दिवालिया कानून: मोदी सरकार के सामने डेढ़ लाख करोड़ के 12 बड़े मामले निपटाने की चुनौती
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केंद्र की एनडीए सरकार के लिए कंपनी दिवालिया कानून (इनसॉलवेंसी एंड बैंकरप्सी कोड) का सामना कर रहे 12 बड़े मामलों को तेजी से निपटाने की चुनौती है। इस कानून को लागू हुए दो साल बीत गए हैं लेकिन सरकार को कोई बड़ी सफलता हाथ नहीं लगी है।
चुनौती की गंभीरता इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि अगले साल मई में होने वाले आम चुनाव से पहले सरकार को इन कंपनियों में फंसी आम आदमी की डेढ़ लाख करोड़ से ज्यादा की रकम को निकालना है।
सरकार के सामने कानून बनाने से ज्यादा बड़ी चुनौती उसे सही प्रकार से लागू करने की है। दिवालिया कानून के प्रावधानों के मुताबिक दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने के छह महीने के अंदर ही इसे खत्म करना होगा। यदि किसी वजह से यह 180 दिन में पूरी नहीं हो पाती तो विशेष परिस्थितियों में 90 दिन की अवधि बढ़ाई जा सकती है।
लेकिन 12 बड़ी कंपनियों की दिवालिया प्रक्रिया की 270 दिन की अवधि खत्म हो गई है, लेकिन अदालत के दखल देने या प्रक्रियाजन्य देरी से इनमें से एक भी मामला सिरे नहीं चढ़ पाया है। ये सभी मामले पिछले साल जुलाई में ट्रिब्यूनल में दाखिल किए गए थे।
पहला मामला
वैसे भी इस कानून के तहत निपटाए गए मामलों में बैंकों को ज्यादा फायदा नहीं हुआ है। इस कानून के तहत निपटाया जाना वाला पहला मामला सिनर्जी डूरे ऑटोमोटिव लिमिटेड का था, जिस पर 972 करोड़ रुपये का कर्ज था। लेकिन बैंक इसमें से केवल 54 करोड़ रुपये ही वसूल कर पाए। यानी कर्ज का 94 फीसदी डूब गया।
सबसे बड़ा मामला
इस बार सबसे बड़ा मामला एस्सार स्टील का है जिस पर 44,000 करोड़ रुपये का कर्ज है। इसके लिए पहले नूमेटल नाम के एक समूह ने 18,000 करोड़ की बोली लगाई थी, जबकि आर्सेलरमित्तल ने 32,000 करोड़ की। बाद में नूमेटल ने भी अपनी बोली बढ़ाकर 32,000 करोड़ रुपये कर दी।
लेकिन स्टील किंग कहलाने वाले लक्ष्मी निवास मित्तल की कंपनी आर्सेलर ने नूमेटल की बोली स्वीकार किए जाने को चुनौती दी है। उसका कहना है कि नूमेटल में रेवांत रुइया के भी शेयर हैं। नियमानुसार दिवालिया कंपनी के मालिक अपनी ही कंपनी की नीलामी में बोली नहीं लगा सकते। और रेवांत तो नीलाम हो रही एस्सार के मालिकों में से हैं, इसलिए नूमेटल की बोली को खारिज कर देना चाहिए। फिलहाल एनसीएलटी के फैसले का इंतजार है।
नूमेटल का कहना है कि मित्तल पर उत्तम गलवा का 5,300 करोड़ और केएसएस पेट्रॉन का 7,000 करोड़ का कर्ज है। आईबीसी कोड के मुताबिक कोई कर्जदार कंपनी दूसरी कंपनी की नीलामी में हिस्सा नहीं ले सकती है। मित्तल ने हालांकि एस्सार खरीदने से पहले ये दोनों कर्ज खत्म करने की पेशकश की है, लेकिन मामला अभी सुलझा नहीं है।
यही हाल दूसरी बड़ी कंपनियों का है। जेएसडब्ल्यू की एईऑन इन्वेस्टमेंट के साथ मिल मॉनेट इस्पात को खरीदने की पेशकश पर दूसरी कंपनियों ने यह कहते हुए आपत्ति की है कि मॉनेट की मालकिन सीमा जाजोदिया जेएसडब्लू के मालिक सज्जन जिंदल की बहन हैं, इसलिए वे बोली में हिस्सा नहीं ले सकते हैं।
जेपी इंफ्रा के साथ कुछ और समस्या है। उसकी बोली लग रही है 8,000 करोड़ की, जबकि उसके पास 300 एकड़ जमीन है, जिसकी क़ीमत 10,000 करोड़ है। बाकी फ्लैट्स और दूसरी संपत्तियों की कीमत मिला कर कुल वैल्यूएशन 16,000 करोड़ रुपये है।
यह है प्रक्रिया
कंपनी द्वारा बैंक को कर्ज अदा न कर पाने की सूरत में वे इसे बैड लोन घोषित कर देते हैं। बैंक कर्ज वसूल करने के लिए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) को बताते हैं। इसकी परिसंपत्तियों का मूल्यांकन कराया जाता है। सभी कर्जदाताओं (सीओसी यानी कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स) के दावों की जांच की जाती है। नीलामी की निविदा मंगाई जाती है।
एनसीएलटी सभी दावों की जांच कर सीओसी की सहमति लेता है। यदि नीलामी की राशि कर्जदाताओं को स्वीकार नहीं है, तो एनसीएलटी उसकी संपत्तियों की नीलामी कर कर्ज वसूल करने की कोशिश करता है। मिली रकम कर्जदाताओं को दे दी जाती है। यह सारा काम दावा दाखिल होने के नौ माह में खत्म किए जाने का प्रावधान है।
कंपनियों के पास फंसी बड़ी रकम का लेखा जोखा
कंपनी कर्ज की राशि बोली नुकसान
एस्सार स्टील 44,000 करोड़ रुपये बोली नूमेटल और आर्सेलरमित्तल से 32,000 करोड़ 12,000 करोड़
बिनानी सीमेंट 15,000 करोड़ डालमिया भारत 6,700 और अल्ट्राटेक सीमेंट से 7,900 7,100 करोड़
भूषण पावर और स्टील 49,200 करोड़ ब्रिटेन की लिबर्टी हाउस से 18,500 करोड़ 30,000 करोड़
टाटा से 17,000 करोड़
जेएसडव्ल्यू से 11,000
मोनेट इस्पात 10,700 करोड़ जेएसडब्लू-एईऑन इन्वेस्टमेंट से 2,900 करोड़ 7,000 करोड़ का नुकसान
आलोक इंडस्ट्रीज 29,500 करोड़ रिलायंस-जेएम फाइनेंशियल से 5,050 करोड़ यानी 83 फीसदी हेयरकट
जेपी इंफ्रा 10,000 करोड़ बोली 8,000 करोड़ की, वैल्यू 16,000 करोड़ की 8,000 करोड़