इंदिरा गांधी और बाल ठाकरे ने बांग्लादेशियों के मुद्दे पर कही थी एक ही बात, जानें क्या थी सोच
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नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 (CAB 2019) पर केंद्र सरकार घिरी हुई है। असम, मेघालय, मणिपुर से लेकर दिल्ली तक इसका विरोध हो रहा है। असम के लोगों को लग रहा है कि इस कानून के बाद अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को स्थाई नागरिकता दे दी जाएगी। जिससे उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को चोट पहुंचेगी। लेकिन बांग्लादेशियों के मुद्दे पर इंदिरा गांधी से लेकर बाला साहेब ठाकरे तक के विचार बिल्कुल साफ रहे हैं। इन दोनों ही महान हस्तियों ने साफ कर दिया था कि अवैध बांग्लादेशियों को उनके देश में वापस जाना ही होगा।
दरअसल, बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान लगभग एक करोड़ बांग्लादेशी भारत में आ गए थे। संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संस्था की एक रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश में युद्ध के दौरान लगभग एक लाख बांग्लादेशी रोजाना भारत में पहुंच रहे थे। (हालांकि भारत सरकार ने यह संख्या कभी पचास हजार से ऊपर नहीं माना।) केंद्र सरकार ने असम, त्रिपुरा और अन्य इलाकों में इनके रहने के कैंप स्थापित कर दिए थे। इनके कारण इन इलाकों में रहने-खाने की कठोर समस्या उत्पन्न हो गई थी।
इसी दौरान एक साक्षात्कार में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि फौरी तौर पर उन्होंने बांग्लादेशियों को यहां पर रहने का अवसर दिया है। लेकिन भारत इन्हें अपने साथ समायोजित नहीं करेगा। स्थिति के सुधार के बाद इन्हें अपने देश वापस जाना होगा।
बाला साहेब ने कहा- निकाल देता बाहर
ऐसे ही एक साक्षात्कार के दौरान बाला साहेब ठाकरे से पूछा गया था कि अगर वे देश के प्रधानमंत्री बन जाएं तो वे बांग्लादेशियों के साथ कैसा व्यवहार करेंगे? इस सवाल के जवाब में बाला साहेब ठाकरे ने कहा था कि अगर वे देश के प्रधानमंत्री बन जाते हैं तो वे अवैध बांग्लादेशियों को देश के बाहर निकाल देते। इनकी संख्या चाहे जितनी भी क्यों न हो।
इतिहासकार ने कहा- विकट है समस्या
जानकीदेवी मेमोरियल कॉलेज में इतिहास की प्रोफेसर मनीषा अग्निहोत्री ने अमर उजाला से कहा कि माना जाता है कि बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान भारत में आए शरणार्थी वापस लौटकर अपने देश नहीं गए। वे यहीं बस गए। लाखों बांग्लादेशी ऐसे हैं जिनका जन्म ही 1971 के बाद भारत में हुआ है। वे अब तीस, चालीस और पचास साल की उम्र के हैं। इनकी समस्या है कि अब वे न तो बांग्लादेश के रह गए हैं और न ही असम के लोग और भारत उन्हें अपना मानने को तैयार है।
उन्होंने कहा कि इन लोगों के सामने दोहरी समस्या है। वे यहां रहते हैं तो उनके सामने नागरिकता की समस्या है। अगर उन्हें किसी तरह भारत से वापस जाने की बात भी होती है तो बांग्लादेश उन्हें अपनाने के लिए कितना तैयार होगा, यह देखने वाली बात होगी। साथ ही, अगर ये लोग अगर बांग्लादेश वापस जाते भी हैं तो ये लोग वहां भी शरणार्थी जैसे बन जाएंगे क्योंकि इनमें से बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिन्हें आज की तारीख में जानने-पहचानने वाला बांग्लादेश में भी नहीं मिलेगा।