मोदी-शाह से मुकाबले के लिए धीरे-धीरे तैयार हो रही है कांग्रेस
- राहुल पर बढ़े राजनीतिक हमले को शुभ मान रही है कांग्रेस
- चाल-चलन में रह-रहकर आ रहा है बदलाव
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से राजनीतिक मुकाबले के लिए कांग्रेस धीरे-धीरे तैयार हो रही है। पार्टी मुख्यालय में राजनीतिक हमले, मुद्दे, सामाजिक संदेश देने के लिए जहां मंथन हो रहा है, वहीं टीम राहुल और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तथा मुख्य रणनीतिकार लक्ष्य को साधने में जुट गए हैं। इसके बाबत राज्यों के विधानसभा चुनावों में खास सतर्कता बरती जा रही है।
इस बार कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष ने पार्टी मुख्यालय में होली मनाई, लेकिन हर बार से अंदाज जुदा रहा। समारोह में जहां अध्यक्ष, उपाध्यक्ष की मौजूदगी रही, वहीं पार्टी की वेब साइट पर गुलाल की थाली लिए सोनिया गांधी एक संदेश दे रही हैं। इतना ही नहीं पार्टी ने निम्न चंद लाइनों में भी संदेश दिया है-
होली वही जो स्वाधीनता की आन बन जाए,
होली वही जो गणतंत्रता की शान बन जाए।
भरो पिचकारियों में पानी ऐसे तीन रंगों का,
जो कपड़ो पर गिरे तो हिन्दुस्तान बन जाए।
24 अकबर रोड में पिछले 30 साल से काम कर रहे एक अन्य सूत्र के मुताबिक पिछले कई सालों से ऐसा कभी नहीं हुआ। दूसरे पार्टी सीधे आरएसएस और प्रधानमंत्री मोदी को निशाने पर ले रही है। इससे पहले राष्ट्रीयता, धर्म निरपेक्षता, सहिष्णुता, छद्म हिन्दुत्व, गरीबों, किसानों तथा मध्यवर्ग तथा महिलाओं से जुड़े मुद्दे को लेकर कांग्रेस कभी इतना मुखर नहीं रही।
जट सत्र का पहला चरण भी अच्छा रहा
कांग्रेस के लिए संसद के बजट सत्र का पहला चरण भी अच्छा रहा। कांग्रेस के नेता राजनीतिक उठा-पटक से काफी गदगद हैं। उन्हें कांग्रेस उपाध्यक्ष की मजबूती साफ तौर पर दिखाई देने लगी है। पार्टी के एक महासचिव का कहना है कि जिस तरह से बजट सत्र में राहुल गांधी पर भाजपा के राजनीतिक हमले बढ़े हैं, वह काफी शुभ संकेत दे रहे हैं।
सरकार कई मुद्दों पर एक्सपोज हुई है। कांग्रेस जमीनी हकीकत का एहसास कराने में सफल रही है। राज्यसभा में सांसद सूत्र का कहना है कि पार्टी में कई स्तर पर बदलाव का दौर चल रहा है, लेकिन इसे पार्टी में इसे परंपरा के अनुरुप बिना ढिढोरा पीटे किया जा रहा है।
कांग्रेस छवि को लेकर पार्टी वरिष्ठ नेता एके एंटनी की राय को काफी अहमियत दे रही है। एंटनी की अध्यक्षता में गठित समिति ने 2014 के आम चुनाव में हार के कारणों की समीक्षा की थी। इसमें हार के मुख्य कारणों में बहुसंख्यक की तुलना में अल्पसंख्यक समाज की तरफ जरूरत से ज्यादा झुकाव बताया गया था।