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भारतीय सेना की जांबाज टीम ने बदला एलएसी का नक्शा, घुटनों पर आया चीन!

Fri, 04 Sep 2020 12:31 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 04 Sep 2020 12:31 PM IST
सार

टैंक, तोप, एंटी टैंक मिसाइल समेत सैन्य बेड़े को सपोर्ट देने के लिए तीनों सेनाओं ने बेहतर तालमेल बना रखा है। पैंगोंग में नौसेना की फास्ट ट्रैक बोट समेत अन्य किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है। वहीं वायुसेना ने भी मुस्तैदी काफी बढ़ाई है...

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Indian Army brave team changed LACs map in Ladakh, China is persuading India for talks
ITBP at Pangong Tso - फोटो : PTI (File Photo)

विस्तार

भारतीय सेना में जाबांजों की कमी नहीं है, जो रणनीति के मामले में दुश्मन के चाल पर भारी पड़ जाते हैं। 29-30 सितंबर की रात में लद्दाख के पैंगोंग क्षेत्र में दक्षिणी किनारे की ब्लैक टॉप, हेलमेट टॉप चोटियों पर कुछ ऐसा ही हुआ था। बताते हैं कि चीन की फौज ने इन दोनों चोटियों पर काबिज होने की योजना बनाई। इसकी भनक भारतीय सेना को लग गई और जब तक चीन की फौज वहां आती, कमांडिग ऑफिसर कर्नल रणबीर सिंह जामवाल (जिम्मी) की टीम ने वहां कब्जा जमा लिया। चीन के सैनिकों को भी कहा कि यह भारतीय क्षेत्र है, वहां यहां घुसपैठ की कोशिश न करें।

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इस तरह से पैंगोंग त्सो, स्पांगुर गैप, रेजंग दर्रे, रेचिन पहाडियों से गुजरने वाले रेकिन दर्रे तक भारतीय सेना ने मजबूत मोर्चे बंदी कर ली है। सेना ने पूर्वी लद्दाख पर भी चौकसी बढ़ा रखी है। ठाकुंग से लेकर रेकिन लॉ (दर्रा) तक भारतीय सैनिकों की मौजूदगी अब खास मायने रख रही है। इसकी जद में चीन के सैन्य शिविर भी हैं।

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दोनों तरफ तैनात हैं टैंक, एंटी-टैंक मिसाइल

चुशुल के पास का यह क्षेत्र दोनों देशों की सेनाओं के बीच सतर्कता और तनातनी का मुख्य केंद्र बन गया है। सैन्य सूत्रों की मानें चीन ने भी टैंक, एंटी टैंक मिसाइल, तोप आदि से मजबूत मोर्चाबंदी की है। जवाब में भारत ने भी पूरी सैन्य तैयारी कर रखी है। कुल मिलाकर उद्देश्य चीन को आगे बढ़ने से रोकना और रक्षात्मक आक्रामक तरीका अपनाते हुए उसके किसी भी प्रयास का माकूल जवाब देना है।

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बताते हैं टैंक, तोप, एंटी टैंक मिसाइल समेत सैन्य बेड़े को सपोर्ट देने के लिए तीनों सेनाओं ने बेहतर तालमेल बना रखा है। पैंगोंग में नौसेना की फास्ट ट्रैक बोट समेत अन्य किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है। वहीं वायुसेना ने भी मुस्तैदी काफी बढ़ाई है।

बदल गया घुसपैठ का नक्शा

पैंगोंग का सामरिक महत्व काफी ज्यादा है। भारतीय सेना जब भी चीन की फौज से इस क्षेत्र को को खाली करने, एलएसी का सम्मान करने की बात करती है, तो चीन की फौज अनसुना कर देती थी। यहां तक कि चीन के मेजर जनरल लियु लिन और लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह की वार्ता के दौरान चीन पैंगोंग और डेपसांग को लेकर कोई बात नहीं करता था।

जबकि यह वार्ता दोनों देशों के संयुक्त सचिवों के बीच सहमति बनने के बाद हो रही थी, लेकिन चीनी पक्ष सैन्य कमांडर स्तर की वार्ता में इससे मुकर जाता था। लेकिन बताते हैं कि जब से पैंगोंग के पास इन चोटियों पर भारतीय सेना काबिज हुई है, नक्शा बदल गया है।

अब चीन भारत से इस क्षेत्र को खाली करने को कह रहा है। वार्ता का दबाव बना रहा है। हालांकि चार दिन से लगातार बिग्रेडियर स्तर के सैन्य अधिकारियों की वार्ता (फ्लैग मीटिंग) का अभी तक कोई ठोस नतीजा निकला है।

कौन हैं कर्नल जिम्मी, कैसे मिली कामयाबी?

ब्रिगेडियर (रिटा.) एमपीएस बाजवा काफी प्रभावित हैं। वह कर्नल जिम्मी को उनकी बहादुरी के लिए सेल्यूट करते हैं। बतौर ब्रिगेडियर बाजवा कर्नल जिम्मी की टीम ने बड़ी बहादुरी के साथ कालाटॉप, हेलमेट टॉप पर तिरंगा फहराया। ब्रिगेडियर के मुताबिक कर्नल जिम्मी हाई अल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल (HAWS) के इंट्रक्टर रह चुके हैं। वह तीन बार एवरेस्ट की ऊंची चोटियों पर पहुंचने में सफल हो चुके हैं।


पर्वतारोहण का शानदार अनुभव रखने वाले कर्नल ने बड़ी बहादुरी और आसानी से इस लक्ष्य को तय कर लिया। चीनी फौज मुंह ताकती रह गई। एचएडब्ल्यूएस स्कूल की स्थापना भारतीय सेना ने 1948 में गुलमर्ग में की थी। इसमें भारतीय सैन्य बलों के विशेष जवानों को न केवल पहाड़ी इलाके में युद्ध के कौशल सिखाए जाते हैं, बल्कि स्नोक्राफ्ट विंटर वारफेयर में पारंगत भी बनाया जाता है।

चीन की उम्मीद से परे था ऑपरेशन

इस क्षेत्र में चीन ने अपने इलेक्ट्रानिक डिवाइस, कैमरे आदि से मॉनिटरिंग की व्यवस्था कर रखी थी। संसाधनों से गदगद चीनी फौज अपने कंट्रोल रूम से क्षेत्र की निगरानी कर रही थी। समझा जा रहा है कि चीन को उम्मीद ही नहीं थी कि भारतीय फौज इस तरह का फुर्तीला, बहादुरी से भरा सैन्य आपरेशन कर सकती है। भारतीय फौज को कमतर आंक कर चीन की फौज यहां गच्चा खा गई और भारतीय सेना ने सफलता का झंडा गाड़ दिया।

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