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कुरुक्षेत्र: झारखंड में भाजपा की पांच गलतियां और हेमंत सोरेन का रूपांतरण

Mon, 23 Dec 2019 10:53 PM IST
संदीप भट्ट विनोद अग्निहोत्री
विनोद अग्निहोत्री Published by: संदीप भट्ट Updated Mon, 23 Dec 2019 10:53 PM IST
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Jharkhand Election results 2019: five reasons for BJP defeat
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह - फोटो : PTI

झारखंड विधानसभा चुनाव नतीजों का स्पष्ट संदेश है कि भाजपा ने न सिर्फ अपने मुख्यमंत्री रघुवरदास पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया बल्कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने भी समय रहते दखल न देकर झामुमो-कांग्रेस-राजद महागठबंधन की जीत का रास्ता साफ करने में ही अपरोक्ष रूप से मदद की। शायद इसके लिए भाजपा नेतृत्व का यह अति आत्मविश्वास था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, गृह मंत्री और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति और चुनाव प्रबंधन और मुख्यमंत्री रघुबर दास की पांच साल की स्थाई सरकार औ्रर स्थायित्व के नारे की कोई काट विरोधी खेमे के पास नहीं है। लेकिन भाजपा की पांच गलतियों ने जहां सत्ता की डोर उसके हाथों से खिसका दी, वहीं झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन के नेता हेमंत सोरेन ने जिस तरह पिछले पांच सालों में अपना रूपांतरण किया उसने उन्हें झारखंड में भाजपा विरोधी खेमे का नेता और रघुवर दास का विकल्प बना दिया।

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पहली चूक 
अपने अति आत्मविश्वास में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने न सिर्फ राज्य भाजपा के तमाम नेताओं की इस बात को अनसुना किया कि मुख्यमंत्री रघुवर दास को आगे करके अगर चुनाव लड़ा जाएगा तो पार्टी जीत नहीं सकेगी। प्रदेश भाजपा के तमाम नेताओं ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, कार्यकारी अध्यक्ष, संगठन महासचिव और अन्य नेताओं को लगातार यह बताया कि मुख्यमंत्री बेहद अलोकप्रिय हो रहे हैं और चुनाव से पहले पार्टी को इस पर सोचना चाहिए। यहां तक कि लोकसभा चुनाव के दौरान जितने भी केंद्रीय नेता चुनाव प्रचार के लिए झारखंड गए, सबको राज्य के कई स्थानीय नेताओं ने यह फीड बैक दिया। लेकिन केंद्रीय नेताओं ने इसे अनदेखा और अनसुना कर दिया। भाजपा नेतृत्व की यह पहली चूक थी।
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दूसरी चूक
यहां तक कि जनसंघ के जमाने से पार्टी के विचारनिष्ठ और संघनिष्ठ नेता और मंत्री सरयू राय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को पूरी वस्तुस्थिति से अवगत कराया और राज्य में उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार विशेषकर खनन क्षेत्र में खनन माफिया के बढ़ते वर्चस्व को सार्वजनिक भी किया। सरयू राय की बात सुनने की बजाय उन्हें पार्टी के टिकट से ही वंचित कर दिया गया। हठी सरयू राय
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ने बगावत कर दी और मुख्यमंत्री रघुबरदास को उनके ही चुनाव क्षेत्र में चुनौती दी और हरा भी दिया। सरयू राय जो 1964 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा के शिक्षक और प्रचारक रहे हैं और जनसंघ से लेकर भाजपा के हर दौर के साक्षी और साथी रहे, उनकी न प्रधानमंत्री मोदी ने सुनी न भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने। शायद उन्हें कमतर करके आंका गया। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की यह दूसरी चूक थी।

तीसरी चूक 
2014 में भाजपा ने तब आजसू से गठबंधन करके विधानसभा चुनाव लड़ा था जबकि पूरे देश में लोकसभा चुनावों में चली मोदी लहर बरकरार थी और झामुमो कांग्रेस गठबंधन टूट चुका था और तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी 14 महीने की सरकार को लेकर सत्ता विरोधी रुझान का सामना कर रहे थे। भाजपा को उसका फायदा मिला और उसने 37 सीटें जीतीं और सहयोगी आजसू की पांच सीटों के साथ मिलकर सरकार बनाई। लेकिन इस बार न जाने किस अति आत्मविश्वास या अहंकार में भाजपा ने आजसू को गठबंधन से बाहर जाने को मजबूर कर दिया। आजसू अध्यक्ष सुदेश महतो ने बार बार इसके राजनीतिक नुकसान को लेकर चेताया लेकिन भाजपा नेतृत्व ने उनसे कोई बात नहीं की। 

आम तौर पर गठबंधन के सहयोगियों को मनाने में माहिर माने जाने वाले भाजपा अध्यक्ष और गृह मंत्री अमित शाह ने भी सुदेश महतो को एक बार भी दिल्ली बुलाना मुनासिब नहीं समझा, क्योंकि मुख्यमंत्री रघुबर दास ने मोदी और शाह को भरोसा दिया था कि आजसू के अलग होने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि पांच साल तक चली उनकी स्थाई सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि से लोग इतने खुश हैं कि आसानी से भाजपा अकेले बहुमत से काफी आगे निकल जाएगी। न सिर्फ आजसू ने भाजपा का साथ छोड़ा बल्कि एनडीए के दूसरे दो प्रमुख घटक दलों लोक जनशक्ति पार्टी और जनता दल(यू) ने भी अलग अलग चुनाव लड़ा। जबकि सामने झामुमो कांग्रेस और राजद के बीच बिना झगड़े के सीटों का बंटवारा हो गया। इसका नुकसान भाजपा को अपने वोटों में सेंधमारी और हार के रूप में उठाना पड़ा। यह भाजपा नेतृत्व की तीसरी चूक थी।

चौथी चूक 
भाजपा को भरोसा था कि केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले छह महीने के दौरान जिस तरह तीन तलाक, अनुच्छेद 370 और नागरिकता संशोधन कानून को लेकर कदम उठाए और सुप्रीम कोर्ट में चल रहे राम मंदिर विवाद के निबटारे के लिए रास्ता बनाया, इनसे झारखंड में पार्टी की नैया आसानी से पार लग जाएगी। यही वजह थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत जितने भी केंद्रीय मंत्री और नेता प्रचार के लिए झारखंड आए सबने अपना पूरा जोर इन्हीं राष्ट्रीय मुद्दों को उठाने पर लगाया। जबकि विपक्षी महागठबंधन ने पूरे चुनाव को स्थानीय मुद्दों पर ही लड़ा। मुख्यमंत्री की एकाधिकारवादी कार्यशैली, सरयू राय द्वारा उठाए गए उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार के मामले, ग्रामीण इलाकों में विलय के नाम पर करीब 16 हजार छोटे स्कूलों की बंदी, गांवों में अंधाधुंध शराब के ठेके खुलवाने, आदिवासियों की जमीन की हिफाजत करने वाले सीएनटी और एसपीटी कानून में भाजपा सरकारों द्वारा संशोधन के प्रयास, नोटबंदी से बंद हुए कारोबार और बढ़ी बेरोजगारी, किसानों की आत्महत्या जैसे कई स्थानीय मुद्दों पर ही अपना चुनाव प्रचार केंद्रित रखा। स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा और राष्ट्रीय मुद्दों को तरजीह भाजपा नेतृत्व की चौथी चूक थी। 

पांचवीं चूक 
भाजपा नेतृत्व की पांचवीं और आखिरी चूक थी पार्टी का सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति के भरोसे रहना और प्रचार के आखिरी दौर तक राज्य के चुनाव में प्रधानमंत्री को झोंक देना। इसे भी विपक्ष ने मुद्दा बनाया। सरयू राय से लेकर हेमंत सोरेन तक ने कहा कि जिस तरह प्रधानमंत्री विधानसभा चुनाव में इतना सघन प्रचार कर रहे हैं और जिस भारी तादाद में केंद्रीय नेता दौरे कर रहे हैं उससे लगता है कि झारखंड एक राज्य नहीं बल्कि केंद्र शासित प्रदेश है। विपक्ष ने मोदी के सघन प्रचार और केंद्रीय मंत्रियों के दौरों को भी राज्य की क्षेत्रीय अस्मिता पर केंद्र के हमले के रूप में प्रचारित किया। जबकि विपक्ष के सबसे बड़े स्टार प्रचार झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ही थे। 
 

हालांकि राहुल गांधी ने भी कुछ जनसभाएं कीं, फिर भी प्रचार की पूरी कमान हेमंत के ही हाथों में ही थी जिसने झारखंड की स्थानीय अस्मिता को भी मुद्दा बनाने में मदद की। यह वही अस्मिता कार्ड था जो कभी गुजरात में खुद नरेंद्र मोदी कांग्रेस के खिलाफ खेलते थे जब कांग्रेस के सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मनमोहन सिंह समेत सभी केंद्रीय नेताओं के खिलाफ भाजपा की तरफ से पूरे प्रचार की कमान सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी के चारों ओर केंद्रित होती थी। वह गुजरात अस्मिता का केंद्रीय सत्ता पर काबिज कांग्रेस के खिलाफ सफलतापूर्वक इस्तेमाल करते थे। दूसरी तरफ 14 महीने सत्ता में रहने के बावजूद हेमंत सोरेन ने अपने ऊपर कोई दाग नहीं लगने दिया और पूरे पांच साल उन्होंने सदन में और बाहर एक सफल विपक्षी नेता की भूमिका निभाई। 

आदिवासियों के मुद्दों को उन्होंने जमकर उठाया और एक आदिवासी बहुल राज्य में भाजपा द्वारा गैर आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाने, पार्टी के आदिवासी नेताओं को हाशिए पर रखने को खूब मुद्दा बनाया। हेमंत सोरेन ने पिछले पांच सालों में एक तरफ भाजपा के खिलाफ आदिवासियों को एकजुट किया तो दूसरी तरफ अपनी स्वीकार्यता गैर-आदिवासियों के बीच भी बनाई। कांग्रेस और राजद के साथ गठबंधन ने इसमें और मदद की। इसीलिए शहरी क्षेत्रों में भी झामुमो कांग्रेस राजद गठबंधन ने भाजपा को अच्छी टक्कर दी और कई सीटें छीनीं भी। एक तरह से हेमंत सोरेने ने खुद को एक विकल्प के रूप में तैयार किया और पेश किया जिसे झारखंड की जनता ने आखिरकार मंजूर किया और भाजपा के हाथों से सत्ता फिसल गई।

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