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साक्षात्कार : ई-उपकरणों के सूक्ष्म तरंगों का सटीक मापक जरूरी

Mon, 14 Jan 2019 05:59 AM IST
संदीप भट्ट पीयूष पांडेय, नई दिल्ली
पीयूष पांडेय, नई दिल्ली Published by: संदीप भट्ट Updated Mon, 14 Jan 2019 05:59 AM IST
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Interview : The precise measurement of the microscopic waves of e-equipment is necessary

वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) उपभोक्ताओं के हितों को बनाए रखने, हर साल करीब 3,000 औद्योगिक इकाइयों के मानकों को कायम रखने और इस क्षेत्र को ई-उपकरणों से उत्सर्जित सूक्ष्म तरंगों के मापक तैयार करने के लिए विभिन्न स्तरों पर काम कर रहा है। प्रदूषण पर लगाम लगाने के साथ प्लास्टिक कचरे के दोबारा इस्तेमाल की दिशा में भी कार्यरत है। विभिन्न मुद्दों पर पीयूष पांडेय ने सीएसआईआर के निदेशक दिनेश असवाल से बीतचीत की। पेश हैं अंश : 

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प्रश्न : भारतीय जलवायु के हिसाब से प्रदूषण के मानक क्या हैं? क्या इस दिशा में सीएसआईआर कोई काम कर रहा है? 

उत्तर : वर्तमान में प्रयोग हो रहे मानक विदेशी जलवायु पर आधारित हैं। सीएसआईआर पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए भारतीय जलवायु के हिसाब से मौलिक मानक तैयार कर रहा है। पर्यावरण मंत्रालय से इस संबंध में चर्चा की जा चुकी है। जब अपने मौलिक मानक होंगे तो औद्योगिक क्षेत्र और वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण से निपटना आसान होगा। देखिए, भारत और यूरोप की जलवायु में काफी अंतर है। दोनों की मिट्टी की आर्द्रता में काफी फर्क है। ऐसे में विदेशी मानकों के आधार पर यहां प्रदूषण से नहीं निपटा जा सकता है।

सीएसआईआर ने पीएम-2 की माप के लिए एक उपकरण तैयार कर लिया है। मंत्रालय को इसकी जानकारी दे दी गई है। उम्मीद है कि वह जल्द ही इसके लिए कोष जारी करेगा। इसके बाद आगे का काम होगा। सरकार से मंजूरी मिलने के डेढ़ साल बाद भारतीय जलवायु के हिसाब से प्रदूषण के मानकों को लागू किया जा सकेगा। हमारी प्राथमिकता सिर्फ वायु ही नहीं बल्कि ध्वनि समेत अन्य प्रकार के प्रदूषण के लिए भी मानक तैयार करना है। 

प्रश्न : ई-उपकरणों से निकलने वाली सूक्ष्म तरंगों के नुकसान को लेकर सीएसआईआर ने क्या सरकार से कोई चर्चा की है? 

उत्तर :
ई-उपकरणों से उत्सर्जित सूक्ष्म तरंगों के मापक तैयार करने के लिए दूरसंचार मंत्रालय से बातचीत चल रही है। यह बात सही है कि ई-उपकरणों से एक सीमा से अधिक सूक्ष्म तरंगें निकलना शरीर के लिए नुकसानदायक है। आजकल लोग मोबाइल, टैबलेट, फ्रिज और माइक्रोवेव समेत अन्य ई-उपकरणों से घिरे हुए हैं, जिनमें वाई-फाई का इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे में जब भी कहीं डायलेटिक माध्यम होगा तो ऊष्मा निकलेगी।

फिलहाल जो ई-उपकरण आ रहे हैं और उनसे निकलने वाली सूक्ष्म तरंगों के मापक कितने सटीक हैं, इन मुद्दों पर मंत्रालय से विचार-विमर्श चल रहा है। देखिए, किस ई-उपकरण से निकलने वाली सूक्ष्म तरंगों से कितना नुकसान हो रहा है, यह हर पल जानना संभव नहीं है। ऐसे में उसकी गुणवत्ता बढ़ाकर इन तरंगों की एक सीमा निर्धारित की जा सकती है और यही एकमात्र उपाय है। 

प्रश्न : सीएसआईआर ऐसे किन पहलुओं पर काम रहा है, जो सरकार के साथ आम लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है? 

उत्तर :
सीएसआईआर सरकार की जरूरत के मुताबिक काम करने के साथ औद्योगिक क्षेत्र की मदद के लिए सटीक मापक उपलब्ध कराता है। शुद्ध उत्पाद के लिए सटीक मापक सबसे अहम है। सीएसआईआर का पहला काम नीति निर्धारकों को यह बताना है कि मूल्यांकन कैसे और किन आधारों पर हो। दूसरा काम औद्योगिक क्षेत्र के लिए सीमा का निर्धारण करना है, चाहे वह प्रदूषण का मामला हो या सोने की शुद्धता की माप।

औद्योगिक क्षेत्र को सीएसआईआर के मापक के आधार पर तैयार मानकों का अनुपालन करना होता है। जैसे- बोतलबंद पानी में कितना आर्सेनिक होना चाहिए या फिर बाजार में बिकने वाले कलम की लंबाई-चौड़ाई कितनी होनी चाहिए। खासबात यह है कि सीएसआईआर शुद्धता के सात आधारों पर सटीक मापक तैयार करता है, जिससे किसी गड़बड़ी की गुंजाइश न हो। हम हर साल करीब दो से तीन हजार औद्योगिक क्षेत्र को ऐसे मापक मुहैया कराते हैं, चाहे वह इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र हो या फार्मा उद्योग हो। 

प्रश्न : दुनिया प्लास्टिक कचरे से जूझ रही है। इस्तेमाल हो चुकी प्लास्टिक के निपटान की दिशा में क्या कदम उठाए जा रहे हैं? 

उत्तर :
सभी प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन नहीं किया जा सकता है। ऐसे में उसे दोबारा इस्तेमाल में लाने के लिए सीएसआईआर ने अपनी प्रयोगशाला में 18 लाख रुपये की लागत से एक मशीन तैयार की। इसके जरिए प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल टाइल्स, प्लास्टिक गेंद और अन्य सामान बनाने में किया जाता है। प्रयोगशाला के बाहर फुटपाथ पर प्लास्टिक कचरे के इस्तेमाल से बनाए गए टाइल्स प्रयोग के तौर पर लगाए गए थे, जो पत्थर वाले टाइल्स की तुलना में अधिक मजबूत और सस्ते हैं।

इन मशीन को खरीदने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से कंपनियां संपर्क कर रही हैं। चंडीगढ़ में चार युवाओं ने इस मशीन की मदद से प्लास्टिक कचरे से टाइल्स बनाने का कारोबार शुरू किया है। देखिए, प्लास्टिक को गलने में कई सौ साल लगते हैं। ऐसे ही सबकुछ चलता रहा तो 2050 तक 12 अरब टन प्लास्टिक कचरा जमा हो जाएगा। ऐसे में इसे दोबारा इस्तेमाल में लाने के लिए यह मशीन कारगर है। 

प्रश्न : दवाओं के मापकों पर सीएसआईआर ने सवाल उठाया था। फार्मा क्षेत्र को कब तक सटीक मापक मुहैया होंगे? 

उत्तर :
नए मापक बनाने की तैयारी अंतिम चरण में है, जिसका इस्तेमाल पूरे फार्मा उद्योग को करना होगा। नए मापक के आने से एक फीसदी की भी चूक नहीं होगी। इससे घरेलू बाजार को नई दिशा मिलेगी। दवाओं का निर्यात करने वाली फार्मा कंपनियों के साथ घरेलू स्तर पर इसकी आपूर्ति करने वाली फार्मा कंपनियों को लाभ होगा। घरेलू खरादीर भी इससे लाभान्वित होंगे।

उदाहरण के तौर पर एक टेबलेट तैयार करने में माइक्रोटॉक्सिन स्तर पर दवा की मात्रा का इस्तेमाल होता है और शेष पदार्थ विटामिन या अन्य होते हैं। अगर किसी टेबलेट के निर्माण में दवा एक माइक्रोग्राम ज्यादा या कम है तो उसके प्रभाव अलग होंगे। हकीकत में दवा की मात्रा कम या ज्यादा होना मरीज के लिए काफी नुकसानदायक है। ऐसे में नए मापक इस तरह की परेशानियां दूर होंगे। 

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