Jaishankar: कूटनीतिक पिच पर फ्री स्टाइल में खेल रहे विदेश मंत्री जयशंकर, कुछ सुलझे तो बने बात
जयशंकर खुलकर बोले कि रूस-यूक्रेन को बातचीत करनी होगी। अगर वे चाहें तो भारत उन्हें सलाह दे सकता है। उन्होंने 10 सिंतबर को बर्लिन में कहा कि भारत के पास इसके लिए चार सूत्रीय कार्यक्रम है। गाजा में भी युद्ध विराम पर उन्होंने सऊदी अरब में भारत के दो टूक समर्थन की घोषणा कर दी।
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विदेश मंत्री एस. जयशंकर कूटनीति की पिच पर खुलकर खेल रहे हैं। कभी अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो, रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव अपने अंदाज में ऐसा फ्लेवर देते थे। अमेरिका के मौजूदा विदेश मंत्री एंटनी बिल्ंकन इस मामले में थोड़ा संभलकर चलते हैं, जबकि चीन के विदेश मंत्री वांग यी शुरू से अपने लक्ष्य केंद्रित अंदाज के लिए जाने जाते हैं। विदेश मंत्री जयशंकर अपनी बात कहने और भारत का पक्ष रखने में पीछे नहीं रहते। हिचकिचाते भी नहीं। देखना है आने वाले समय में वह चुनौतियों को कितना साध पाते हैं।
जयशंकर खुलकर बोले कि रूस-यूक्रेन को बातचीत करनी होगी। अगर वे चाहें तो भारत उन्हें सलाह दे सकता है। उन्होंने 10 सिंतबर को बर्लिन में कहा कि भारत के पास इसके लिए चार सूत्रीय कार्यक्रम है। गाजा में भी युद्ध विराम पर उन्होंने सऊदी अरब में भारत के दो टूक समर्थन की घोषणा कर दी। जयशंकर का यह अंदाज हमेशा चर्चा में रहता है। वह चार दशक से अधिक समय तक विदेश सेवा में रहे हैं। डिप्लोमेसी में पले, पगे हैं। राजनयिक के तौर पर रूस, चीन, अमेरिका चुनौतीपूर्ण दायित्व निभाया है। अमेरिका के साथ परमाणु करार के समय काफी महत्वपूर्ण दायित्व निभाकर चर्चा में आए थे। विदेश मंत्री के पद से अवकाश प्राप्त करने के बाद वह केंद्र सरकार में दूसरी बार विदेश मंत्री बने हैं।
क्या हैं बड़ी चुनौतियां?
रूस, अमेरिका और यूरोप के बीच में रिश्तों का संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। ईरान और इस्राइल में तनाव को देखते हुए भारत के हितों को बनाए रखना है। भारत के करीब करीब पड़ोसी देश अपने अंदरूनी हालात में उलझे हुए हैं। ऐसे में पड़ोसी देशों के साथ भारत का रिश्ता अपनी क्षेत्रीय मजबूती को दर्शा पाने में विफल है। भारत को इस चुनौती को भी साधना है। चीन और पाकिस्तान के बीच में नजदीकियां बढ़ती जा रही हैं। पाकिस्तान भारत को अपना परंपरागत विरोधी मानता है। अब बांग्लादेश में भी अस्थिरता चल रही है। ऐसे में बांग्लादेश में पाकिस्तान और चीन दोनों की रुचि बढ़ रही है। म्यांमार में भी इसी तरह के हालात हैं।
चीन, पाकिस्तान, म्यांमार और बांग्लादेश में भारत विरोधी ताकतें काफी सक्रिय हैं। ऐसे में विदेश नीति के अपने अंदाज और बेबाक राय के जरिए जयशंकर के सामने भारतीय हितों का लक्ष्य पाने की सबसे बड़ी चुनौती है। लद्दाख में पिछले चार साल से चीन की सेनाओं ने वास्तविक नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सहमति तथा समझौते का उल्लंघन किया है। 2020 में दोनों देशों के सैनिकों में खूनी संघर्ष भी हुआ था। भारत का एक भू-भाग चीन की सेना के नियंत्रण में है। विदेश मंत्री जयशंकर लगातार चीन से अंतरराष्ट्रीय सहमति और समझौते का अनुपालन करने को कह रहे हैं, लेकिन चीन इस कोई कान नहीं दे रहा है। भारत की बार-बार की अपील के बाद भी चीन की सेना अप्रैल 2020 वाली स्थिति में जाने के लिए तैयार नहीं है। हिन्द महासागर क्षेत्र में चीन की लगातार चुनौती बढ़ रही है और दक्षिण सागर क्षेत्र में वह अपनी मोनोपोली पर अड़ा हुआ है।
भारत युद्ध की युद्ध रुकवाने की कूटनीति
यूक्रेन-रूस में संघर्ष चल रहा है। संघर्ष इस्राइल और हमास में चल रहा है। इस्राइल के साथ ईरान के रिश्ते बेहद बुरे दौर से गुजर रहे हैं। हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में मालवाहक जहाजों की आवाजाही को अभी भी बाधित कर रखा है। भारत जैसे देश इसकी बड़ी कीमत चुका रहे हैं। वहीं यूक्रेन और रूस के बीच में जारी संघर्ष की भी भारत को कीमत चुकानी पड़ रही है। इसने अमेरिका और रूस के बीच अपने हितों को बनाए रखने के लिए भारत के सामने संतुलन बनाने की चुनौती को काफी बढ़ा दिया है। इसका असर अमेरिका और रूस के साथ भारत की सामरिक और रणनीतिक साझेदारी, सैन्य हथियारों के आयात और आपसी सहयोग पर पड़ रहा है। इस दौर में बुद्ध के देश ने सभी संवाद के रास्ते पर चलने और युद्ध के माध्यम समस्या का समाधान तलाशने की कूटनीति को आगे बढ़ाया है। यूक्रेन और रूस, ईस्राइल और ईरान भारत से शांति के बाबत मध्यस्थता की उम्मीद जता रहे हैं। यहां तक कि अमेरिका ने भी इसमें भारत की भूमिका से इनकार नहीं किया है। खुद भारत ने भी कहा कि सभी पक्षों को गंभीरता बरतनी होगी और भारत मध्यस्थता के लिए तैयार है।
....क्या सध पाएंगे भारत के हित?
अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर चुनौती बढ़ी है। इस चुनौती को मौजूदा भू-राजनैतिक परिस्थिति ने कुछ और अधिक बढ़ा दिया है। भारत के पड़ोसी देश चीन की भी एशिया में बढ़ रही क्षेत्रीय चुनौती पर विशेष निगाह है। भारत ने चीन को साधने के लिए अमेरिका, रूस, यूरोप के अलावा विएतनाम के साथ अपने रिश्ते को नया आयाम देने में कोई हिचक नहीं दिखाई है। संकट के समय में इस्राइल से भी गजब की रिश्तों की केमिस्ट्री को आगे बढ़ाया है। लंबे सम. से भारत और चीन के बीच में द्विपक्षीय कारोबार काफी प्रभावित हो रहा है। भारत ने चीन से आयात होने वाले 500 सामानों पर आयात शुल्क को बढ़ा रखा है। इसका असर भारत के उत्पादन उद्योग पर पड़ रहा है। वहीं अब भी चीन के साथ 30 अरब डालर से अधिक का व्यापार घाटा बर्दाश्त कर रहा है। चीन से आयात के समर्थकों का भारत पर ड्यूटी कम करने, प्रतिबंधों में छूट देने का भारी दबाव है। चीनी कंपनियां इसके लिए अपने देश पर दबाव डाल रही हैं। चीन भी चाहता है कि भारत इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाए, लेकिन यह वही चीन है जो लद्दाख में भारत की चिंताओं पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। चीन में अभी भी बड़ी संख्या में दोनों देशों की सेनाएं तैनात हैं। भारत ने अग्रिम पंक्ति की 50 के करीब की रक्षा पांक्ति को तैनात कर रखा है। इसमें लड़ाकू विमान, टैंक, तोप, यूएवी समेत आदि हैं। भारत का मानना है कि जब तक चीन अपने सैनिकों को अप्रैल 2020 की स्थिति में पीछे नहीं ले जाता और सीमा पर शांति का विश्वास पैदा नहीं होता, तब तक इस तरह की सैन्य तैनाती बनाए रखना आवश्यक है। विदेश मंत्री जयशंकर इस दिशा में लगातार प्रयास कर रहे हैं और अभी तक सफलता नहीं मिल पाई है।
प्रधानमंत्री की विदेश नीति का 'ध्रुव तारा' है एस जयशंकर
विदेश सचिव के बाद विदेश मंत्री का कार्यभार संभालने के बाद से एस जयशंकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार की विदेश नीति का ध्रुवतारा बनकर उभरे हैं। हालांकि चीन, म्यांमार, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव के मोर्चे पर भारत इन दिनों पड़ोसी देशों के साथ बड़ी एक्सरसाइज कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर चुनौती कम नहीं हैं। उर्जा सुरक्षा से लेकर तमाम जटिलताओं बढ़ रही हैं। ऐसे समय में भारत ने शांति, संवाद, समन्वय पर जोर देकर अपनी आवाज को ऊंचा किया है। भारत को यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि दुनिया माने। यह युद्ध का समय नहीं है। युद्ध से स्स्या का समाधान संभव नहीं है। संवाद जरूरी है। शांति जरूरी है। इसे विदेश मंत्री एस जयशंकर की डिजाइन माना जा रहा है।