कारगिल जंग: स्नो सूट का ठेका पाक के हाथ में जाने पर आयुध कारखानों ने संभाला मोर्चा, अब उनके अस्तित्व का संकट
1999 में हुई कारगिल जंग के दौरान देश के आयुध कारखानों ने हर मोर्चे पर बड़ी भूमिका निभाई थी। यहां तक की स्नो सूट की सप्लाई का ठेका निजी कंपनी के जरिए पाकिस्तानी कंपनी को चला गया था। तब जिन आयुध कारखानों ने मोर्चा संभाला था अब उनके अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है।
विस्तार
देश के 41 आयुध कारखाने 220 साल से भारतीय सेना के लिए गोला बारूद, टैंक, हल्के हथियार, पैराशूट व लड़ाई में काम आने वाले उपकरण तैयार कर रहे हैं। इन्हीं कारखानों ने भारतीय सेना को पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध, बांग्लादेश लिबरेशन वॉर, कारगिल की लड़ाई और लद्दाख जैसी झड़पों में साजो-सामान सप्लाई किया था। आज इनके अस्तित्व पर संकट आ गया है।
अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ के महासचिव सी.श्रीकुमार कहते हैं, केंद्र सरकार ने इन कारखानों को सात कंपनियों में तब्दील करने से पहले यह नहीं सोचा कि ये वही कारखाने हैं, जिन्होंने विपरीत समय में सरकार का साथ दिया है। सरकार ने इन्हें निगम यानी कंपनी बना दिया है। कुछ दिन बाद ये कारखाने प्राइवेट हाथों में चले जाएंगे। ये भी हो सकता है कि सरकार कह दे, घाटे में होने के कारण इन्हें बंद किया जा रहा है।
200 साल पुराने कारखाने ने सप्लाई किए थे स्नो सूट
श्रीकुमार ने कहा कि सरकार को याद नहीं है कि कारगिल की लड़ाई में स्नो सूट का टेंडर एक निजी कंपनी को दे दिया गया। बाद में पता चला कि वहां से सूट बनाने का काम पाकिस्तान की कंपनी को मिल गया है। लड़ाई भी पाकिस्तान के साथ चल रही थी। माल की सप्लाई जब तय समय पर पूरी नहीं हो सकी, तब 220 साल पुराने आयुध कारखानों ने ही वह सप्लाई पूरी की थी।
केंद्र सरकार ने 16 जून को किया निजीकरण का निर्णय, विरोध में 26 से हड़ताल
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 16 जून को हुई बैठक में देश के सभी 41 आयुध कारखानों को सात कंपनियों में विभाजित कर दिया गया था। कर्मचारी संगठन एआईडीईएफ, आईएनडीडब्लूएफ, बीपीएमएस, एनपीडीईएफ और एआईबीडीईएफ ने मिलकर केंद्र सरकार को 241 कारखानों में 26 जुलाई से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का नोटिस दे दिया है।
कोर्ट जाएंगे कर्मचारी संगठन
अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ के महासचिव सी.श्रीकुमार ने बताया, सरकार के के निर्णय के खिलाफ कर्मचारी संगठन कोर्ट में जा रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों का समर्थन लिया जा रहा है। सीपीआई, कांग्रेस पार्टी, डीएमके और एनसीपी सहित दूसरे राजनीतिक दलों से बातचीत हो रही है। जल्द ही राहुल गांधी और शरद पवार इस मामले में बयान जारी कर सकते हैं। सरकार को इन कारखानों की अहमियत मालूम है, लेकिन इसके बावजूद वह इन्हें निजी हाथों में सौंपना चाहती है।
इसलिए इनका सरकारी बने रहना जरूरी
बकौल श्रीकुमार, 41 आयुध कारखानों का सरकारी क्षेत्र में रहना इसलिए जरुरी है, क्योंकि ये देश की रक्षा से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने इस बाबत दो तीन उदाहरण बताए हैं। श्रीकुमार ने कहा, भारत पाकिस्तान की लड़ाई में पेट्रोल सप्लाई की जिम्मेदारी प्राइवेट कंपनियों के हाथों में थी। बर्मा शेल के अलावा एक अन्य मल्टी नेशनल कंपनी थी। इन्होंने पाकिस्तान को पेट्रोल की सप्लाई तो की, मगर भारत के लिए परेशानी खड़ी कर दी। उस वक्त केंद्र सरकार की नींद टूटी थी। उसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां बनाई गईं।
कारगिल की लड़ाई में माइनस 47 डिग्री तापमान में पहने जाने वाले स्नो सूट की सप्लाई का जब एक प्राइवेट कंपनी को टेंडर मिला तो मालूम चला कि सूट बनाने का काम पाकिस्तान की कंपनी के पास चला गया है। इसके बाद यह ऑर्डर तय समय पर पूरा नहीं हो सका। पाकिस्तान के साथ लड़ाई चल रही थी। उस वक्त आयुध कारखानों ने ही वह ऑर्डर पूरा किया था।
62 हजार एकड़ जमीन, मूल्य दो लाख करोड़ रुपये
केंद्र सरकार लंबे समय से इन कारखानों पर नजर रखे हुए थी। इस मामले में सलाह देने के लिए केपीएमजी को सलाहकार भी नियुक्त कर दिया गया। कारखानों के पास 62 हजार एकड़ जमीन है। इसका बाजार मूल्य दो लाख करोड़ रुपये है, जबकि सरकार के सलाहकार ने इसका दाम 72 हजार करोड़ रुपये लगाया था।
केंद्र की मंशा है कि इन कारखानों की जमीन को उद्योगपतियों के हवाले कर दिया जाए। 26 जुलाई से होने वाली हड़ताल में 71 हजार कर्मचारी शामिल होंगे। कारखानों के अलावा ट्रेनिंग सेंटर, अस्पताल और स्कूल भी इस हड़ताल में शामिल रहेंगे। गत वर्ष कारखाना कर्मचारी संगठनों ने केंद्र सरकार के समक्ष अपना विरोध दर्ज करा दिया था।
इन कारखानों को निगम न बनाने की एवज में डिफेंस सेक्रेटरी को कई तरह के प्रपोजल दिए गए थे, लेकिन सरकार को कोई पसंद नहीं आया। वजह, केंद्र सरकार इन कारखानों को निजी हाथों में देने का मन बना चुकी है। कर्मचारी नेताओं का कहना है कि इस बाबत लंबी लड़ाई लड़ी जाएगी।