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कारगिल विजय दिवस: अमर शहीद कैप्टन शशिकांत शर्मा की मां बोलीं, बेटे पर नाज है
अमित शर्मा, नई दिल्ली
Updated Wed, 25 Jul 2018 09:39 PM IST
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Shashikant Sharma Mother
अमर शहीद कैप्टन शशिकांत शर्मा उन चंद खुशकिस्मत लोगों में शामिल हैं जिन्हें कारगिल युद्ध में भाग लेने और देश के लिए अपनी जान देने का मौका मिला था। 5 अक्टूबर 1998 को हुई शशिकांत शर्मा की शहादत को यूं तो लगभग 20 साल हो चुके हैं लेकिन आज भी उनका शहर नोएडा उन्हें भूला नहीं है। कारगिल विजय दिवस 26 जुलाई के करीब आने पर तो उनकी वीरता की कहानियों की खुशबू से उनके शहर की हवा महकने लगती है।
ये शहादत सबको नसीब नहीं होती
शहीद कैप्टन शशिकांत शर्मा (सेना मेडल, वीरता पदक, अति वीरता पदक) के पिता फ्लाइट लेफ्टिनेंट जोगिंदर पाल शर्मा (रिटायर्ड) कहते हैं कि देश की सेवा करने का मौका तो उन्हें भी खूब मिला। उन्होंने 1962 में चीन के साथ लड़ाई, 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाई में हिस्सा लिया और अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाया। लेकिन आज उनका शहर उन्हें उनके नाम से नहीं, बल्कि शहीद बेटे कैप्टन शशिकांत शर्मा के पिता के नाम से जानता है। पिता की आंखें यह कहते हुए भर आईं कि उनका बेटा किस्मत वाला था, उनसे बहुत आगे निकल गया। फ्लाइट लेफ्टिनेंट जोगिंदर पाल शर्मा (रिटायर्ड) कहते हैं, यह शहादत है जो सबको नसीब नहीं होती।
खुद चुनी थी सियाचिन में वॉलेंटियर सेवा
शशिकांत शर्मा के पिता कहते हैं कि उसकी पहली ही पोस्टिंग अमृतसर में थी। उसकी ज्वाइनिंग 15, आर्मर्ड रेजीमेंट (बख्तरबंद) में हुई थी। सर्विस के दो साल भी नहीं बीते थे कि कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ की खबरें आने लगीं थीं। युद्ध छिड़ते ही उन्होंने अपने कमांडिंग ऑफिसर से जाकर युद्ध में वॉलेंटियर सेवा देने की अनुमति मांगी। पिता बताते हैं कि उनके अफसरों ने भी उन्हें कहा कि उनकी उम्र बेहद कम है, देश के लिए सेवा करने के बहुत से मौके मिलेंगे। लेकिन वे नहीं माने।
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मां सुदेश शर्मा ने बताया कि उन्होंने सियाचीन जाने के अपने फैसले के बारे में उन्हें बताया। मां ने जब रोकने की कोशिश की तो उन्होंने कहा, मां, अगर सड़क हादसे में मेरी जान चली जाती तो क्या तब भी तुम रोक लेती। ये देश सेवा का अवसर है, मुझे जाने दो। मां ने उन्हें इजाजत दे दी। मां सुदेश शर्मा कहती हैं कि उसकी शादी की तैयारियां हो रहीं थीं। सिर्फ दो महीने बाद उनके घर शहनाइयां गूंजने वाली थीं, लेकिन बेटा ही चला गया।
जब शशिकांत की शहादत की खबर आर्मी हेडक्वार्टर से उन्हें दी गई थी, तो लगा था पूरी दुनिया उजड़ गई। लेकिन आज वे कहती हैं, उन्हें उनके बेटे पर नाज है। गर्व महसूस होता है जब लोग उनसे बेटे की यादों के बारे में पूछते हैं।
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ये शहादत सबको नसीब नहीं होती
शहीद कैप्टन शशिकांत शर्मा (सेना मेडल, वीरता पदक, अति वीरता पदक) के पिता फ्लाइट लेफ्टिनेंट जोगिंदर पाल शर्मा (रिटायर्ड) कहते हैं कि देश की सेवा करने का मौका तो उन्हें भी खूब मिला। उन्होंने 1962 में चीन के साथ लड़ाई, 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाई में हिस्सा लिया और अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाया। लेकिन आज उनका शहर उन्हें उनके नाम से नहीं, बल्कि शहीद बेटे कैप्टन शशिकांत शर्मा के पिता के नाम से जानता है। पिता की आंखें यह कहते हुए भर आईं कि उनका बेटा किस्मत वाला था, उनसे बहुत आगे निकल गया। फ्लाइट लेफ्टिनेंट जोगिंदर पाल शर्मा (रिटायर्ड) कहते हैं, यह शहादत है जो सबको नसीब नहीं होती।
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खुद चुनी थी सियाचिन में वॉलेंटियर सेवा
शशिकांत शर्मा के पिता कहते हैं कि उसकी पहली ही पोस्टिंग अमृतसर में थी। उसकी ज्वाइनिंग 15, आर्मर्ड रेजीमेंट (बख्तरबंद) में हुई थी। सर्विस के दो साल भी नहीं बीते थे कि कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ की खबरें आने लगीं थीं। युद्ध छिड़ते ही उन्होंने अपने कमांडिंग ऑफिसर से जाकर युद्ध में वॉलेंटियर सेवा देने की अनुमति मांगी। पिता बताते हैं कि उनके अफसरों ने भी उन्हें कहा कि उनकी उम्र बेहद कम है, देश के लिए सेवा करने के बहुत से मौके मिलेंगे। लेकिन वे नहीं माने।
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मां सुदेश शर्मा ने बताया कि उन्होंने सियाचीन जाने के अपने फैसले के बारे में उन्हें बताया। मां ने जब रोकने की कोशिश की तो उन्होंने कहा, मां, अगर सड़क हादसे में मेरी जान चली जाती तो क्या तब भी तुम रोक लेती। ये देश सेवा का अवसर है, मुझे जाने दो। मां ने उन्हें इजाजत दे दी। मां सुदेश शर्मा कहती हैं कि उसकी शादी की तैयारियां हो रहीं थीं। सिर्फ दो महीने बाद उनके घर शहनाइयां गूंजने वाली थीं, लेकिन बेटा ही चला गया।
जब शशिकांत की शहादत की खबर आर्मी हेडक्वार्टर से उन्हें दी गई थी, तो लगा था पूरी दुनिया उजड़ गई। लेकिन आज वे कहती हैं, उन्हें उनके बेटे पर नाज है। गर्व महसूस होता है जब लोग उनसे बेटे की यादों के बारे में पूछते हैं।
अब किसे खिलाऊंगी हलवा
अमर शहीद कैप्टन शशिकांत शर्मा की मां सुदेश शर्मा ने अपनी याद ताजा करते हुए कहा, शशि को हलवा बहुत पसंद था। जब भी खुश होता, किचन में उनका हाथ बंटाने आ जाता। हलवा बनवाता, खुद भी खाता और अपने हाथ से मुझे खिलाता। मां की आंखों के कोने नम हो गये ये कहते-कहते कि अब भी जब वे हलवा बनाती हैं तो उसकी याद आ जाती है। लेकिन अब हलवा किसे खिलाऊंगी।
छोटे भाई के बहुत करीब थे शशि
कैप्टन शशिकांत शर्मा अपने छोटे भाई डॉ. नरेश शर्मा के बहुत करीब थे। वे उन्हें बहुत प्यार करते थे। यही कारण है कि अब नरेश अपने भाई की शहादत को अपने ही तरीके से सम्मान देते हैं। वे हर साल कैप्टन शशिकांत शर्मा के नाम से नोएडा में स्कूल स्तरीय क्रिकेट टूर्नांमेंट कराते हैं।
छोटे भाई के बहुत करीब थे शशि
कैप्टन शशिकांत शर्मा अपने छोटे भाई डॉ. नरेश शर्मा के बहुत करीब थे। वे उन्हें बहुत प्यार करते थे। यही कारण है कि अब नरेश अपने भाई की शहादत को अपने ही तरीके से सम्मान देते हैं। वे हर साल कैप्टन शशिकांत शर्मा के नाम से नोएडा में स्कूल स्तरीय क्रिकेट टूर्नांमेंट कराते हैं।