाटक में अधिकतर उसी पार्टी की सरकार बनती है, जिसके पक्ष में लिंगायत होते हैं। इसलिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तक सभी लिंगायत धर्मगुरुओं के चक्कर काट रहे हैं ताकि यह समुदाय उन्हें एकमुश्त वोट दे।
सिद्धारमैया ने लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता दी है, वीरशैव को नहीं। इससे वीरशैव नाराज हैं और सिद्धारमैया पर हिंदू धर्म को बांटने का आरोप लगा रहा है। लेकिन लिंगायत किसी हद तक खुश हैं। वे अपने को वैसे ही अलग धर्म मानते हैं जैसे जैन, बौद्ध या सिख।
यही वजह है बीएस येद्दियुरप्पा ने मुख्यमंत्री रहते हुए लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता देने की सिफारिश की थी। हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने उसे खारिज कर दिया था लेकिन इस बार दोनों दलों ने अपने रुख बदल लिए हैं। लिंगायत किसका रुख पसंद कर रहे हैं, यह 12 मई को मतदान से ही पता चलेगा।