अंतरराष्ट्रीय टाइगर दिवस: जंगल की दुनिया में बाघों की मुश्किल
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‘वह दो माह का है। वह भूखा है। डरा है। वह हैरान है कि क्या उसकी मां लौटेगी।’ गोली चलने की आवाज गूंजती है। ‘शायद अब वह (मां) नहीं रही।’ तभी टीवी स्क्रीन पर एक दुखद संदेश उभरता है, ‘बस 1411 बचे।’
वर्ष 2010 में एयरसेल के मशहूर प्रचार अभियान ‘सेव आवर टाइगर्स’ में व्याकुल, नन्हे शावक स्ट्रीपी की इस तस्वीर ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। बहरहाल, आठ साल में संकट खत्म होता प्रतीत होता है।
स्वतंत्र सामाजिक कार्यकर्ताओं, सरकारी नीतियों, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम में सुधार और बढ़ती जागरूकता से बाघों की आबादी में सुधार आया।
भारत में सबसे ज्यादा टाइगर
वर्ष 2014 में जब आखिरी बार बाघों की गणना हुई तब यह संख्या बढ़कर 2,226 पहुंच गई। रविवार को अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर भारत इस बात से खुद को दिलासा दे सकता है कि वह अब भी सबसे अधिक बाघों की आबादी वाला देश बना हुआ है। यह संख्या जहां देश के लिए गौरव की बात है।
वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि अवैध शिकार, घटते वन क्षेत्र और विकास परियोजनाओं से बाघों के प्राकृतिक वास स्थान का अतिक्रमण हो रहा है। इससे निपटने की आवश्यकता है। अगर उनसे निपटा नहीं गया तो भारत के इस राष्ट्रीय पशु का भविष्य संकट में होगा।