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Jammu Kashmir Delimitation: क्या सात सीटें बढ़ने से भाजपा को होगा सियासी फायदा, ये है वजह

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली, Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Fri, 09 Jul 2021 05:34 PM IST

सार

जम्मू कश्मीर में परिसीमन के बाद 7 सीटें बढ़ने से विधानसभा सीटों की संख्या 90 हो जाएंगी, जिसका सबसे ज्यादा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। जबकि इससे पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस जैसी पार्टियों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।
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जेपी नड्डा, फारुख अबदुल्ला और महबूबा मुफ्ती
जेपी नड्डा, फारुख अबदुल्ला और महबूबा मुफ्ती - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

जम्मू कश्मीर में परिसीमन के बाद 7 सीटें बढ़ने से विधानसभा सीटों की संख्या 90 हो जाएगी, जिसका सबसे ज्यादा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। जबकि इससे पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसी पार्टियों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। इसकी बड़ी वजह यह बताई जा रही है कि परिसीमन के बाद यह सीटें जम्मू में बढ़ सकती हैं, जहां भाजपा कुछ सालों से खुद को मजूबत करने में जुटी हुई है।
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जम्मू में बढ़ सकती हैं 7 सीटें, 37 से बढ़कर हो जाएगी 44 सीटें
जम्मू-कश्मीर के दौरे पर गए परिसीमन आयोग के सदस्य और मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने बताया कि परिसीमन की प्रक्रिया अगले साल मार्च तक पूरी कर ली जाएगी। उन्होंने संकेत दिया कि यहां 7 सीटें बढ़ाई जा सकती हैं। 


कहा ये जा रहा है कि परिसीमन प्रक्रिया की वजह से जो 7 सीटें बढ़ेंगी, वो सीटें जम्मू में बढ़ सकती हैं। ऐसे में कश्मीर में तो 46 सीटें ही रहने वाली हैं, लेकिन जम्मू में ये आंकड़ा 37 से बढ़कर 44 हो जाएगा। जम्मू-कश्मीर भाजपा प्रमुख रविंदर रैना के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने विधानसभा में जम्मू के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की मांग भी की है।

पीडीपी और एनसी जैसी पार्टियों के लिए बड़ी चुनौती
अब राजनीतिक लिहाज से इसका फायदा भाजपा पहुंचा सकता है तो वहीं पीडीपी और एनसी जैसी स्थानीय पार्टियों के लिए नई चुनौती खड़ी हो सकती है। ऐसा देखा गया है कि जम्मू में भाजपा खुद को मजबूत कर रही है।  पिछले साल जिला विकास परिषद के चुनाव में भाजपा ने जम्मू इलाके की  6 परिषदों पर कब्जा जमाया था, जबकि 7 पार्टियों वाली पीएजीडी ने 9 परिषदों पर कब्जा जमाया था। यानी भाजपा ने अकेले अपने दम पर 6 सीटें जीत लीं। 

वहीं 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में जम्मू और उधमपुर हिंदू बहुल दो सीटें भाजपा ने जीत ली थी। 2008 के विधानसभा चुनावों के बाद से लेकर 2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो यहां भाजपा का दबदबा और वोट प्रतिशत भी लगातार यहां बढ़ रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां उसे 32.4 फीसदी वोट मिले थे वहीं 2019 में  46.39% वोट हासिल हुए। हालांकि घाटी में पीडीपी और एनसी की अच्छी पकड़ मानी जाती है। 

सीटें बढ़ने से जम्मू में बदल जाएंगे राजनीतिक समीकरण
अब तक के चुनावों में ऐसा देखा गया था कि घाटी में बेहतरीन प्रदर्शन कर के भी जम्मू-कश्मीर में सरकार बन जाती थी, अकेले जम्मू का योगदान कम रहता था। लेकिन अगर ये सात सीटें जम्मू के साथ जुड़ जाती हैं, तो इससे राजनीतिक समीकरण बदलते दिख सकते हैं। इसी  बात की चिंता स्थानीय पार्टियों को है, क्योंकि इससे महबूबा मुफ्ती और फारुक अबदुल्ला जैसे नेताओं का दबदबा खत्म होने का डर है। इसलिए शुरू में परिसीमन का विरोध भी किया गया।

क्यों महबूबा को परिसीमन से एतराज 
सूत्रों के मुताबिक, पीडीपी ने परिसीमन आयोग के सदस्यों के साथ बातचीत नहीं करने का फैसला किया है। जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। उन्हें लगता है कि नए सिरे से परिसीमन होने से उनकी सियासत गहरे संकट में पड़ सकती है और उनके लिए अपना वजूद बचाए रखना मुश्किल हो सकता है। इसलिए उन्होंने पीएजीडी की बैठक में ही यह साफ कर दिया कि वे इस मामले पर अलग राह पकड़ेंगी। जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा देने और अनुच्छेद 370 को खत्म करने का मुद्दा भी पीडीपी और केंद्र सरकार के बीच विवाद का विषय बना हुआ है।
 
कश्मीर में परिसीमन आयोग का गठन कब और क्या है मकसद?
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 निरस्त होने के बाद जम्मू-कश्मीर को दिया गया विशेष राज्य का दर्जा खत्म हो गया। इससे परिसीमन का रास्ता साफ हुआ। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक के पारित होने के बाद केंद्र ने मार्च 2020 में तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया था। कोरोना महामारी को देखते हुए मार्च 2021 में इसका कार्यकाल एक साल के लिए और लिए बढ़ा दिया गया था। 

एक और खास बात यह है कि यहां विधानसभा की करीब चौबीस सीटें ऐसी हैं जो कि खाली रहती हैं। कारण कि वे पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) के अंतर्गत आती हैं। परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर होगा और भूगौलिक स्थितियों का भी ध्यान रखा जाएगा। आयोग को मार्च 2022 में या उससे पहले केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। उसके बाद ही विधानसभा चुनाव होंगे।
 
परिसीमन आयोग में कौन-कौन 
परिसीमन आयोग में न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) रंजना प्रकाश देसाई, मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) सुशील चंद्रा और उप चुनाव आयुक्त चंद्र भूषण शामिल हैं।



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