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पाकिस्तान में बनता है ‘बरेली वालों का सुरमा’

Sat, 08 Oct 2016 04:39 AM IST
कमल शर्मा/ अमर उजाला, बरेली
कमल शर्मा/ अमर उजाला, बरेली Updated Sat, 08 Oct 2016 04:39 AM IST
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Karachi has 'Bareilly walon ka surma'

भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते भले ही खराब चल रहे हों लेकिन सुरमे ने बरेली और कराची के बीच अनचाहे रिश्ते जरूर बनाए रखे हैं। दुनिया में कहीं भी सुरमे के ग्राहक हों वे अपनी आंखों में इन दोनों शहरों का सुरमा ही लगाते हैं। दोनों देशों के बीच रिश्ता बनाने वाला बरेली का हाशमी खानदान ही है।

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हाशमी खानदान के मोहम्मद उमर और मोहम्मद यासीन ने 1956 में सुरमा कारोबार को बढ़ाने के लिए तय किया था कि एक भाई हिंदुस्तान में रहे, दूसरा पाकिस्तान में अपना कारोबार बढ़ाए। इसी के बाद मोहम्मद उमर कराची चले गए और उन्होंने वहां के बंदरगाह रोड पर ‘बरेली वालों का सुरमा’ ब्रांड से कारोबार शुरू कर दिया। जबकि बरेली में मोहम्मद यासीन ने सुरमे को ताज ब्रांड नाम दे दिया। ये दोनों सुरमे आज भी दुनिया में बिक रहे हैं।
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बरेली में सुरमे का कारोबार करने वाले हसन हाशमी कहते हैं कि कराची में उनके ताया ने सुरमे का कारोबार शुरू किया था। अब वहां उनके बेटे मोहम्मद कमर इस कारोबार को संभाल रहे हैं। यह सुरमा सुंदरता के साथ-साथ दवा के रूप में भी इस्तेमाल हो रहा है। हसीन कहते हैं कि ताज ब्रांड नाम से यह सुरमा लखनऊ से यूनानी और आयुर्वेद निदेशालय में पंजीकृत है और ताज मार्का ट्रेड मार्क भी है।

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मिस्र से आया सुरमा

Karachi has 'Bareilly walon ka surma'

सुरमे की शुरुआत मिस्र से हुई थी। शुरू में मुस्लिम महिलाएं इसे इस्तेमाल करती थीं। भारत में 1794 में बरेली से एम हसीन हाशमी के परबाबा मोहम्मद हाशम ने शुरुआत की थी। बाद में उनके बेटे मोहम्मद जान और काजिम ने सुरमे का कारोबार संभाला। अब मोहम्मद यासीन के बेटे एम हसन हाशमी इसे संभाल रहे हैं। अब तो मिस्र में भी यहां का सुरमा काफी बिक रहा है। यहां के सुरमे की सऊदी अरब, अमेरिका, ब्रिटेन सहित सभी 150 से अधिक देशों में बिक्री होती है।

आंखों की 22 तरह की बीमारियों में सुरमा इस्तेमाल होता है। आंखों में पानी आना, आंख का जाला, लालमी, पीलापन, नजर बढ़ाने, आंखों की कमजोरी, आंखों के दर्द, मोतियाबिंद और काले पानी जैसी बीमारी के इलाज में इसे कारगर माना जाता है। इसे मोती, चांदी, सोना, मूंगा, गोमेद, पुखराज आदि पत्थरों को मिक्स करके अलग-अलग बीमारियों के उपचार के लिए बनाते हैं। इसमें गुलाब जल, कपूर, ममीरा, पीपल, सौंफ आदि यूनानी एवं आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां भी मिलाते हैं। इनका सुरमे की पैकिंग पर भी जिक्र होता है।

सुरमे को संग-ए-कोयतूर (कोयतूर) पत्थर से बनाया जाता है। यह पत्थर सऊदी अरब, मिस्र से मंगाया जाता है। इसे पीसने के लिए खासतौर के मूसा पत्थर से बने सिल-बट्टा का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी खासियत यह है कि पिसाई के दौरान यह सुरमा वाले पत्थर की पिसाई तो करता है लेकिन खुद नहीं घिसता।

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