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इसरो जासूसी कांड में निर्दोष साबित हुए वैज्ञानिक नंबी, मुआवजे का आदेश
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 14 Sep 2018 12:55 PM IST
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नंबी नारायण
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उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को 1994 के एक जासूसी कांड के संबंध में कहा कि इसरो के पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायणन को “बेवजह गिरफ्तार एवं परेशान किया गया और मानसिक प्रताड़ना” दी गई। साथ ही उसने केरल पुलिस के अधिकारियों की भूमिका की जांच के आदेश दिए।
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प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की एक पीठ ने मामले में मानसिक प्रताड़ना के शिकार हुए 76 वर्षीय नारायणन को 50 लाख रुपये का मुआवजा देने को कहा। इस पीठ में न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ भी शामिल थे।
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पीठ ने जासूसी मामले में नारायणन को फंसाए जाने की जांच करने के लिए उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति डी के जैन की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पैनल भी गठित किया। नारायणन ने केरल उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का रुख किया था जिसमें कहा गया था कि पूर्व डीजीपी और पुलिस के दो सेवानिवृत्त अधीक्षकों के. के जोशुआ और एस विजयन के खिलाफ किसी भी कार्रवाई की जरूरत नहीं है। दोनों को बाद में सीबीआई ने वैज्ञानिक की अवैध गिरफ्तारी के लिए जिम्मेदार ठहराया था।
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उच्चतम न्यायालय ने 1998 में राज्य सरकार को नारायणन व मामले में छोड़े गए अन्य को एक-एक लाख रुपये का मुआवाजा देने का निर्देश दिया था। बाद में नारायणन ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का रुख कर उनके द्वारा झेली गई मानसिक पीड़ा एवं प्रताड़ना के लिए राज्य सरकार से मुआवजा मांगा था। आयोग ने दोनों पक्षों को सुनने और उच्चतम न्यायालय के 29 अप्रैल, 1998 के फैसले को ध्यान में रखते हुए मार्च 2001 में उन्हें 10 लाख रुपये का अंतरिम हर्जाना देने को कहा।
क्या है इसरो जासूसी कांड
इसरो जासूसी कांड साल 1994 का वह मामला है जिससे भारत की अंतरिक्ष के क्षेत्र की तरक्की 15 साल पिछड़ गई। इसरो उस समय क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन पर काम कर रहा था और वह उसे बनाने के बिल्कुल करीब था। तभी उसकी तकनीक के लीक होने की चर्चा उड़ गई और उसकी केरल पुलिस ने एसआइटी जांच शुरू करा दी। इसी जांच के दौरान क्रायोजेनिक इंजन विभाग के प्रमुख नंबी नारायणन गिरफ्तार कर लिए गए और अनुसंधान का कार्य पटरी से उतर गया। भारत के पिछड़ने का सीधा लाभ अमेरिका और फ्रांस को मिला।
केरल पुलिस ने दावा किया था कि वैज्ञानिक ने कुछ गुप्त दस्तावेज पाकिस्तान को दिए थे। हालांकि जांच के बाद सीबीआई ने इन आरोपों को झूठा कारक दिया था। इसके बावजूद दोबारा जांच के आदेश दिए गए लेकिन 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को रद्द कर दिया था। इसके बाद नारायणन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग पहुंचे। आयोग ने उन्हें 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। हालांकि वह इस फैसले से खुश नहीं हुए और इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट के फैसले के बाद नंबी ने कहा, 'मैंने अभी आदेश नहीं देखा है। मुझे केवल इतना पता है कि 50 लाख रुपए मुआवजे के तौर पर मिलेंगे और एक न्यायिक जांच होगी।'
I am yet to see the judgement. All I know is that Rs 50 lakh will be given as compensation and a judicial inquiry will be conducted: ISRO scientist Nambi Narayan pic.twitter.com/HKWxkhyz6w
— ANI (@ANI) September 14, 2018