Justice Sanjay Karol: अमीर-गरीब... जैसे कठोर सच का सामना जरूरी; सामाजिक न्याय की चुनौतियों पर सुप्रीम कोर्ट जज
न्यायमूर्ति संजय करोल ने कहा कि हमें इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है कि भारत में सामाजिक न्याय के आदर्शों को कितना साकार किया जा चुका है। साथ ही उन्होंने कहा कि जब हम 2025 में विश्व सामाजिक न्याय दिवस मनाएंगे, तो हमें यह देखना होगा कि क्या हम अपने संविधान में निर्धारित सामाजिक न्याय के लक्ष्यों को पूरा करने में सफल रहे हैं या नहीं।
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सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति संजय करोल ने गुरुवार को समाजित न्याय पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हमें इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है कि भारत में सामाजिक न्याय के आदर्शों को कितना साकार किया जा चुका है और इसके साथ ही हमें अमीर अथवा गरीब के बीच की खाई जैसे कठोर सत्य का सामना भी करना होगा। बता दें कि न्यायमुर्ति करोल का ये बयान विश्व सामाजिक न्याय दिवस के अवसर पर ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में आयोजित एक सेमिनार में संबोधन के दौरान आया।
न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि यह दिन न केवल देश की प्रगति पर चिंतन करने का है, बल्कि यह हमें सामाजिक न्याय के वास्तविक सार को प्राप्त करने में अभी भी मौजूद अपार चुनौतियों की याद भी दिलाता है। उनका कहना था कि जब हम 2025 में विश्व सामाजिक न्याय दिवस मनाएंगे, तो हमें यह देखना होगा कि क्या हम अपने संविधान में निर्धारित सामाजिक न्याय के लक्ष्यों को पूरा करने में सफल रहे हैं या नहीं।
संपन्न और वंचितों के बीच बढ़ती खाई
न्यायमूर्ति करोल ने भारत के विकास की कुछ अहम उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश ने आर्थिक विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अमीर और गरीब के बीच का अंतर अभी भी बहुत बड़ा है। इसके साथ ही, यह खाई हाल के वर्षों में कई मामलों में हिंसक भी हो गई है।
उन्होंने कहा कि संविधान को अपनाने के 75 साल पूरे होने के मौके पर यह देखना जरूरी है कि क्या भारत में हर व्यक्ति के लिए सामाजिक न्याय का वादा पूरा हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि गरीबी का मुद्दा अभी भी बरकरार है और बहुत से समुदायों को प्रणालीगत भेदभाव और बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है।
असमानता की बढ़ती समस्या
न्यायमूर्ति करोल ने यह भी कहा कि हालिया बहसों से यह सामने आया है कि भारत में सबसे धनी 1 प्रतिशत लोग देश की संपत्ति का अनुपातहीन हिस्सा रखते हैं, जबकि देश के बड़े हिस्से को आर्थिक विकास के लाभ से वंचित रखा गया है।
उन्होंने कहा कि कुछ लोगों के हाथों में धन का संकेंद्रण और भी अधिक स्पष्ट हो गया है, जबकि लाखों लोग अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह स्थिति विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण हो जाती है जब हम यह देखते हैं कि आर्थिक असमानता किस हद तक बढ़ गई है और यह समाज के सबसे कमजोर वर्गों पर असर डाल रही है।
सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने का महत्व
न्यायमूर्ति करोल ने ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में केके लूथरा और निर्मल लूथरा तुलनात्मक आपराधिक कानून और आपराधिक न्याय अध्ययन केंद्र की स्थापना की भी घोषणा की। उन्होंने कहा कि आपराधिक न्याय में तुलनात्मक आपराधिक कानून का अध्ययन वैश्विक स्तर पर सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण है।
उन्होंने बताया कि विभिन्न कानूनी प्रणालियों की तुलना करने से विद्वान उन प्रथाओं की पहचान कर सकते हैं जो हाशिए पर पड़े और वंचित समुदायों के लिए समानता, निष्पक्षता और न्याय को बढ़ावा देती हैं। उदाहरण के तौर पर, यह समझना कि विभिन्न राष्ट्र महिला आबादी और कारावास जैसी समस्याओं को कैसे संबोधित करते हैं, समावेशी नीतियों और सुधारों के विकास में मदद करता है।
ये नेता रहे मौजूद
इस कार्यक्रम में केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अर्जन के सीकरी, वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद, सिद्धार्थ लूथरा और गीता लूथरा जैसे कानूनी क्षेत्र के दिग्गजों ने भी अपने विचार रखे।इस दौरान, सभी नेताओं ने सामाजिक न्याय के मुद्दों पर गंभीर विचार विमर्श किया और इस दिशा में अधिक कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया।