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भाजपा ने नहीं रखी लाज तो जद(यू) के पास खुला है अकेले का विकल्प

Sun, 08 Jul 2018 09:38 PM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Updated Sun, 08 Jul 2018 09:38 PM IST
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JDU will contest independently in 2019 if BJP donot cooperate

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजनीति में काफी मंझे हैं। राजनीति की हर नजाकत समझते हैं और दिल्ली में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का निर्णय लेकर उन्होंने भाजपा पर नैतिक दबाव बढ़ा दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी की जद(यू) में बने रहने, मिलकर चुनाव लड़ने की घोषणा ने गेंद भाजपा के पाले में डाल दी है। यह नीतीश कुमार का राम विलास पासवान को विश्वास में लेकर भाजपा पर बनाया गया दबाव है। भाजपा ने रखी लॉज तो ठीक, वरना जद(यू) के पास एनडीए का हिस्सा बने रहकर, भाजपा की केन्द्र सरकार को बाहर से समर्थन देकर अकेले लोकसभा चुनाव में जाने का विकल्प खुला है।

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हालांकि पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी सीटों के बंटवारे को लेकर कुछ नहीं बोलते। उनका कहना है कि भाजपा ने इसके बाबत अभी कोई प्रस्ताव नहीं दिया है। इसलिए पहले उस तरफ से प्रस्ताव आने दीजिए। त्यागी ने अपने वक्तव्य में बिहार के अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव में पार्टी के अपने दम पर चुनाव लड़ने का विकल्प भी खुला रखा है। लोकसभा चुनाव में दूसरे राज्यों में भी जद(यू) इस रणनीति को अपना सकती है। 
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इस विकल्प को खुला रखने का सीधा सा मतलब भाजपा पर राजनीतिक दबाव बनाने का ही है। नीतीश के दिल्ली में आकर इस घोषणा का एकमात्र मकसद है कि यदि भाजपा ने बिहार में उनके चेहरे की लॉज नहीं रखी तो वह लोकसभा चुनाव में अकेले दम पर चुनाव लड़ लेंगे। कुमार के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि अकेले चुनाव लड़कर नीतीश कुमार राज्य में एक दर्जन के करीब लोकसभा सीटों को ला सकते हैं।
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क्या हो कि बनेगी बात

जद(यू) चाहती है कि उसे भाजपा बिहार में कम से कम 15-18 सीटें दे दे। बिहार के बाहर झारखंड, म.प्र., उ.प्र. में भी जद(यू) को साथ रखे। झारखंड में पहले भी दोनों दल साथ-साथ चुनाव लड़े हैं। उ.प्र. में 7-8 प्रतिशत कुर्मी वोटों का तर्क है। इसी तरह से म.प्र. में भी जद(यू) के प्रभाव का हवाला दिया जा रहा है। इस तरह से कुल मिलाकर 20-25 सीटों का प्रस्ताव यदि भाजपा की तरफ से आता है तो जद(यू) को साथ मिलकर चुनाव लड़ने में कोई आपत्ति नहीं है। पार्टी के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी का कहना है कि ऐसा होने पर वह खुद नीतीश कुमार को मना लेंगे। त्यागी का साफ कहना है कि इस बारे में जद(यू) ने अपना रुख साफ कर दिया है। वह एनडीए के साथ है। भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के पक्ष में है। आगे की जिम्मेदारी भाजपा की है।

क्या है तर्क

2009 में जद(यू)-भाजपा साथ लोकसभा चुनाव लड़े थे। जद(यू) 25 और भाजपा 15 सीट पर मैदान में उतरी थी। तब नीतीश कुमार का बिहार में जलवा था। 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर चुनाव हुआ। भाजपा 29 सीट पर लड़ी, लोजपा सात और रालोसपा चार सीट पर। भाजपा को 22 सीटों पर सफलता मिली। लोजपा छह और रालोसपा तीन सीट पर। जद(यू) अकेले चुनाव में उतरी और मोदी लहर के कारण केवल दो सीटें आईं। 2015 में विधानसभा चुनाव हुए। भाजपा लोजपा, रालोसपा के साथ चुनाव लड़ी। दोनों सहयोगी दल दो-दो सीट पा सके और भजपा भी केवल 53 सीट जीत सकी। जद(यू)-राजद-कांग्रेस का महागठबंधन सफल रहा। 

नीतीश कुमार के जद(यू) को 71 सीटें मिली। इन तमाम जटिल तर्कों पर नीतीश कुमार के रणनीतिकारों का कहना है कि इससे सीट का बंटवारा हल नहीं होगा। सूत्रों का कहना है कि यह भाजपा, जद(यू),लोजपा, रालोसपा के बीच में आपसी समझ से इसका समाधान निकलेगा। यदि भाजपा ने इसका सम्मान किया तो ठीक, वरना जद(यू) एनडीए की सरकार को बाहर से समर्थन देगी, बिहार की सरकार चलती रहेगी और बिहार के लोकसभा चुनाव में अकेले उतरने के लिए मजबूर हो जाएगी।

भाजपा का पेंच

JDU will contest independently in 2019 if BJP donot cooperate

भाजपा के उम्मीदवारों ने 40 लोकसभा सीटों वाले बिहार में 29 पर लड़कर 22 सीटें जीत ली थी। शेष में से अधिकांश पर दूसरे नंबर पर थी। पार्टी के अंरुनी फीडबैक में बिहार में उसकी स्थिति बहुत खराब नहीं है। सूत्र बताते हैं कि 25 सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद भाजपा 12-14 सीटें आसानी से जीत सकती है। यदि यही संख्या 30 की हो तो उसके सीटों की संख्या 14-16 तक हो सकती है। ऐसे में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सामने पेंचीदा सवाल है। सहयोगी भी अपनी सिटिंग सीट छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। वहीं नीतीश कुमार की पार्टी के नेता किसी भी सूरत में 15 सीट से नीचे उतरने को तैयार नहीं दिखाई दे रहे हैं। मंथन जारी है। 

चुन लें नीतीश कुमार

केन्द्र सरकार के चार साल पूरा होने के बाद आयोजित पत्रकार वार्ता से इतर पार्टी के शीर्ष नेताओं में से एक ने बिहार में जद(यू) को लेकर अपनी राय रखी थी। यह राय ऑफ दि रिकॉर्ड एक सवाल के जवाब में राज्य में गठबंधन की सरकार को बनाए रखने के संदर्भ से लेकर आगे एनडीए में बने रहने को लेकर आई थी। तब सूत्र ने कहा था कि यह नीतीश कुमार को तय करना है कि वह कहां रहेंगे। वह अधिक परेशानी पैदा करने वाले लोगों के साथ जाना चाहेंगे या कम न्यूसेंस पैदा करने वालों के साथ रहेंगे। यह जवाब इतना समझने के लिए पर्याप्त है कि भाजपा अपने राजनीतिक हितों से कोई बड़ा समझौता नहीं करने वाली है।

अकेले जद(यू) लड़ेगी तब

पार्टी के वरिष्ठ नेता का कहना है कि हमारे दो लोकसभा सांसद हैं। हम एनडीए में हैं। केन्द्र सरकार को समर्थन दे रहे हैं, लेकिन सरकार से बाहर हैं। आखिर हमें इसमें क्या मिला? इसके सामानांतर भाजपा बिहार में हमारी सहयोगी है। सत्ता में है। उसके समर्थन से सरकार चल रही है। भाजपा का उपमुख्यमंत्री और उसके मंत्री हैं। फायदे में तो भाजपा है। सूत्र का कहना है कि ऐसे में उचित सम्मान न मिलने पर हम लोकसभा चुनाव अकेले लड़ सकते हैं। एनडीए की केन्द्र सरकार को बाहर से समर्थन देने का विकल्प खुला रखेंगे। वरिष्ठ सूत्र के मुताबिक यह तो तय है कि हमें 2014 की तरह 2019 में दो सीटों पर सफलता तो मिल ही जाएगी। हम दहाई के आंकड़े को भी पार कर सकते हैं। ऐसे जद(यू) का क्या बिगड़ेगा? भाजपा अपना ही बिगाड़ेगी, क्योंकि वह ऐेसा अवसर देकर नीतीश कुमार जैसा स्टार प्रचारक खो देगी। कुल मिलाकर दबाव की राजनीति चल रही है। अभी असल की तस्वीर आनी बाकी है।

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