आज कारगिल विजय दिवस है यानि ऐसा दिन जब देश का हर नागरिक भारतीय होने पर गर्व महसूस करता है। 3 मई 1999 को शुरू होने वाला कारगिल युद्ध आज ही दिन यानि 26 जुलाई 1999 को समाप्त हुआ था। इस युद्ध में हमारी बहादुर सेना ने पाकिस्तान को आर्थिक और राजनैतिक स्तर पर जबरदस्त हानी पहुंचाई थी। आज इस खास अवसर पर हम आपको ऐसे युद्धों के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने भारतीय सेना के इतिहास को एक नए मुकाम तक पहुंचाया दिया। इन लड़ाइयों ने ही भारतीय सेना के इतिहास को सजाया है। यह वो लड़ाइयां हैं जो भारत ने चीन और पाकिस्तान के साथ की हैं।
कारगिल विजय दिवस स्पेशल: चार बार पाकिस्तान को धूल चटा चुके हैं हमारे भारतीय सैनिक
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1947- पाकिस्तानी कबाइलियों से लड़ा गया युद्ध
कश्मीर घाटी में पाकिस्तान के कबाइलियों ने काफी समय से उत्पात मचाया हुआ था। लेकिन उनकी तरफ से सबसे बड़ा हमला 23 अक्तूबर 1947 को हुआ। यह हमला मुजफ्फराबाद की ओर से किया गया था। इस हमले में पूरा मुजफ्फराबाद तहस नहस हो गया। इसका एक कारण था वहां राज्य पुलिस का कम संख्या में होना और दूसरा कारण पुंछ के लोगों का हमलावरों के साथ शामिल होना था। मुजफ्फराबाद को तबाह करने के बाद इन कबाइलियों ने अपना अगला निशाना उड़ी और बारामूला को बनाया। इसके बाद उड़ी में उसी दिन सेना और कबाइलियों के बीच युद्ध हुआ।
सेना ने कबाइलियों को रोकने के लिए उसी पुल को ध्वस्त कर दिया जहां से हमलावर गुजरने वाले थे। यह पुल ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह के नेतृत्व में ध्वस्त किया था। बाद में ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह एक हमलावर की गोली लगने से शहीद हो गए। लेकिन उन्होंने किसी भी हालत में इन हमलावरों को आगे नहीं बढ़ने दिया। उन्होंने उड़ी और बारामूला को बर्बाद होने से बचा लिया। जम्मू कश्मीर में इन कबाइलियों का सामना करने के लिए भारतीय सेना विमान और सड़क मार्ग से पहुंच गई। अंत में इन्हें मुंह की खानी पड़ी।
1965- पाकिस्तान से साथ लड़ा गया युद्ध
साल 1965 के घातक युद्ध को आज तक कोई भुला नहीं सका है। यह युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था। इसके पीछे का कारण कश्मीर नहीं बल्कि गुजरात में मौजूद कच्छ के रण की सीमा था। इस सीमा मेें पाकिस्तान ने 1965 में दखल देना शुरू कर दिया और हद तो तब हो गई जब यहां एक कच्ची सड़क बनाई गई। फिर 5 अगस्त 1965 को भारत के 26,000 जवानों ने लाइन ऑफ कंट्रोल को पार किया। उस वक्त पाकिस्तान ने कश्मीर के उड़ी और पुंछ जैसे इलाकों को अपने कब्जे में ले रखा था। भारत ने भी पाकिस्तान को शिकस्त पहुंचाने के लिए पीओके से करीब 8 किमी की दूरी पर स्थित हाजी पीर पास को अपने कब्जे में ले लिया।
वहीं पाकिस्तान द्वारा चलाया गया ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम भी बुरी तरह से फेल रहा। अपने ऊपर लगातार होते हमलों से खफा हो पाकिस्तान ने कश्मीर के साथ साथ पंजाब को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया। लेकिन इस बार भी पाक को हार नसीब हुई। भारत की ओर से ही 6 सितंबर को युद्ध की घोषणा की गई। करीब 17 दिनों तक चलने वाले इस युद्ध की समाप्ति 23 सितंबर 1965 को हुई। भारत ने दोनों बार पाकिस्तान को करारी हार दी।
1967- चीन के साथ लड़ा गया युद्ध
साल 1967 में हुए इस युद्ध में भारतीय जवानों ने अद्भुत शक्ति का प्रदर्शन किया और सौंकड़ों चीनी सैनिकों को मार गिराया। जवानों ने चीनी सैनिकों के बंकरों को भी बुरी तरह ध्वस्त कर दिया। यह लड़ाई 14,200 फीट ऊंचे नाथुला दर्रे पर लड़ी गई। बता दें यह दर्रा तिब्बत-सिक्किम सीमा पर है। यहीं से पुराना गंगतोक-यातंक-ल्हासा व्यापार मार्ग गुजरता है। 1967 में चल रहे इस बड़े युद्ध में भारत की दो ग्रेनेडियर्स बटालियन के जिम्मे नाथुला की सुरक्षा आ गई थी। इस बटालियन की कमान उस वक्त लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह ने संभाली।
1971- पाकिस्तान के साथ युद्ध
भारत और पाकिस्तान के बीच हुए इस युद्ध में पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा और पूर्वी पाकिस्तान ने आजाद होकर बांग्लादेश का रूप ले लिया। इस युद्ध की जीत के बाद भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया। उनकी इच्छा शक्ति और सेना के पराक्रम के कारण ही बांग्लादेश की आजादी संभव हो पाई। इस युद्ध में पाकिस्तान की नासमझी ही उसकी हार की वजह बनी।
इस युद्ध में रूस ने भारत का साथ दिया। भारत ने इस युद्ध से पहले रूस के साथ एक समझौता किया था। साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश की रिफ्यूजी समस्याओं को भी उठाया। पाकिस्तान को लग रहा था कि उसकी मदद के लिए अमेरिका और चीन आगे आएंगे। अमेरिका पाकिस्तान की मदद के लिए आगे भी आया और हिंद महासागर में सेवंथ फ्लीट बेड़ा भी भेजा। लेकिन भारत ने भी तो रूस से समझौता किया था। तो रूस ने भारत की मदद के लिए अपनी न्यूक्लियर सब मरीन भेज दी।
इसके बाद भारत ने पूर्वी पाकिस्तान में युद्ध करके तीन दिनों के भीतर की एयर फोर्स और नेवल विंग को खत्म कर दिया। इसी वजह से भारत पूर्वी पाकिस्तान की राजधानी ढाका तक पहुंचने में कमियाब हो गया। इस बात का पता पाकिस्तान के जनरल एएके नियाजी को दो दिनों बाद चला। उन्हें लग रहा था कि भारतीय जवान सीमा पर ही उलझे रहेंगे और नदियों को पार कर ढाका तक नहीं पहुंच पाएंगे लेकिन वह गलत साबित हुए। भारतीय जवान पैराट्रूपर्स की मदद से ढाका को घेरने में कामियाब हो गए। फिर भारतीय सेना मुक्ति वाहिनी की मदद से पूर्वी पाकिस्तान की सीमा को पार करने में कामियाब हो गई।