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अयोध्या केस का फैसला सुनाना बेहद ही चुनौतीपूर्ण रहा: जस्टिस रंजन गोगोई

Sat, 29 Aug 2020 05:03 AM IST
संजीव कुमार झा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Sat, 29 Aug 2020 05:03 AM IST
सार

  • राम जन्मभूमि केस पर लिखी पुस्तक पर परिचर्चा के दौरान संदेश में पूर्व सीजेआई ने कहा
  • पत्रकार माला दीक्षित ने लिखी है पुस्तक  ‘अयोध्या से अदालत तक भगवान श्रीराम’

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Justice Ranjan Gogoi says, Ayodhya verdict was challenging
सीजेआई रंजन गोगोई - फोटो : twitter@ranjan gogoi

विस्तार

राम जन्मभूमि मामले में फैसला सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ की अध्यक्षता करने वाले भारत के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि इस केस में फैसला सुनाना चुनौतीपूर्ण काम था। जस्टिस गोगोई ने यह बात पत्रकार माला दीक्षित की पुस्तक ‘अयोध्या से अदालत तक भगवान श्रीराम (सुप्रीम कोर्ट में 40 दिन की सुनवाई के अनछुए पहलुओं की आंखों देखी दास्तान)’ पर वर्चुअल परिचर्चा में भेजे अपने संदेश में कही।

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इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आइजीएनसीए) की पहल पर आयोजित परिचर्चा में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा, इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एसआर सिंह, अयोध्या में जन्मभूमि परिसर की खुदाई में शामिल रहे भारतीय पुरातत्व सर्वे के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक बीआर.मणि, जाने-माने पत्रकार रामबहादुर राय और वरिष्ठ पत्रकार एनके. सिंह ने अपने विचार रखे।
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जस्टिस गोगोई ने अपने संदेश में कहा कि अयोध्या मामला भारत के कानूनी इतिहास में सबसे प्रचंड रूप से लड़े गए मुकदमों में हमेशा विशेष स्थान रखेगा। इस मामले से जुड़े विभिन्न भारी भरकम मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ मामले को अंतिम फैसले के लिए लाया गया था। ये रिकार्ड विभिन्न भाषाओं से अनुवाद कराए गए थे। पक्षकारों की ओर से प्रख्यात वकीलों ने हर बिंदु पर आवेश में आकर विचारोत्तेजक बहस की। 
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जस्टिस गोगोई ने कहा कि अंतिम फैसले तक पहुंचना कई कारणों से एक चुनौतीपूर्ण काम था। 40 दिनों तक निरंतर चली सुनवाई में प्रख्यात वकीलों के बेंच को दिया गया सहयोग अभूतपूर्व था। पुस्तक सभी घटनाओं का एक परिप्रेक्ष्य के साथ वर्णन करती है, जो मुझे यकीन है कि पाठकों को दिलचस्प लगेगा। लेखिका ने, जो समाचार पत्र के लिए केस कवर करने के लिए अधिकांश सुनवाई में मौजूद थी, मैं समझता हूं कोर्ट में हुई घटनाओं के साथ पूर्ण न्याय किया है। पुस्तक की सफलता के लिए उन्हें मेरी शुभकामनाएं। जस्टिस गोगोई का यह संदेश प्रोफेसर रमेश गौड़ ने पढ़ा।

जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा ने परिचर्चा में कहा कि आमतौर पर लोगों को बहुत बड़ी वेदना रहती है कि अदालतों में बहुत समय लगता है। इस मामले में भी समय लगा लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने तत्परता दिखाई और निर्णय दिया तो सभी ने इसे सराहा। निर्णय सबके सामने है लेकिन फैसला होने के दौरान क्या हुआ, ये सब इस पुस्तक में है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एस.आर. सिंह ने कहा कि भगवान को भी न्याय पाने के लिए 70 साल का समय लग गया तो आम आदमी का क्या कहना। 

वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने कहा, कानून या सुप्रीम कोर्ट का नाम आते ही लोगों की रुचि समाप्त हो जाती है लेकिन इस अरुचिकर विषय को रुचिकर बनाने के लिए लेखिका बधाई की पात्र हैं। नरसिंहराव और वाजपेयी जी के समय का अनुभव बहुत कटु है। इस पुस्तक से हमें पता चलता है कि हफ्ते में पहली बार पांच दिन किसी केस की सुनवाई हुई।

वरिष्ठ पत्रकार एन के. सिंह ने कहा, मालाजी ने जाने अनजाने जो किया है वो आने वाली पीढ़ी के लिए मिसाल है। जज इस निर्णय पर किन टूल्स के आधार पर पहुंचे, इसका जवाब ये पुस्तक आने वाले पीढ़ी को देगी. फैसले का विश्लेषण बहुत हो जाएगा लेकिन जजों ने कैसे निर्णय दिया ये जवाब इस पुस्तक में मिलेगा। 


भारतीय पुरातत्व सर्वे (एएसआई) के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक बी.आर.मणि ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में तो मैं इस मामले की सुनवाई के दौरान उपस्थित था लेकिन सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ यह मुझे इस पुस्तक से जानने को मिला. यह एक अभूतपूर्व उत्खनन कार्य था जो कि विश्व के इतिहास में भी अनूठा था. इसकी विस्तृत रिपोर्ट उच्च न्यायालय में दाखिल की गई।

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